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केरल हाई कोर्ट की एआई पॉलिसी: एआई टूल्स का जिम्मेदार उपयोग

केरल हाई कोर्ट की एआई नीति

भारत की अदालतें गंभीर संकट से जूझ रही हैं। लंबित मामलों की संख्या 5 करोड़ से भी अधिक है। क्योंकि वर्तमान गति से सारे मामलों का निपटारा करने में 300 साल लग सकते हैं। यह भारी बोझ लंबी मैनुअल प्रक्रियाओं, न्यायाधीशों की कमी और देरी से पैदा हुआ है। अतः इस चुनौती से निपटने में एआई टूल्स एक नई उम्मीद की किरण बन सकते हैं।

सही नीतियों के साथ ये टूल्स क्रांति ला सकते हैं। जैसा कि केरल हाई कोर्ट ने हाल ही में ऐसी ही एक नीति पेश की है। यह नीति जिला अदालतों में एआई टूल्स के उपयोग को नियंत्रित करती है। अतः आइए समझते हैं कि यह नीति क्या कहती है और क्यों जरूरी है। ये एआई टूल्स भविष्य का रास्ता दिखा सकते हैं।

केरल हाई कोर्ट की एआई नीति: मुख्य बातें

19 जुलाई, 2024 को केरल हाई कोर्ट ने एक अहम नीति जारी की। इसका नाम है “जिला न्यायपालिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स के उपयोग संबंधी नीति”। यह नीति केरल के सभी जिला न्यायाधीशों, मजिस्ट्रेटों और उनके स्टाफ पर लागू होती है।

यह सभी प्रकार के एआई टूल्स को कवर करती है। साथ ही इसमें जेनरेटिव एआई और एलएलएम भी शामिल हैं। नीति केवल अदालत द्वारा अनुमोदित एआई टूल्स के इस्तेमाल की इजाजत देती है। निजी डिवाइसों पर भी यही नियम लागू होते हैं।

इस नीति के कुछ प्रमुख सिद्धांत यह हैं:

  1. निर्णय लेने में एआई नहीं: एआई कभी भी न्यायिक निर्णय का विकल्प नहीं हो सकता। कानूनी तर्क केवल मानव न्यायाधीश ही बना सकते हैं। ये एआई टूल्स सिर्फ सहायक हैं।
  2. मूल्यों की सुरक्षा: पारदर्शिता, निष्पक्षता, जवाबदेही और गोपनीयता का हनन नहीं होना चाहिए। एआई टूल्स इन मूल्यों को कमजोर नहीं कर सकते।
  3. सावधानी जरूरी: एआई आउटपुट में गलतियाँ या पूर्वाग्रह हो सकता है। न्यायाधीशों को हर एआई जनित सामग्री की सख्त जांच करनी होगी। अत्यधिक सावधानी बरतना अनिवार्य है।
  4. डेटा सुरक्षा कठोर: संवेदनशील मामलों के डेटा को गैर-अनुमोदित एआई टूल्स में इनपुट नहीं किया जा सकता। बिना एन्क्रिप्शन वाली क्लाउड सेवाओं से बचना होगा। गोपनीयता सर्वोपरि है।
  5. ऑडिट लॉग और प्रशिक्षण: सभी एआई उपयोग का पूरा लॉग रखा जाएगा। किस टूल का कब उपयोग हुआ, यह रिकॉर्ड होगा। सभी न्यायिक स्टाफ को एआई पर अनिवार्य प्रशिक्षण लेना होगा। कानूनी, नैतिक और तकनीकी पहलुओं को समझना जरूरी है।
  6. उल्लंघन पर कार्रवाई: नीति का उल्लंघन अनुशासनात्मक कार्रवाई को आमंत्रित करेगा। साथ ही, नीति को समय के साथ अपडेट किया जाएगा।

संक्षेप में, केरल की नीति एआई को एक सहायक उपकरण मानती है। यह कड़ी सुरक्षा के बंधन में रहकर काम करेगा। मानवीय निगरानी और सत्यापन को सबसे ऊपर रखा गया है। यह भारत में अपनी तरह का पहला स्पष्ट दिशानिर्देश है। यह भविष्य के लिए एक मॉडल बन सकता है। एआई टूल्स के उपयोग में यह नीति मील का पत्थर साबित होगी।

