त्रासदी की तस्वीरें साझा करना: मानवाधिकार का घोर उल्लंघन!
एक चित्र हजारों आँसू
एक आतंकवादी हमले ने नवविवाहिता का जीवन ठहरा दिया। पति के शव के पास बैठी उसकी तस्वीर राष्ट्रीय शोक प्रतीक बनी। हम उसे हर मंच पर साझा करते हैं। यह हर घर तक पहुँच जाती है। एक पल में निजी पीड़ा सार्वजनिक हो जाती है। छुट्टी दुःस्वप्न बन जाती है। रंगीन भविष्य अँधेरे में डूब जाता है। असहाय स्त्री वायरल सामग्री बन जाती है। यह सामूहिक सहानुभूति नहीं है। यह मानवाधिकार का सीधा उल्लंघन है। मानवाधिकार केवल जीवितों तक सीमित नहीं हैं।
यह कोई पृथक घटना नहीं
ऐसी घटनाएँ अकेली नहीं हैं। पिछले वर्ष कोलकाता का आरजी कर अस्पताल प्रकरण याद करें। बलात्कार पीड़िता की पीड़ादायक तस्वीरें वायरल हुईं। सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा। उसने सभी मीडिया सामग्री हटाने का आदेश दिया।
क्या सही कार्य हेतु सदैव न्यायालयी आदेश प्रतीक्ष्य है? यह मानवाधिकार की सुरक्षा का मूलभूत प्रश्न है। वर्ष 2022 में उत्तराखंड की बाढ़ पीड़ितों के चित्रों ने भी इसी प्रकार मानवाधिकारों को ठेस पहुँचाई।
मृतकों के भी होते हैं अधिकार
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए। मीडिया और सोशल मीडिया को शवों की अशोभनीय छवियों से परहेज करना चाहिए। आवश्यकतावश शव दिखाना हो तो मास्किंग तकनीक प्रयोग करें। यह मृतक की गोपनीयता एवं प्रतिष्ठा के अधिकार हेतु अनिवार्य है।
यह परामर्श (14 मई, 2021) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 पर आधारित है। यह अनुच्छेद जीवितों और मृतकों दोनों को गरिमा और निजता का अधिकार प्रदान करता है। अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून भी इसकी पुष्टि करते हैं। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति ने स्पष्ट किया है। गरिमा का अधिकार मृत्यु के पश्चात भी बना रहता है।
यूरोपीय मानवाधिकार अभिसमय भी मृतकों के सम्मान की बात करता है। जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों में विशिष्ट कानून हैं। ये मृतकों की छवियों के दुरुपयोग को रोकते हैं। भारत में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 भी प्रासंगिक है।
यह पीड़ितों की गरिमा सुनिश्चित करता है। फिर भी हम संवेदनशील तस्वीरों को सार्वजनिक संपत्ति मानते हैं। केवल पहुँच होना उपयोग की अनुमति नहीं देता। यह मानवाधिकार के प्रति सम्मान की कमी दर्शाता है।
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व्यक्तिगत शोक का अनादर क्यों?
