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गरीब विरोधी न्यायपालिका: भारत का कड़वा सच

गरीब विरोधी न्यायपालिका

संवैधानिक मूल्यों का क्षरण

भारतीय न्यायपालिका ने संविधान के अनुच्छेद 21 का स्पष्ट उल्लंघन किया है। गरीब विरोधी न्यायपालिका का उद्भव खतरनाक प्रवृत्ति है। दिल्ली के मद्रासी कैंप विध्वंस इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। अदालतों ने गरीबों के मौलिक अधिकारों को निर्ममता से कुचला। यह प्रवृत्ति सरकार-न्यायपालिका गठजोड़ को उजागर करती है।

न्यायपालिका ने वैज्ञानिक प्रमाणों को धता बताया। यह लोकतंत्र की आधारशिला को कमजोर कर रहा है। गरीबों के प्रति यह रवैया संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है। अनुच्छेद 39क का उल्लंघन स्पष्ट दिखाई देता है। न्याय तक पहुँच का अधिकार सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया।

वैज्ञानिक साक्ष्यों की अवहेलना

मद्रासी कैंप मामले में तकनीकी प्रमाण अकाट्य थे। आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर गिरीश अग्रवाल की रिपोर्ट निर्णायक थी। उन्होंने सिद्ध किया कि बाढ़ का कारण बीबीएम फ्लाईओवर निर्माण था। बारापुला नाले में जमा कंक्रीट मलबे ने रुकावट पैदा की। 2010 के उपग्रह चित्रों ने नाले के मार्ग परिवर्तन को दिखाया।

पुराने मुगलकालीन पुल और नए पुल का संरेखण दोषपूर्ण था। तीनों पुलों की संरचनात्मक विसंगतियाँ स्पष्ट थीं। फिर भी गरीब विरोधी न्यायपालिका ने सबूतों को नकार दिया। अदालत ने सरकारी दावों को बिना सत्यापन स्वीकारा।

विध्वंस की तत्काल अनुमति दी गई। यह फैसला पूर्वाग्रह से ग्रसित था। न्यायपालिका ने विज्ञान के साथ विश्वासघात किया।

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वज़ीरपुर का संवैधानिक अपहरण

वज़ीरपुर में रेलवे ने सुरक्षा का झूठा नैरेटिव गढ़ा। आधिकारिक नोटिस केवल ऊपरी मंजिलों के हटाने का उल्लेख करता था। पर बुलडोजरों ने सम्पूर्ण बस्ती को ध्वस्त कर दिया। शांति देवी की एक मंजिला कच्ची झोपड़ी भी नष्ट हुई। उनके परिवार के पास 1975 के राशन कार्ड प्रमाण थे।

न्यायपालिका ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया। न्यायालय ने प्रशासन को असीमित छूट दे दी। यह गरीबों के प्रति संस्थागत पूर्वाग्रह को दर्शाता है। विध्वंसोपरांत पुनर्वास का कोई प्रबंध नहीं हुआ। परिवार नीम के पेड़ के नीचे आश्रयहीन हैं।

पुलिस ने बिस्तर तक निकालने की अनुमति नहीं दी। सर्वोच्च न्यायालय के 2024 के निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन हुआ।

न्यायिक अधिनायकवाद

दिल्ली उच्च न्यायालय ने सुनवाई में स्पष्ट घोषणा की। न्यायमूर्ति ने कहा “हम राज्य के तथ्यों पर प्रश्न नहीं करेंगे”। यह टिप्पणी न्यायपालिका की मानसिकता प्रकट करती है। न्यायाधीशों ने स्थानीय आयुक्त नियुक्त करने से साफ मना किया। स्वतंत्र वैज्ञानिक रिपोर्ट को तुच्छ ठहराया गया।

सरकारी हलफनामे को अंतिम सत्य मान लिया गया। गरीब विरोधी न्यायपालिका ने तथ्यों की जाँच का प्रयास तक नहीं किया। यह न्यायिक उदासीनता का भयावह उदाहरण है। अदालतें सरकारी निर्णयों को चुनौती देने से कतराती हैं।