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कार्यान्वयन की चुनौतियाँ: सिर्फ नीति काफी नहीं

केरल की पहल निस्संदेह सराहनीय है। परंतु, यह समस्या का केवल एक हिस्सा हल करती है। पूरे भारत में न्यायिक सुधार के लिए व्यवस्थागत बदलाव जरूरी हैं। क्योंकि कई बड़ी बाधाएँ सामने हैं:

  • डिजिटल बुनियादी ढाँचे की कमी: कई भारतीय अदालतों में बुनियादी सुविधाएँ नहीं हैं। विश्वसनीय कंप्यूटर, हाई-स्पीड इंटरनेट या स्थानीय एआई मॉडल्स का अभाव है। ये सभी उन्नत एआई टूल्स के लिए जरूरी पूर्व शर्तें हैं। हार्डवेयर, नेटवर्किंग और स्थानीय भाषा के एआई में निवेश बहुत जरूरी है। बिना इसके नीति सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगी। एआई टूल्स को सफल बनाने के लिए मजबूत बुनियाद जरूरी है।
  • न्यायिक शिक्षा में अंतर: न्यायाधीशों और लिपिकों को सिर्फ टूल चलाना नहीं सिखाना है। उन्हें एआई की सीमाएँ और गलतियाँ पहचानना भी सीखना होगा। केरल ने न्यायिक अकादमी द्वारा प्रशिक्षण अनिवार्य किया है। यह एक सही कदम है। राष्ट्रीय स्तर पर सभी न्यायिक अकादमियों और कानून महाविद्यालयों को एआई साक्षरता पाठ्यक्रम में शामिल करनी चाहिए। एआई टूल्स के प्रभावी उपयोग के लिए जागरूकता जरूरी है।
  • डेटा सुरक्षा और गोपनीयता चिंता: अदालतों को डेटा सुरक्षा के सख्त आंतरिक नियम बनाने होंगे। केरल की नीति गैर-अनुमोदित टूल्स में केस डेटा डालने पर रोक लगाती है। यह अच्छी बात है। लेकिन व्यापक कानूनी सुरक्षा उपायों की जरूरत है। क्लाइंट गोपनीयता, मजबूत डेटा एन्क्रिप्शन मानक और क्लाउड सेवाओं पर नियंत्रण जरूरी है। एआई टूल्स में गोपनीयता सबसे बड़ी चुनौती है।
  • अनुमोदित टूल्स का मानकीकरण: केरल ने टूल्स अनुमोदन का काम हाई कोर्ट को दिया है। व्यवहार में, एनआईसी या तकनीकी निकाय द्वारा जाँची गई टूल्स की सूची होनी चाहिए। इन एआई टूल्स के आउटपुट कानूनी मानकों पर खरे उतरने चाहिए। तकनीकी विशेषज्ञों के साथ सहयोग आवश्यक है। सही एआई टूल्स का चयन सफलता की कुंजी है।
  • जन जागरूकता की कमी: वादियों और वकीलों को एआई की क्षमताएँ और सीमाएँ समझनी चाहिए। अदालतें प्रकटीकरण नियम लागू कर सकती हैं। अगर किसी दस्तावेज़ को बनाने में एआई ने मदद की है, तो पक्षों को बताया जाना चाहिए। उन्हें चुनौती देने का अधिकार होना चाहिए। केरल की नीति में प्रकटीकरण अनिवार्य नहीं है। लेकिन उपयोग लॉग करना जरूरी है। बार और जनता को शिक्षित करने से विश्वास बढ़ेगा। एआई टूल्स के बारे में स्पष्टता जरूरी है।
  • राष्ट्रीय नीति का अभाव: केरल के नियम सिर्फ राज्य तक सीमित हैं। भारत के पास एकीकृत न्यायिक एआई ढाँचा नहीं है। राष्ट्रीय मार्गदर्शन के बिना राज्य अलग-अलग रास्ते अपना सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय या भारतीय विधि परिषद (बार काउंसिल ऑफ इंडिया – BCI) को व्यापक सिद्धांत जारी करने चाहिए। फिलहाल, वकीलों के लिए कोई औपचारिक एआई नीति नहीं है। एआई टूल्स के लिए राष्ट्रीय दिशा-निर्देश अनिवार्य हैं।

