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शिंदे गुट vs उद्धव: धनुष-बाण विवाद पर आज सुप्रीम कोर्ट में अंतिम सुनवाई

शिंदे गुट vs उद्धव

शिंदे गुट vs उद्धव के बीच शिवसेना का धनुष-बाण चिन्ह, जो कभी बाला साहेब ठाकरे के उग्र हिंदुत्व का प्रतीक था और 1966 में स्थापित पार्टी की पहचान बना, आज एक राजनीतिक दुविधा के अधर में लटका हुआ है। यह विवाद एक ऐसे दलबदल का शिकार है जहां सत्ता की भूख ने पारिवारिक विरासत को चाकू की तरह चीर दिया है।

याद करिए 2022 का वह काला अध्याय, जब 20 जून को एकनाथ शिंदे ने 39 विधायकों के साथ विद्रोह किया और सूरत के रेनेसांस होटल में गुजरात की बीजेपी सरकार की छत्रछाया में छिप गए। यह सिर्फ सरकार गिराना नहीं था; यह शिवसेना के खून को चूसने वाली सुनियोजित साजिश थी, जिसमें बीजेपी की केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका संदिग्ध रही।

22 जून को शिंदे गुट सूरत से सीधे असम के डिब्रूगढ़ शिफ्ट हो गया, जहां बीजेपी के प्रभाव में वे ‘रिज़ॉर्ट पॉलिटिक्स’ खेलते रहे, जबकि उद्धव ठाकरे की महा विकास अघाड़ी सरकार पर संकट के बादल मंडराने लगे।

27 जून को सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया, लेकिन 29 जून को उद्धव ने इस्तीफा दे दिया, और 30 जून को शिंदे ने बीजेपी समर्थन से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, देवेंद्र फडणवीस को उपमुख्यमंत्री बनना पड़ा।

आज 12 नवंबर 2025, सुप्रीम कोर्ट की अंतिम सुनवाई इस धोखे वाली राजनीतिक नाटक का क्लाइमेक्स है, जहां न्याय के तराजू पर वजन नापा जाएगा कि क्या लोकतंत्र का मतलब सत्ता के दलालों को पुरस्कार देना है। यह चिन्ह, जो दशहरा रैलियों में तीर की तरह चमकता था, अब दोनों गुटों के बीच एक हड्डी की तरह खींचा जा रहा है।

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दलबदल की सुनियोजित साजिश और बीजेपी की भूमिका

यह विवाद शिवसेना को खत्म करने का सुनियोजित षड्यंत्र है, जहां बीजेपी ने शिंदे को मोहरा बनाकर मराठी मानुस की आवाज को कुचल दिया, जैसा कि कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने हाल ही में आरोप लगाया कि बीजेपी की सीनियर लीडरशिप ने ही इस स्प्लिट को एंडोर्स किया।

इस पूरे घोटाले में बीजेपी की भूमिका सबसे घिनौनी है; उन्होंने शिंदे को हथियार बनाकर शिवसेना को नेस्तनाबूद करने की साजिश रची, ताकि महाराष्ट्र में उनका अकेला राज हो।

2019 चुनावों के बाद शिवसेना का बीजेपी से गठबंधन का टूटना और महा विकास अघाड़ी बनाना बीजेपी को चुभ गया, जिसके बाद उन्होंने आंतरिक असंतोष भुनाया, शिंदे जैसे नेताओं को फंडिंग और सपोर्ट देकर विद्रोह करवाया।

उद्धव गुट को ‘फ्लेमिंग टॉर्च’ थमा देना और शिंदे को धनुष-बाण, पुराने सहयोगियों को नेस्तनाबूद करने का बीजेपी का यह आजमाया हुआ तरीका है।

चुनाव आयोग का विवादास्पद फैसला और संविधान की धज्जियां

चुनाव आयोग का 17 फरवरी 2023 का फैसला, शिंदे गुट को ‘असली’ शिवसेना घोषित करना और धनुष-बाण सौंपना, एक ऐसा धोखा था जो संविधान की धज्जियां उड़ा देता है।

