“कोश्यारी को पद्म भूषण” सम्मान से महाराष्ट्र की राजनीति में मचा भारी घमासान
केंद्र सरकार द्वारा गणतंत्र दिवस 2026 की पूर्व संध्या पर महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी को पद्म भूषण देने की घोषणा ने देश की राजनीति में, विशेषकर महाराष्ट्र में, एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है।
कोश्यारी को पद्म भूषण देने के फैसले का जहां भाजपा और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने स्वागत किया है, वहीं महाराष्ट्र के विपक्षी गठबंधन ‘महा विकास अघाड़ी’ (MVA) ने इसे राज्य के महान प्रतीकों और संवैधानिक मूल्यों का अपमान करार दिया है।
2019 में देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार के सुबह-सुबह किए गए शपथ ग्रहण समारोह से लेकर छत्रपति शिवाजी महाराज पर की गई विवादित टिप्पणियों तक, कोश्यारी का कार्यकाल हमेशा से सुर्खियों और विवादों के केंद्र में रहा है।
सुबह-सुबह शपथ ग्रहण और संवैधानिक मर्यादा का सवाल
महाराष्ट्र की राजनीति में कोश्यारी के कार्यकाल को उस ‘बदनाम’ पल के लिए हमेशा याद किया जाता है, जब 2019 में उन्होंने देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार को सुबह-सुबह शपथ दिलाई थी। उस समय शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस गठबंधन बनाने की बातचीत कर रहे थे।
विपक्षी नेताओं का आरोप है कि इस कदम ने राज्यपाल पद की गरिमा पर दाग लगाया और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को दरकिनार कर भाजपा को सत्ता में लाने की कोशिश की गई।
हालांकि, यह सरकार केवल तीन दिन ही चल सकी थी, लेकिन इस घटना ने कोश्यारी के प्रशासनिक करियर पर एक गहरा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया, जो आज भी थमने का नाम नहीं ले रहा है।
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MVA नेताओं का तीखा प्रहार और अपमान का आरोप
महा विकास अघाड़ी के प्रमुख नेताओं ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की है। शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत और मुंबई कांग्रेस प्रमुख वर्षा गायकवाड़ ने स्पष्ट कहा कि कोश्यारी को पद्म भूषण देना महाराष्ट्र का सीधा अपमान है।
वर्षा गायकवाड़ का आरोप है कि कोश्यारी ने अपने कार्यकाल के दौरान छत्रपति शिवाजी महाराज, महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले जैसी पूजनीय हस्तियों के बारे में अपमानजनक बातें कहीं।
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने तो यहाँ तक दावा किया कि कोश्यारी ने हमेशा संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुँचाई है। उन्होंने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि उन्होंने पुणे के एक संगठन का पुरस्कार भी इसीलिए ठुकरा दिया था क्योंकि उसे कोश्यारी होस्ट करने वाले थे।
राजभवन बनाम लोकभवन: विवादों के बीच का कार्यकाल
भगत सिंह कोश्यारी का सितंबर 2019 से फरवरी 2023 तक का कार्यकाल राजभवन और तत्कालीन उद्धव ठाकरे सरकार के बीच लगातार टकराव का गवाह रहा। उद्धव ठाकरे ने उन्हें “ओवरएक्टिव” गवर्नर करार दिया था और आरोप लगाया था कि राज्य कैबिनेट की सिफारिश के बावजूद उन्होंने विधान परिषद की 12 रिक्त सीटों को नहीं भरा।
विपक्ष का तर्क है कि कोश्यारी को पद्म भूषण वास्तव में उस ‘तख्तापलट’ में मदद करने का इनाम है, जिसके जरिए उद्धव सरकार को गिराकर मौजूदा शिंदे-भाजपा गठबंधन की नींव रखी गई थी। राज्यपाल रहते हुए उन्होंने शिवाजी महाराज को ‘पुराने समय का आइकन’ कहा था, जिससे पूरे महाराष्ट्र में जन-आक्रोश भड़क उठा था।