एक मजबूत समन्वित प्रयास की दरकार है। सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, ई-कोर्ट्स मिशन, बीसीआई और तकनीकी विशेषज्ञों को साथ आना होगा। क्योंकि केवल ऐसा सहयोग ही एक सुसंगत ढाँचा बना सकता है। और यह बुनियादी ढाँचे, डेटा सुरक्षा, टूल्स प्रमाणन और शिक्षा पर मानक सुनिश्चित करेगा। अतः एआई टूल्स को सफल बनाने के लिए साझा प्रयास जरूरी है।

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वैश्विक परिप्रेक्ष्य: दुनिया क्या कर रही है?

अन्य देश भी न्याय प्रणाली में एआई टूल्स को अपना रहे हैं। उनके तरीकों से भारत सीख सकता है:

  • अमेरिका (अमेरिकन बार एसोसिएशन: ABA): ABA ने जुलाई 2024 में ‘फॉर्मल ओपिनियन 512’ जारी किया। यह वकीलों द्वारा जेनरेटिव एआई के उपयोग पर मार्गदर्शन देता है। यह जोर देता है कि वकील एआई का उपयोग करते समय अपने नैतिक कर्तव्य न भूलें। इनमें सक्षमता, गोपनीयता और संचार शामिल हैं। वकील एआई आउटपुट के लिए पूरी तरह जिम्मेदार रहेंगे। उन्हें गलतियों की जांच करनी होगी। ABA ने कानून और एआई पर एक टास्क फोर्स भी बनाई है। एआई टूल्स के उपयोग में जवाबदेही बहुत जरूरी है।
  • ब्रिटेन (इंग्लैंड और वेल्स की लॉ सोसाइटी): अक्टूबर 2024 में, लॉ सोसाइटी ने अपनी एआई रणनीति पेश की। यह तीन स्तंभों पर आधारित है: नवाचार (Innovation), प्रभाव (Impact), और अखंडता (Integrity)। रणनीति का मूल उद्देश्य एआई का जिम्मेदार और नैतिक उपयोग सुनिश्चित करना है। लॉ सोसाइटी ने व्यावहारिक गाइड भी जारी किए हैं। इसमें “जेनरेटिव एआई एसेंशियल्स” शामिल है। एक समर्पित समिति अदालतों के आधुनिकीकरण पर काम करती है। एआई टूल्स के साथ नैतिकता जुड़ी हुई है।
  • सिंगापुर (सुप्रीम कोर्ट): सिंगापुर ने 2024 के अंत में एक गाइड जारी किया। यह रजिस्ट्रार परिपत्र संख्या 1/2024 के नाम से है। सिंगापुर ने एआई पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया। बल्कि, शर्तों के साथ इसके उपयोग की अनुमति दी है। अगर कोई वकील या वादी अदालती दस्तावेज बनाने में एआई टूल्स का उपयोग करता है, तो उसे सटीकता सुनिश्चित करनी होगी। आउटपुट प्रासंगिक और कानूनी होना चाहिए। एआई का उपयोग सबूत गढ़ने या अदालत को गुमराह करने के लिए नहीं किया जा सकता। उपयोगकर्ता पूरी जिम्मेदारी लेते हैं। सभी एआई जनित सामग्री की जांच जरूरी है। स्रोतों का उचित श्रेय देना आवश्यक है। गोपनीय अदालती जानकारी बाहरी एआई टूल्स को नहीं दी जा सकती। यह संतुलित दृष्टिकोण भारत के लिए एक अच्छा मॉडल हो सकता है। एआई टूल्स के लिए स्पष्ट नियम सफलता देते हैं।
  • यूनेस्को का वैश्विक मार्गदर्शन: अगस्त 2024 में यूनेस्को ने एआई के लिए मसौदा दिशानिर्देश जारी किए। ये न्यायपालिका में एआई टूल्स के उपयोग से संबंधित हैं। इनका लक्ष्य एआई को न्याय, मानवाधिकार और कानून के शासन के साथ जोड़ना है। दिशानिर्देश वास्तविक दुनिया के उदाहरणों पर आधारित हैं। जैसे अनुवाद, सारांश और परिणाम भविष्यवाणी। साथ ही, ये एआई से जुड़े खतरों से भी आगाह करते हैं। यूनेस्को ने तेरह मार्गदर्शक सिद्धांत दिए हैं। इनमें मानवाधिकार सुरक्षा, पारदर्शिता, जवाबदेही, सटीकता और मानवीय निगरानी शामिल हैं। ये केरल की नीति के सिद्धांतों से मेल खाते हैं। भारत इन वैश्विक दिशानिर्देशों का लाभ उठा सकता है। एआई टूल्स को वैश्विक मानकों पर खरा उतरना चाहिए।

