असफल विदेश नीति और कुंठा के बीच सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का सच
असफल विदेश नीति कुंठा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 8-11 जनवरी 2026 को आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व, जिसे महमूद गजनी द्वारा 1026 में सोमनाथ मंदिर पर किए गए पहले हमले की 1000वीं वर्षगांठ के रूप में “राष्ट्रीय स्वाभिमान दिवस” के तौर पर मनाया गया, वास्तव में एक भव्य लेकिन सतही इवेंट मैनेजमेंट का उदाहरण था।
इंडिया टीवी, द हिन्दू, रिपब्लिक वर्ल्ड और एएनआई जैसी मीडिया रिपोर्ट्स से साफ है कि इसमें 108 घोड़ों की शौर्य यात्रा, 1,000 छात्रों द्वारा 72 घंटे का निरंतर ‘ओमकार मंत्र’ जाप, 3,000 ड्रोन्स का शो, भव्य आतिशबाजी और मोदी का त्रिशूल-डमरू बजाना शामिल था।
मोदी ने अपने भाषण में कहा कि “1000 साल पहले आक्रमणकारियों ने सोचा था कि वे जीत गए, लेकिन आज भी सोमनाथ का झंडा फहरा रहा है।” उन्होंने इसे “सनातन संस्कृति की अजेयता” का प्रतीक बताया। लेकिन यह कार्यक्रम एक ‘मरणासन्न राष्ट्र’ को जिंदा दिखाने की कोशिश मात्र थी, जहां देश बेरोजगारी, महंगाई और वैश्विक दबाव से जूझ रहा है।
सत्ता की अहंकारपूर्ण असंवेदनशीलता यहां साफ झलकती है, जब आम जनता रोजमर्रा की जिंदगी में संघर्ष कर रही है, तो 1000 साल पुरानी घटना को उछालकर वर्तमान की विफलताओं से ध्यान भटकाना क्रूर और हास्यास्पद लगता है।
बेरोजगारी की मार और सत्ता का अहंकारपूर्ण मौन
देश में बेरोजगारी की स्थिति भयावह है, जहां PLFS 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि बेरोजगारी दर 5.2% तक पहुंच गई है, जबकि 15-29 आयु वर्ग के युवाओं में यह आंकड़ा 15-20% से ऊपर बना हुआ है।
असफल विदेश नीति और कुंठा के इस दौर में, जब सरकार को रोजगार सृजन पर ध्यान देना चाहिए था, तब सारा ध्यान भव्य आयोजनों पर है।
सत्ता के गलियारों में जो असंवेदनशीलता है, वह साफ दिखाती है कि वर्तमान की आर्थिक विफलताओं को छिपाने के लिए इतिहास का सहारा लिया जा रहा है। आम आदमी जब महंगाई की चक्की में पिस रहा है, तब सरकार करोड़ों रुपये ड्रोन शो और आतिशबाजी में फूंक रही है।
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नेहरू पर निशाना और इतिहास की विवादास्पद व्याख्या
इस आयोजन में मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू को “गुलाम मानसिकता” वाला बताकर अपनी पुरानी राजनीतिक दुश्मनी निकाली। टाइम्स ऑफ इंडिया और द हिन्दू की रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने कहा कि “आक्रमण सिर्फ लूट नहीं, सभ्यता पर हमला थे।
” मोदी ने गजनी से लेकर औरंगजेब तक के हमलों को “घृणा और आतंक” का इतिहास बताया और पिछली सरकारों पर “इतिहास छिपाने” का आरोप लगाया। हालांकि, इतिहासकार इरफान हबीब और अल-बिरूनी की समकालीन रिपोर्ट्स बताती हैं कि गजनी के हमले धार्मिक युद्ध से ज्यादा आर्थिक लूट के लिए थे, जो उसकी सैन्य शक्ति का ईंधन बने।
मोदी की यह व्याख्या इसे “सभ्यता संघर्ष” बनाकर वर्तमान में साम्प्रदायिक तनाव को भड़काने का काम करती है। एनडीटीवी और द वीक के अनुसार, उन्होंने “कॉलोनियल माइंडसेट” वाले लोगों को आज भी सक्रिय बताया है, जो प्रगति के नाम पर केवल बाधा उत्पन्न करते हैं।
अमेरिका की लताड़ और वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति
अमेरिका द्वारा भारत को लगातार अपमानित किए जाने का संदर्भ वर्तमान स्थिति में पूरी तरह सटीक बैठता है। 2025-2026 में H-1B वीजा इंटरव्यूज के बड़े पैमाने पर स्थगन (दिसंबर 2025 से जुलाई 2026 तक) ने हजारों भारतीय IT प्रोफेशनल्स के भविष्य को अधर में लटका दिया है।