यह न्यायपालिका की स्वायत्तता पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। जनहित याचिकाओं का सुनियोजित दुरुपयोग हुआ।

पुनर्वास का भयावह मिथक

मद्रासी कैंप के 370 परिवारों को बेघर किया गया। केवल 189 परिवारों को पुनर्वास का भ्रम दिया गया। उन्हें नरेला के दूरस्थ डीडीए फ्लैट्स में ढकेला गया। यह स्थान मूल बस्ती से 44 किमी दूर है। वहाँ न विद्युत सुविधा थी न पेयजल व्यवस्था। सुरक्षा के नाम पर कोई प्रबंध नहीं था। अपराधप्रवण इलाके में रहने को मजबूर किया गया।

गरीब विरोधी न्यायपालिका ने जानबूझकर उपेक्षा की। न्यायालय ने पुनर्वास का नाटकीय दिखावा किया। विस्थापितों पर आर्थिक और सामाजिक दोहरी मार पड़ी। रोजगार छिनने से परिवार भुखमरी के कगार पर पहुँचे। बच्चों की शिक्षा स्थायी रूप से बाधित हुई। डीयूएसआईबी प्रोटोकॉल का स्पष्ट उल्लंघन हुआ।

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सामाजिक ताने-बाने का विघटन

इन निर्णयों ने सामाजिक संरचना को गहरा आघात पहुँचाया। मद्रासी कैंप छह दशक पुरानी तमिल सांस्कृतिक बस्ती थी। वज़ीरपुर निवासियों के पूर्वज 1970 में चेन्नई से आए थे। न्यायपालिका ने ऐतिहासिक विरासत मिटा दी। ये समुदाय दिल्ली की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। दिहाड़ी मजदूर, घरेलू सहायक, निर्माण श्रमिक का काम करते हैं।

न्यायपालिका ने उन्हें ही सजा दी। सामाजिक विश्वास का पूर्णतः क्षरण हुआ। शहरी गरीबों में स्थायी भय का वातावरण बना। हाशिये के समुदायों का भरोसा समाप्त हो गया। पड़ोसी संबंधों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। सामुदायिक एकता स्थायी रूप से नष्ट हुई।

ऐतिहासिक न्यायिक विरासत का विरोधाभास

भारतीय न्यायपालिका का इतिहास गौरवशाली रहा है। केशवानंद भारती मामले में मूल संरचना सिद्धांत दिया। ओल्गा टेलिस मामले में फुटपाथवासियों के अधिकार सुरक्षित किए। परन्तु वर्तमान न्यायपालिका द्वारा गरीबों का विरोध चिंताजनक है। यह न्यायिक विरासत के सीधे विपरीत है। न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती के योगदान को भुला दिया गया।

सार्वजनिक हित मुकदमेबाजी का मूल उद्देश्य विकृत हुआ है। गरीब विरोधी न्यायपालिका इसका जीता जागता उदाहरण है। 2017 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को नजरअंदाज किया गया। अदालतों ने गरीबों को संरक्षण देने से इनकार किया।

विनाशकारी आर्थिक परिणाम

झुग्गी विध्वंस से दिल्ली की अर्थव्यवस्था को नुकसान हुआ। शहर के 85% निर्माण श्रमिक झुग्गियों में रहते हैं। विस्थापन से श्रमिकों का तीव्र संकट उत्पन्न हुआ। 40% निर्माण परियोजनाएँ अनिश्चित काल तक रुकी हैं। 1200 छोटे व्यवसाय स्थायी रूप से नष्ट हुए हैं।

अनौपचारिक अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। पुनर्वास स्थलों पर रोजगार के अवसर नहीं हैं। यातायात लागत बढ़ने से आय में 60% कमी आई। गरीब विरोधी न्यायपालिका ने आर्थिक संकट गहराया है। शहर की जीडीपी वृद्धि दर प्रभावित हुई है।