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वकीलों और वादियों के लिए एआई टूल्स: बेंच से परे

एआई टूल्स सिर्फ न्यायाधीशों के लिए नहीं हैं। बल्कि ये कानूनी पेशे को भी बदल रहे हैं। यद्यपि कई कानून फर्म और वकील पहले ही इनका उपयोग कर रहे हैं। ये टूल्स विश्लेषण और ड्राफ्टिंग में मददगार साबित होते हैं:

  • उदाहरण – लेक्स मशीना (Lex Machina): यह लेक्सिसनेक्सिस का उत्पाद है। यह अदालती डेटा पर एआई विश्लेषण करता है। लाखों कानूनी दस्तावेजों को यह सरल अंतर्दृष्टि में बदल देता है। यह न्यायाधीशों के व्यवहार का पैटर्न दिखाता है। वकीलों के ट्रैक रिकॉर्ड और मामलों की अवधि का विश्लेषण करता है। इससे वकीलों को केस की रणनीति बनाने में मदद मिलती है। एआई टूल्स वकीलों की क्षमता बढ़ाते हैं।
  • उदाहरण – ब्लू जे लीगल (Blue J Legal): यह एक कनाडाई लीगल टेक स्टार्टअप है। यह कर और श्रम कानून विवादों के परिणामों का पूर्वानुमान लगाता है। इसके “टैक्स फोरसाइट” उत्पाद में सुपरवाइज्ड मशीन लर्निंग का उपयोग होता है। यह ऐतिहासिक निर्णयों के आधार पर भविष्यवाणी करता है। इसकी दावा किए गए सटीकता 90% तक है। एआई टूल्स भविष्यवाणी में मददगार हो सकते हैं।
  • भारतीय प्लेटफॉर्म – लीगोडेस्क (Legodesk): यह एक स्वदेशी क्लाउड-आधारित प्लेटफॉर्म है। यह कानून फर्मों और कॉरपोरेट वकीलों के लिए बना है। यह प्रैक्टिस मैनेजमेंट सिस्टम प्रदान करता है। लीगोडेस्क कई कार्यों को स्वचालित करता है। जैसे कानूनी नोटिसों का त्वरित निर्माण। यह सेकंडों में सैकड़ों नोटिस बना सकता है। साथ ही, यह केस मैनेजमेंट के लिए डैशबोर्ड देता है। एआई टूल्स दक्षता में क्रांति ला रहे हैं।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि एआई टूल्स वकीलों की उत्पादकता बढ़ा सकते हैं। खासकर नियमित कार्यों में ये बहुत उपयोगी हैं। इसलिए, एआई नीति पूरे कानूनी पारिस्थितिकी तंत्र को कवर करनी चाहिए। अतः एकल प्रैक्टिशनर और छोटी फर्मों को भी मार्गदर्शन की जरूरत है।

उनके पास अक्सर बड़े संसाधन नहीं होते। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) या राज्य बार एसोसिएशनों को कदम उठाना चाहिए। और उन्हें वकीलों के लिए नैतिक एआई उपयोग दिशानिर्देश जारी करने चाहिए। इसके अलावा कानून महाविद्यालयों को भी पाठ्यक्रम में एआई साक्षरता शामिल करनी चाहिए। भविष्य के वकीलों को इन एआई टूल्स का सही उपयोग आना चाहिए।

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संवैधानिक मूल्य और भविष्य: एआई का सही रास्ता

भारत को अपनी न्याय प्रणाली में एआई टूल्स को शामिल करते समय संवैधानिक मूल्यों को नहीं भूलना चाहिए। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार देता है। इसके लिए पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रिया जरूरी है। किसी भी एआई उपयोग को मानवीय निगरानी बनाए रखनी होगी।