द वॉशिंग्टन पोस्ट और फ्रागोमैन की रिपोर्ट्स इसे सोशल मीडिया वेटिंग पॉलिसी का परिणाम मानती हैं। साथ ही, रूसी तेल व्यापार पर ट्रंप के 25% टैरिफ के दबाव ने मोदी सरकार की कमजोरी को उजागर कर दिया है।
रायटर और अल जजीरा के अनुसार, व्लादिमीर पुतिन ने दिसंबर 2025 में तीखा सवाल किया कि “अगर अमेरिका रूसी ईंधन खरीद सकता है, तो भारत क्यों नहीं?” यह स्थिति मोदी की “विश्व गुरु” वाली छवि को गहरी चोट पहुंचाती है।
धार्मिक अनुष्ठान के पीछे छिपी कूटनीतिक असफलता
सोमनाथ का यह कार्यक्रम दरअसल जनता के बीच गिरती साख को बचाने का एक धार्मिक अनुष्ठान था। असफल विदेश नीति और कुंठा से उपजी निराशा को सरकार 1000 साल पुराने “प्रतिशोध” में बदलकर सत्ता बचाने की सस्ती चाल चल रही है।
जब वास्तविक विदेश नीति फेल हो रही है और वैश्विक मंच पर भारत को दबाया जा रहा है, तब इस तरह के प्रतीकात्मक प्रदर्शन जनता का ध्यान भटकाने का काम करते हैं।
75 साल पहले 1951 में सरदार पटेल द्वारा किए गए सोमनाथ के पुनर्निर्माण को भी आज एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, जो विकास की जगह विभाजनकारी इतिहास पर केंद्रित है।
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गिरती GDP और वैज्ञानिक अनुसंधान की अनदेखी
क्या रामनाम, राममंदिर, विश्वनाथ और सोमनाथ जैसे प्रतीकों से ही भारत का स्वाभिमान अक्षुण्ण रहेगा? वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ की 2025-2026 की रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत की GDP ग्रोथ Q2 FY26 में 8.2% रही, लेकिन पूरे वित्तीय वर्ष के लिए यह अनुमान घटकर 6.5-6.6% रह गया है, जो पहले के 7-8% के मुकाबले काफी कम है।
वैज्ञानिक अनुसंधान में भारत का निवेश GDP का मात्र 0.7% है, जबकि चीन का 2.4% है। एनईपी 2020 (NEP 2020) की विफलता के कारण ड्रॉपआउट रेट भी बढ़ा है। मोदी की स्पीच में “इतिहास का बदला” वाली भाषा युवाओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बजाय त्रिशूल और डमरू की ओर धकेल रही है, जबकि देश को औद्योगिक विकास की सख्त जरूरत है।
अंधराष्ट्रवाद का बढ़ता खतरा और साख का संकट
देश की जनता को अमेरिका की रोजाना लताड़ की हकीकत पता चल चुकी है। 2026 में यूएस-इंडिया ट्रेड डिस्प्यूट्स में WTO में मिली हार और रूसी तेल पर प्रतिबंध की धमकी ने साफ कर दिया है कि मोदी की विदेश नीति कमजोर है।
असफल विदेश नीति और कुंठा के इस माहौल में पुतिन की टिप्पणियां (इंडिया टुडे, द गार्जियन) कि “भारत अपमान नहीं सहेगा” लेकिन अमेरिका हिपोक्रेटिक है, मोदी की असहायता को ही उजागर करती हैं।
यह धार्मिक पाखंड एक मरते हुए राष्ट्र की निशानी है, जहां OECD रिपोर्ट के अनुसार भारत की पेटेंट्स में हिस्सेदारी केवल 1.2% है। प्रगति की जगह अंधराष्ट्रवाद को बढ़ावा देना राष्ट्र को पीछे ले जाने वाला कदम है।
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प्रगतिशीलता का मार्ग और भविष्य की राह
किसी राष्ट्र की उन्नति केवल मंदिरों, मूर्तियों और तीर्थाटन से नहीं होती। डेलॉयट (Deloitte) और आईएमएफ रिपोर्ट्स के अनुसार, मजबूत घरेलू मांग और सुधारों से ही विकास संभव है, लेकिन इसके लिए वैज्ञानिक अनुसंधान और बौद्धिकता की आवश्यकता है।
सोशल न्यूज XYZ और इंस्टाग्राम पर मोदी का त्रिशूल भांजना और डमरू बजाना एक अमानवीय प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है, जो धार्मिक कट्टरवाद को राष्ट्रभक्ति का नाम देता है। यदि भारत को वास्तव में स्वाभिमानी बनाना है, तो असफल विदेश नीति और कुंठा का मार्ग छोड़कर आर्थिक विकास और प्रगतिशीलता पर ध्यान देना होगा।
इतिहास का बदला विकास से लिया जाना चाहिए, न कि पुरानी घृणा से। इसरो (ISRO) जैसी सफलताएं असली स्वाभिमान हैं, न कि सड़कों पर होने वाले धार्मिक प्रदर्शन।
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