आयोग ने तीन टेस्ट लगाए: पार्टी संविधान के उद्देश्यों का (जिसे लागू न मानते हुए 2018 के संशोधनों को ‘अलोकतांत्रिक’ कहा, क्योंकि ये उद्धव के केंद्रीकृत नियंत्रण को बढ़ावा देते थे), विधायी बहुमत का (शिंदे गुट के पास 76% विधायकों का समर्थन, जो 2019 चुनावों में शिवसेना के 1.25 करोड़ वोटों का बड़ा हिस्सा था), और राष्ट्रीय कार्यकारिणी का (शिंदे गुट के पास अधिक जिला प्रमुख)।

आयोग, जो तटस्थ होना चाहिए, विधायी बहुमत के नाम पर संगठनात्मक संरचना को ठेंगा दिखा दिया, जैसे कि लोकतंत्र में विधायक ही पार्टी के मालिक होते हैं। उद्धव गुट की याचिका ठीक कहती है: यह फैसला ‘पर्वर्स’ है, जो दलबदल को इनाम देता है न कि सजा।

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स्पीकर का पक्षपातपूर्ण निर्णय: ‘रीयल शिवसेना’ कौन?

स्पीकर राहुल नार्वेकर का 10 जनवरी 2024 का फैसला तो और भी विवादास्पद था, जिसमें 16 विधायकों, जिसमें शिंदे शामिल थे, को अयोग्य न ठहराना और चुनाव चिन्ह शिंदे को सौंपना, जैसे कि दलबदल कोई पुण्य कार्य हो।

नार्वेकर ने कहा कि शिंदे गुट 21 जून 2022 को ही ‘रीयल शिवसेना’ था, क्योंकि उनके पास विधायी बहुमत था, और उद्धव के व्हिप सुनील प्रभु का अधिकार 21 जून के बाद समाप्त हो गया।

साथ ही, 2018 के संविधान संशोधनों को ‘असंवैधानिक’ बताते हुए कहा कि कोई संगठनात्मक चुनाव 2013 या 2018 में नहीं हुए।

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के मई 2023 के संवैधानिक पीठ के फैसले के खिलाफ है, जो कहता है कि बहुमत विधायी हो या संगठनात्मक, लेकिन यहां तो स्पीकर ने खुलेआम पक्षपात किया, खासकर जब उद्धव गुट ने सुप्रीम कोर्ट में शिकायत की कि स्पीकर ने वर्डिक्ट से तीन दिन पहले शिंदे से मुलाकात की।

शिंदे गुट vs उद्धव: अवसरवाद या विरासत का दावा?

शिंदे गुट vs उद्धव के इस टकराव में, शिंदे, जो खुद को बाला साहेब का वारिस बताते हैं, वास्तव में एक अवसरवादी राजनेता है, फिलहाल बीजेपी की कठपुतली, जिसने शिवसेना की विचारधारा को ताक पर रखकर सत्ता का स्वाद चखा। वहीं, उद्धव ठाकरे, जो कभी मुख्यमंत्री बने लेकिन बीजेपी की चालों में फंस गए, अब इस जाल से निकलने की कोशिश कर रहे हैं।

शिंदे गुट का तर्क, कि वे ‘वास्तविक’ शिवसेना हैं क्योंकि विधायकों का बहुमत, एक धोखेबाज बहाना है, जो पार्टियों के विधायकों को बाजार में बिकाऊ वस्तु की तरह बेचने की इजाजत देता है।

यह महाराष्ट्र की राजनीति को एक सर्कस बना देता है, जहां विचारधारा की जगह सौदेबाजी राज करती है। 2024 विधानसभा चुनावों में शिंदे गुट की 57 सीटें बीजेपी और चुनाव आयोग द्वारा वोट चोरी करके दिलाई गयी थीं यह जग जाहिर हो चुका है।