एआई सहायता कर सकता है, लेकिन निर्णय नहीं ले सकता। हर वादी को यह अधिकार है कि उसका फैसला एक जवाबदेह न्यायाधीश करे। केरल के दिशानिर्देश सही कहते हैं: “न्याय का वितरण” न्यायाधीश का ही दायित्व है। एआई टूल्स सहायक के रूप में काम करेंगे।

समानता का अधिकार भी महत्वपूर्ण है। यह मांग करता है कि एआई टूल्स पूर्वाग्रह को न बढ़ाएँ। निष्पक्षता और गैर-भेदभाव को इन टूल्स में ही शामिल किया जाना चाहिए। नियमित जांच भी जरूरी है। एआई टूल्स से कानूनी सहायता का विस्तार हो सकता है। यह अदालती देरी घटा सकता है। स्वचालित कानूनी सलाह भी संभव है।

यह संविधान के अनुच्छेद 39ए के अनुरूप होगा। यह अनुच्छेद सभी को न्याय तक पहुँच का अधिकार देता है। अगर एआई का लाभ सभी को नहीं मिलता, तो डिजिटल विभाजन बढ़ेगा। यह असमानता पैदा करेगा। एआई टूल्स को समावेशी बनाना होगा।

जैसा कि पहले कहा गया है, न्याय प्रणाली में एआई टूल्स का एकीकरण सिर्फ आधुनिकीकरण नहीं है। यह “संपूर्ण न्याय” प्राप्त करने में सीधे मदद कर सकता है। यह सर्वोच्च न्यायालय का संवैधानिक कर्तव्य है (अनुच्छेद 142)।

इस नजरिए से, एआई सिर्फ एक बाहरी उपकरण नहीं है। यह संवैधानिक वादे को पूरा करने का एक साधन बन सकता है। एआई टूल्स संवैधानिक लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक हो सकते हैं।

अंततः, भारत को एआई की यात्रा कानून के शासन के अनुरूप होनी चाहिए। अदालतों को एआई उपयोग के बारे में पारदर्शी होना चाहिए। ऑडिट लॉग और प्रकटीकरण इसके तरीके हो सकते हैं। अगर एआई टूल्स से कोई त्रुटि होती है, तो उसका उपचार होना चाहिए।

न्यायपालिका, विधायकों, बार नेताओं और तकनीकविदों को साथ मिलकर काम करना होगा। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि एआई उचित प्रक्रिया और जनता के विश्वास को कम न करे। एआई टूल्स विश्वसनीय और जवाबदेह होने चाहिए।

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निष्कर्ष: आशा और सावधानी का सफर

केरल हाई कोर्ट की एआई नीति एक मजबूत शुरुआत है। यह दिखाती है कि जिम्मेदारी से एआई टूल्स को अदालतों में कैसे शामिल किया जा सकता है। यह एक मॉडल के रूप में काम कर सकती है। हालाँकि, यह अकेली पर्याप्त नहीं है।

पूरक राष्ट्रीय मानकों, तकनीकी सक्षमता और जन जागरूकता की आवश्यकता है। क्योकि बिना इनके, एआई एक दोधारी तलवार बन सकता है। इसके फायदे और नुकसान दोनों हो सकते हैं।

भारत को वैश्विक अनुभवों से सीखना चाहिए। अमेरिका (ABA) के नैतिक मार्गदर्शन, यूनेस्को के दिशानिर्देश और सिंगापुर के अदालती नियम मददगार हैं। साथ ही, किसी भी एआई ढाँचे में संवैधानिक गारंटियों को शामिल करना जरूरी है।

भारत एआई की शक्ति का उपयोग न्याय प्रक्रिया को तेज करने के लिए कर सकता है। साथ ही, यह निष्पक्षता, पारदर्शिता और समानता के सिद्धांतों को मजबूत कर सकता है। ये सिद्धांत हमारे संविधान की आधारशिला हैं।

एआई टूल्स इन्हें और मजबूत बना सकते हैं। सही दिशा में कदम बढ़ाने का समय आ गया है। एआई टूल्स के साथ भारत की न्यायपालिका एक नए युग में प्रवेश कर सकती है।

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