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भगवा बनाम हरा: मुंब्रा पर एकनाथ शिंदे और सहर शेख में ठनी

भगवा बनाम हरा

महाराष्ट्र की राजनीति में ‘भगवा बनाम हरा’ की बहस ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। ठाणे जिले के मुंब्रा से जुड़े बयानों को लेकर शिवसेना और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के बीच पब्लिक बहस छिड़ने से राज्य का पॉलिटिकल टेम्परेचर तेजी से बढ़ गया है।

डिप्टी चीफ मिनिस्टर एकनाथ शिंदे ने AIMIM लीडर सहर शेख के उस विवादित बयान को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने मुंब्रा को “हरे रंग में रंगने” की बात कही थी। शिंदे ने इसे नागरिक विकास के कार्यों में धार्मिक राजनीति और सांप्रदायिकता घोलने की एक सोची-समझी कोशिश करार दिया है।

मुंब्रा आनंद दिघे का है, कोई इसे हरा कैसे बना सकता है?

मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने सोशल मीडिया और मीडिया ब्रीफिंग के दौरान AIMIM कॉर्पोरेटर के ‘हरे मुंब्रा’ वाले कमेंट पर तीखा पलटवार किया। शिंदे ने दो टूक शब्दों में कहा, “मुंब्रा ठाणे जिले का बस एक छोटा सा हिस्सा है, जो स्वर्गीय आनंद दिघे का है। यह पूरी तरह भगवा है।

कोई इसे हरा कैसे बना सकता है?” उन्होंने रिपोर्टर्स से बातचीत में ठाणे की राजनीतिक विरासत और सांस्कृतिक पहचान पर जोर देते हुए याद दिलाया कि ठाणे जिला महाराष्ट्र का सबसे बड़ा जिला है और इसकी मूल पहचान हिंदुत्व और भगवा से जुड़ी है।

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सहर शेख का विवादित भाषण और ‘हरे रंग’ का असली मतलब

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब AIMIM की सबसे कम उम्र की 22 वर्षीय कॉर्पोरेटर सहर शेख का एक वीडियो वायरल हुआ। अपनी जीत के बाद दिए गए तीखे भाषण में सहर ने कहा था, “अगले पांच साल में मुंब्रा का हर कैंडिडेट AIMIM से होगा। मुंब्रा को पूरी तरह से हरा रंग दिया जाना चाहिए।

” इस बयान के बाद भगवा बनाम हरा की यह जंग सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक फैल गई। हालांकि, विवाद बढ़ता देख सहर शेख ने सफाई दी कि उनके ‘हरे’ शब्द का मतलब केवल AIMIM पार्टी के झंडे का रंग था, न कि किसी धार्मिक भावना को भड़काना। उन्होंने सत्ताधारी दल पर आरोप लगाया कि उनके शब्दों को राजनीतिक फायदे के लिए गलत तरीके से पेश किया गया।

आनंद दिघे की विरासत और शिंदे की जवाबी रणनीति

एकनाथ शिंदे के कड़े रुख का मकसद शिवसेना के वोटर्स को वैचारिक आधार पर एकजुट करना है। शिंदे ने इस विवाद को महज एक राजनीतिक असहमति के रूप में नहीं, बल्कि अपने गुरु आनंद दिघे के गढ़ में एक सीधी चुनौती के तौर पर पेश किया है।

शिंदे ने स्पष्ट किया कि मुंब्रा भले ही एक पॉकेट हो, लेकिन वह उसी विचारधारा को फॉलो करता है जिसे दिघे ने सींचा था। यहाँ भगवा बनाम हरा का मुद्दा उठाकर शिंदे ने साफ कर दिया कि ठाणे की राजनीतिक जमीन पर किसी भी अन्य रंग का वर्चस्व स्वीकार नहीं किया जाएगा।

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ठाणे नगर निगम में AIMIM का बढ़ता ग्राफ और चुनावी समीकरण

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने ठाणे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (TMC) के हालिया नतीजों में अपनी ताकत दिखाकर सबको चौंका दिया है।

पार्टी ने 131 में से 5 सीटें जीतकर कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों को पीछे छोड़ दिया, जो अपना खाता भी नहीं खोल पाईं। यहाँ तक कि शिवसेना (UBT) को भी केवल 1 सीट मिली। पूरे महाराष्ट्र की बात करें तो AIMIM ने 29 में से 13 नगर निगमों में 125 सीटें हासिल की हैं। सहर शेख की यह जीत और उनका आत्मविश्वास इसी बढ़ते ग्राफ का नतीजा माना जा रहा है।

पारिवारिक रंजिश और जितेंद्र आव्हाड से मुकाबला

सहर शेख की राजनीतिक एंट्री भी काफी दिलचस्प रही। सहर के पिता यूनुस शेख कभी एनसीपी (SP) नेता जितेंद्र आव्हाड के बेहद करीबी हुआ करते थे। लेकिन समय के साथ उनके रिश्तों में कड़वाहट आ गई और यह दोस्ती खुली राजनीतिक दुश्मनी में बदल गई।

जब आव्हाड की पार्टी ने सहर को उम्मीदवार बनाने से मना कर दिया, तब वह AIMIM के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरीं। अपनी जीत के बाद सहर ने आव्हाड पर निशाना साधते हुए कहा कि जनता ने उन विरोधियों का घमंड तोड़ दिया है जो मुंब्रा पर हावी होना चाहते थे।

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शाइना एनसी और अन्य नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया

सहर शेख के बयान पर केवल शिंदे ही नहीं, बल्कि शिवसेना नेता शाइना एनसी ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सवाल उठाया कि सहर शेख को यह साफ करना चाहिए कि वह ‘हरे’ रंग से पर्यावरण और सफाई की बात कर रही थीं या फिर धर्म के आधार पर समाज को बांटने की कोशिश कर रही थीं।

सहर ने इसके जवाब में तर्क दिया, “मेरी पार्टी का झंडा हरा है। अगर यह भगवा होता, तो मैं कहती कि हम मुंब्रा को भगवा रंग में रंगेंगे।” उन्होंने यह भी कहा कि वह सिर्फ अल्लाह के सामने जवाबदेह हैं।

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और विकास के दावों के बीच फंसी जनता

सफाई और दावों के बावजूद, यह घटनाक्रम महाराष्ट्र की राजनीति में बढ़ते सांप्रदायिक स्वर को उजागर करता है। ठाणे, जो मुंबई से सटा एक महत्वपूर्ण रणनीतिक केंद्र है, अब वैचारिक जंग का मैदान बन गया है।

जहाँ एक तरफ AIMIM माइनॉरिटी रिप्रेजेंटेशन और लोकल गवर्नेंस के मुद्दे पर मुंब्रा और मुंबई में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है, वहीं शिंदे गुट इसे सांस्कृतिक अस्मिता की लड़ाई बना रहा है। आने वाले समय में भगवा बनाम हरा की यह बहस विकास के वास्तविक मुद्दों पर हावी होती दिख सकती है।

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