निर्णयों में अंतर्राष्ट्रीय कलंक की झलक

वैश्विक स्तर पर भारत की न्यायपालिका की आलोचना हुई। ब्राज़ील ने फ़वेला नीतियों में मानवीय सुधार किए। दक्षिण अफ्रीका ने संवैधानिक संरक्षण प्राथमिकता दी। भारत की गरीब विरोधी न्यायपालिका विश्व स्तर पर निंदित है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने तीखी प्रतिक्रिया दी।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के सिद्धांतों की घोर उपेक्षा हुई। गरीब विरोधी न्यायपालिका राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को कलंकित करती है। वैश्विक मानवाधिकार सूचकांक में भारत की रैंकिंग गिरी है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने कठोर रिपोर्ट्स प्रकाशित की हैं।

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न्यायपालिका युवा पीढ़ी द्वारा युवाओं के साथ विश्वासघात

कानून के 72% विद्यार्थी न्याय व्यवस्था से मोहभंग हैं। एनएलएसआईयू के सर्वेक्षण में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। न्यायिक सेवाओं में करियर बनाने की इच्छा 40% घटी। सामाजिक कार्यकर्ता गहरी निराशा व्यक्त कर रहे हैं। गरीब विरोधी न्यायपालिका युवाओं को न्याय से विमुख कर रही है।

इसके दीर्घकालिक दुष्परिणाम भयावह होंगे। न्यायिक सुधार आंदोलन तेजी से बढ़ रहे हैं। विश्वविद्यालयों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। युवा वकील न्यायिक जवाबदेही की माँग कर रहे हैं।

भारतीय मीडिया की विफल भूमिका

जनचेतना जगाने में मुख्यधारा मीडिया पूर्णतः विफल रही। 90% टीवी चैनलों ने विध्वंस को कवरेज नहीं दिया। अखबारों ने संपादकीय पृष्ठ पर कोई टिप्पणी नहीं की। गरीब विरोधी न्यायपालिका को मीडिया का समर्थन मिला। यह चौथे स्तंभ की ऐतिहासिक विफलता है।

जनता को स्वतंत्र डिजिटल मंचों पर निर्भर रहना पड़ा। द लीफलेट और न्यूज़लॉन्ड्री जैसे मंचों ने सच उजागर किया। मीडिया घरानों के व्यावसायिक हित स्पष्ट दिखे। गरीबों के प्रति मीडिया का रवैया उदासीन रहा।

न्यायिक जवाबदेही के ठोस उपाय की जरूरत

सर्वप्रथम न्यायालयों को वैज्ञानिक प्रमाणों को प्राथमिकता देनी होगी। डीयूएसआईबी प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन अनिवार्य करें। विध्वंस से पूर्व पुनर्वास को संवैधानिक बनाएँ। न्यायाधीशों को स्वयं स्थल का भौतिक निरीक्षण करना चाहिए।न्यायपालिका की प्रवृत्ति का सार्वजनिक विरोध करें।

जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग पर कानूनी प्रतिबंध लगाएँ। विशेषज्ञ समितियाँ बनाकर वास्तविकता का आकलन करें। नीति निर्माताओं को तत्काल ठोस कदम उठाने होंगे। सामाजिक संगठनों की भूमिका सक्रिय करनी होगी। न्यायिक प्रशिक्षण में मानवाधिकार अनिवार्य करें। संवेदनशीलता कार्यक्रम को न्यायिक प्रक्रिया में शामिल करें।

न्यायपालिका, भविष्य की राष्ट्रीय चुनौती

गरीब विरोधी न्यायपालिका भारतीय लोकतंत्र के लिए अस्तित्वगत खतरा है। मद्रासी कैंप और वज़ीरपुर राष्ट्रीय चेतावनी हैं। अदालतों को संविधान की मूल भावना पुनर्जीवित करनी होगी। न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया पूर्ण करना नहीं है। यह मानवीय संवेदना और सामाजिक न्याय का प्रश्न है।

न्यायपालिका को स्वयं गरीब विरोधी नीति को तत्काल समाप्त करना होगा। संस्थागत सुधार अब गैर-विकल्प हैं। न्याय व्यवस्था का मौलिक उद्देश्य संकट में है। प्रत्येक नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन का संवैधानिक अधिकार है। न्यायपालिका को भारतीय संविधान के मूल्यों की रक्षा करनी होगी। यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय शर्म का स्थायी दाग बन चुकी है।

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