उत्तराखंड की मिट्टी से शुरू हुआ कोश्यारी का राजनीतिक सफर
भगत सिंह कोश्यारी की जड़ें उत्तराखंड की राजनीति में बेहद गहरी हैं। 1942 में बागेश्वर में जन्मे कोश्यारी ने अपने जीवन की शुरुआत एक शिक्षक और पत्रकार के रूप में की थी। 1975 में आपातकाल के दौरान उन्हें ‘मीसा’ (MISA) के तहत अल्मोड़ा और फतेहगढ़ जेलों में हिरासत में रखा गया था।
उन्होंने 1975 में ‘पर्वत पीयूष’ नामक साप्ताहिक पत्रिका की शुरुआत की थी। उनके लंबे राजनीतिक सफर में वे उत्तराखंड के दूसरे मुख्यमंत्री (2001-2002) रहे। उनके पास उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के विधानमंडलों के साथ-साथ लोकसभा और राज्यसभा, यानी संसद के दोनों सदनों में सेवा करने का दुर्लभ गौरव प्राप्त है।
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मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और देवेंद्र फडणवीस का बचाव
जहाँ एक तरफ विरोध हो रहा है, वहीं भाजपा नेताओं ने इस सम्मान को सही ठहराया है। उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी ने इसे कोश्यारी की सादगी और अनुशासन के प्रति “सही श्रद्धांजलि” बताया। वहीं, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने संजय राउत पर पलटवार करते हुए कहा कि केवल छोटी सोच वाले लोग ही इस सम्मान का विरोध कर रहे हैं।
फडणवीस ने याद दिलाया कि कोश्यारी ने ‘वन रैंक, वन पेंशन’ कमेटी की अध्यक्षता की थी और उनकी रिपोर्ट के आधार पर ही केंद्र ने इस मांग को स्वीकार किया था। उन्होंने यह भी कहा कि नेपाल के साथ भारत के संबंधों को मजबूत करने में उनकी भूमिका सराहनीय रही है।
RSS के प्रति समर्पण और आलोचनाओं पर कोश्यारी का जवाब
आलोचनाओं के बीच भगत सिंह कोश्यारी ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए स्पष्ट संदेश दिया है। उन्होंने ANI से बात करते हुए कहा कि वे किसी की प्रशंसा या बुराई के लिए काम नहीं करते। उन्होंने स्वयं को एक ‘RSS कार्यकर्ता’ बताते हुए कहा कि उनके लिए भारत माता ही सब कुछ है और वे उनके लिए कार्य करते रहेंगे।
कोश्यारी का मानना है कि उनका जीवन समाज सेवा और संगठन के प्रति समर्पित रहा है, और पद्म भूषण उनके छह दशकों के सार्वजनिक जीवन, लेखन और शिक्षण कार्य की पहचान है। केंद्र सरकार ने भी उन्हें एक सफल शिक्षक और पत्रकार के तौर पर लोक मामलों (Public Affairs) में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया है।
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शिंदे सरकार और उद्धव गुट के बीच बढ़ती राजनीतिक दरार
अंततः, कोश्यारी को पद्म भूषण दिए जाने का यह निर्णय महाराष्ट्र के चुनावी और राजनीतिक परिदृश्य में एक नई दरार पैदा कर रहा है। शिवसेना (UBT) ने इसे ‘लोकतंत्र की हत्या करने वालों’ का सम्मान करार दिया है।
विपक्ष का मानना है कि 2022 के राजनीतिक संकट के दौरान जब उद्धव सरकार ने बहुमत खोया था, तब कोश्यारी की भूमिका पक्षपातपूर्ण थी। यह विवाद केवल एक पुरस्कार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महाराष्ट्र की अस्मिता, महान पुरुषों के सम्मान और राज्यपाल पद की संवैधानिक शक्तियों के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ है, जो आने वाले समय में और भी तीव्र हो सकता है।
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