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जनता का जनादेश और आगामी चुनाव

2023 के लोकसभा चुनावों में शिंदे गुट की 7 सीटें (जबकि उद्धव गुट को 9 मिलीं) से साफ है कि जनता ने स्प्लिट को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। महाराष्ट्र की जनता, जो 1966 से शिवसेना को मराठी अस्मिता का प्रतीक मानती आ रही है, आयोग के फैसले पर थूकती है, क्योंकि यह लोकतंत्र का खुलेआम अपहरण था।

दशहरा 2025 की रैलियों में उद्धव की भारी भीड़ और BMC चुनावों की तैयारी से साफ है कि मराठी मानुस अभी भी बाला साहेब के असली वारिस के साथ है। शिंदे की ‘शिवसेना’ तो सिर्फ एक नकली चेहरा है, जो बीजेपी के इशारों पर नाचता है। आने वाले 2 दिसंबर 2025 से शुरू होने वाले लोकल बॉडी इलेक्शन में यह विवाद BMC जैसे महत्वपूर्ण बॉडीज पर असर डालेगा।

सुप्रीम कोर्ट पर टिकी निगाहें: न्याय या दूषित राजनीति को वैधता?

आज सुप्रीम कोर्ट पर सारी निगाहें टिकी हैं। क्या वे इस अन्याय को सुधारेंगे या फिर दलबदल की संस्कृति को वैधता देंगे? कपिल सिब्बल जैसे वकील उद्धव की पैरवी कर रहे हैं, जबकि मुकुल रोहतगी शिंदे के लिए कोर्ट में खड़े होंगे।

सच्चाई तो कोर्ट के फैसले से ही उजागर होगी, खासकर जब 2023 में ही कोर्ट ने स्पीकर के व्हिप अपॉइंटमेंट को ‘अवैध’ कहा था।

अगर चिन्ह उद्धव को लौटता है, तो यह लोकतंत्र की जीत होगी, जो 10वीं अनुसूची के एंटी-डिफेक्शन लॉ को मजबूत करेगी। अगर चिन्ह शिंदे के पास रहता है, तो महाराष्ट्र की राजनीति हमेशा के लिए दूषित हो जाएगी, और आगामी BMC चुनावों में वोटर का कॉन्फ्यूजन बढ़ेगा।

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लोकतंत्र का कत्ल और मराठी अस्मिता का सवाल

आज महाराष्ट्र की राजनैतिक उठापटक पर पैनी नजर रखने वाले सभी लोगों का ध्यान इस ऐतिहासिक सुनवाई पर है। सवाल यह है कि क्या कोर्ट बाला साहेब की विरासत को बचाएगा या सत्ता की भूखी मशीनरी (क्रेशर) के हवाले कर देगा? उद्धव ठाकरे ने सही कहा, यह ‘लोकतंत्र का कत्ल’ है, जहां पार्टियां बिकती हैं और चुनाव चिन्ह लूटे जाते हैं।

शिंदे गुट vs उद्धव का यह फैसला 2025 के सिविक पोल्स में BMC की 227 सीटों पर सीधा असर डालेगा, जहां अनडिवाइडेड शिवसेना का 1997 से दबदबा रहा है। शिंदे गुट vs उद्धव का यह विवाद बताता है कि राजनीति में वफादारी मर चुकी है, बस सत्ता का नंगा खेल बचा है।

सुप्रीम कोर्ट अगर न्याय करता है तो धनुष-बाण को उसके असली हकदार उद्धव ठाकरे के पास लौटा देगा, वरना ‘महाराष्ट्र की आत्मा’ और ‘मराठी अस्मिता’ दोनों सदा के लिए घायल हो जाएगी। यह सिर्फ चिन्ह का विवाद नहीं, बल्कि लोकतंत्र की गरिमा का भी सवाल है, और अगर कोर्ट फेल होता है, तो जनता खुद फैसला लेगी।

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