मैं अपने भाई के अंतिम दिनों को याद करता हूँ। वह रातोंरात एक “शव” में परिवर्तित हो गया। समाचार आने से पूर्व ही चर्चा प्रारंभ हो गई। हजारों किलोमीटर दूर अजनबी उसकी मृत्यु का विश्लेषण करने लगे। श्मशान घाट पर कोई मेरी तस्वीर खींचकर सोशल मीडिया पर डाल देता है।
उस एक छवि ने मेरी मनःस्थिति को विषाक्त कर दिया। यह मुझे बचपन की सुखद स्मृतियों में ले गई। तत्काल कठोर वास्तविकता का सामना करना पड़ा। यह व्यक्तिगत मानवाधिकार का स्पष्ट हनन था। ऐसी घटनाएँ पीड़ित परिवारों को द्वितीयक आघात पहुँचाती हैं।
जीवितों पर पड़ने वाला प्रभाव
जीवित बचे लोग भी आपके समान सामान्य जीवन जी रहे थे। तभी अचानक आपदा ने उन्हें आ घेरा। उन पर दोहरा संकट आ पड़ता है। प्रियजन के असामयिक चले जाने का दुःख। पुलिस जाँच और प्रशासनिक औपचारिकताओं का अतिरिक्त बोझ। त्रासदी से उबरने हेतु उन्हें मनोवैज्ञानिक समर्थन चाहिए।
सोशल मीडिया पर अवांछित चर्चा घाव पर नमक छिड़कने समान है। यह उनके मानसिक स्वास्थ्य के अधिकार का हनन है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देश इसे स्वीकार करते हैं। पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) का खतरा बढ़ जाता है।
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मानसिक छवियाँ स्थायी रूप से अंकित हो जाती हैं
आपके लिए वह भीषण छवि स्क्रॉल करने मात्र की वस्तु हो सकती है। आपकी सहानुभूति क्षणभंगुर हो सकती है। किंतु मृतक के परिजनों को जीवनपर्यंत उसी छवि के साथ जीना होगा। ये अनचाहे डिजिटल प्रभाव उनके मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं। वे “लड़ो या भागो” (Fight or Flight) स्थिति में फंस सकते हैं।
हर शब्द और क्रिया गहरा मानसिक घाव करती है। उन्हें स्वस्थ होने हेतु सुरक्षित वातावरण चाहिए। उनके मन-मस्तिष्क को सामान्य होने में लम्बा समय लगता है। हमें उनकी पुनर्प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए। यह उनके मानवाधिकार की मौलिक माँग है।
डिजिटल युग में गोपनीयता का संकट
स्मार्टफोन और हाई-स्पीड इंटरनेट ने स्थिति बदतर बनाई है। अब कोई भी घटना सेकंडों में वैश्विक हो जाती है। पीड़ित परिवारों के पास नियंत्रण का कोई अवसर नहीं रहता। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट मॉडरेशन अपर्याप्त है। यूरोपियन यूनियन के डिजिटल सर्विसेज एक्ट जैसे प्रयास सराहनीय हैं।
भारत में आईटी नियम, 2021 में संवेदनशील सामग्री हटाने के प्रावधान हैं। किंतु प्रवर्तन एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक इस संदर्भ में आशा की किरण है। यह निजता के अधिकार को मजबूती दे सकता है।
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हमारी सामूहिक जवाबदेही क्या है?
मृत्यु के प्रति उदासीनता समाज के लिए हानिकारक है। हम सामूहिक रूप से नैतिक मानदंडों को कमजोर करते हैं। किसी हृदयविदारक घटना के पश्चात सदमा और क्रोध स्वाभाविक है। किंतु शेयर बटन दबाने से पूर्व क्षण भर रुकिए। विचार कीजिए। क्या हम सब मरणशील नहीं हैं?
खलील जिब्रान ने सटीक कहा: “जीवन और मृत्यु एक हैं। जैसे नदी और समुद्र।” मृत्यु को वस्तु नहीं बनाया जा सकता। मृत्यु सम्मान की अधिकारिणी है। मृत्यु मौन की माँग करती है। आइए, हम मृतकों और उनके परिजनों के मानवाधिकार का आदर करें।
यह हमारी सामूहिक मानवता की परीक्षा है। शिक्षा और जागरूकता इसका प्रमुख उपाय है। मीडिया साक्षरता पाठ्यक्रमों में इसे शामिल किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष: एक सभ्य समाज की ओर
त्रासदी की तस्वीरें साझा करना केवल अनैतिक नहीं है। यह मानवाधिकार का गंभीर उल्लंघन है। हमें व्यक्तिगत आवेग पर सामाजिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता देनी होगी। मृतकों की गरिमा और जीवितों की भावनाएँ सम्मान के योग्य हैं।
प्रौद्योगिकी का उपयोग संवेदनशीलता के साथ होना चाहिए। कानूनी प्रावधानों के साथ-साथ नैतिक चेतना भी जरूरी है। याद रखें: आज का पीड़ित परिवार कल आपका अपना भी हो सकता है। मानवाधिकार की सुरक्षा हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।



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