Loading Now

बिहार चुनाव: लोकतंत्र की नीलामी, 10 हजार का चुनावी वार

लोकतंत्र की नीलामी बिहार

लोकतंत्र की नीलामी बिहार: बिहार के चुनावी रंगमंच पर मोदी-शाह की जोड़ी ने खुलेआम लोकतंत्र को नीलामी का तमाशा बना दिया है। बिहार इलेक्शन में ₹10,000 की ‘भेंट’ बांटकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर खुलेआम वोटों की खरीद-फरोख्त का आरोप लगा है।

यह ‘भेंट’ मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के नाम पर 75 लाख महिलाओं के खातों में भेजी जा रही है, वह भी चुनाव आचार संहिता लागू होने के ठीक बाद। योजना की शुरुआत 26 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी, जब 7,500 करोड़ रुपये 75 लाख महिलाओं के खाते में डाले गए थे, लेकिन असली खेल तो आचार संहिता लागू होने के बाद अक्टूबर में शुरू हुआ।

आचार संहिता 6 अक्टूबर को लागू हो चुकी थी, इसके बावजूद 17, 24 और 31 अक्टूबर को 10-10 हजार रुपये की किस्तें पहुंचाई गईं। यह कोई सामान्य कल्याणकारी योजना नहीं, बल्कि गरीब महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाने का लॉलीपॉप दिखाकर बीजेपी द्वारा अपनी सत्ता की जड़ें मजबूत करने का सीधा प्रमाण है।

विडंबना यह है कि ये ‘मनी ट्रांसफर’ चुनावी तारीखों से ठीक पहले हो रहे हैं, जैसे कोई सौदेबाजी का अंतिम मिनट का ऑफर हो।

इसे भी पढ़े :-NDA का बिहार चुनाव घोषणापत्र जारी: 1 करोड़ नौकरी, मुफ्त शिक्षा का संकल्प

चुनावी तड़के में ‘उपहार’: केवल बिहार की महिलाओं को क्यों?

इस योजना पर सबसे बड़ा सवाल इसकी प्रकृति को लेकर नहीं, बल्कि इसके चुनावी समय और क्षेत्र के चयन को लेकर है। विपक्षी दलों का सीधा प्रश्न है कि अगर यह वाकई वेलफेयर है, तो पूरे देश की महिलाओं को यह ‘रोजगार’ कब मिलेगा? केवल बिहार को ही क्यों वोट बैंक के रूप में चुना गया?

₹2500 करोड़ की ये किस्तें 25 लाख महिलाओं को 3 अक्टूबर को दी गईं, लेकिन चुनावी तड़के में ये ‘उपहार’ वोटरों को सीधी रिश्वत की तरह लग रही हैं। यह साफ है कि बीजेपी ने बिहार की मिट्टी को अपना ‘वोट का खजाना’ बना लिया है। बिहार की महिलाएं, जो रोजगार की तलाश में भटक रही हैं, उन्हें अब पैसे के मोह में फंसाया जा रहा है।

विपक्षी नेता तेजस्वी यादव ने अपनी ‘माई-बहिन सम्मान योजना’ में ₹2,500 मासिक देने का वादा किया है, जो बीजेपी के ‘कार्ड’ को काउंटर करने का प्रयास है। बिहार की महिलाएं बेवकूफ नहीं; वे समझती हैं कि ये ‘रोजगार योजना’ नहीं, बल्कि चुनावी जुआ है।

आचार संहिता का खुला उल्लंघन और चुनाव आयोग की चुप्पी

राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के सांसद मनोज झा ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर इसे चुनावी आचार संहिता का ‘साफ उल्लंघन’ बताया है, लेकिन आयोग की चुप्पी सबकुछ कह रही है। मनोज झा ने अपनी शिकायत में चेतावनी दी कि यह ट्रांसफर एमसीसी के कई प्रावधानों का खुला उल्लंघन है। 7 नवंबर को दूसरे चरण के वोटिंग से ठीक चार दिन पहले अगली किस्त डाले जाने की तैयारी है, जिसे वोटरों को ‘रिमाइंडर’ भेजने जैसा माना जा रहा है कि ‘हमारा पैसा मत भूलना’।

यह नहीं है उल्लंघन, तो क्या है? पीपुल्स रिप्रेजेंटेटिव एक्ट की धारा 125 भी चीख-चीखकर कह रही है कि यह ‘अवैध प्रभाव’ है। इस योजना को 29 अगस्त को कैबिनेट ने मंजूरी दी थी, लेकिन इसका भुगतान (डिस्बर्समेंट) का शेड्यूल चुनावी कैलेंडर से मेल खाता हुआ क्यों बनाया गया?

आयोग के अधिकारी यह कहकर तर्क दे रहे हैं कि यह ‘प्री-अप्रूव्ड स्कीम’ है, इसलिए उल्लंघन नहीं, लेकिन चुनाव से ठीक पहले पैसे बंट रहे हों, तो ‘प्री-अप्रूवल’ का क्या मतलब? कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भी इसे ‘वोट प्राप्त करने के लिए 10 हजार की रिवड़ी’ करार दिया है।

इसे भी पढ़े :-चुनाव आयोग का बड़ा ऐलान: SIR और बिहार चुनाव दो चरण कार्यक्रम

पप्पू यादव पर सख्ती: विपक्ष को कुचलने का तरीका

एक तरफ बीजेपी की करोड़ों की योजना पर चुप्पी है, तो दूसरी तरफ विपक्ष की छोटी सी मानवीय पहल पर तत्काल कार्रवाई होती है। पप्पू यादव को बाढ़ पीड़ितों को ₹500-₹1000 की मामूली मदद के लिए चुनाव आयोग का नोटिस थमाया गया, और आयकर विभाग ने ‘क्राइम’ का ठप्पा लगाकर पूछताछ शुरू कर दी।

वैशाली के मनियारी गांव में गंगा की तबाही से बर्बाद परिवारों को यादव ने जो थोड़ा-सा सहारा दिया, वह ‘मॉडल कोड वायलेशन’ कैसे हो गया? 9 अक्टूबर को यादव ने नयागांव पूर्वी पंचायत के बाढ़ प्रभावितों को ₹3,000-₹4,000 तक दिए, जिसके लिए सहदेई पुलिस स्टेशन में केस दर्ज हुआ और 16 अक्टूबर को आयकर विभाग का नोटिस आया, जिसमें फंड्स के सोर्स की डिटेल मांगी गई।

यादव ने सोशल मीडिया X पर नोटिस शेयर करते हुए केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय और सांसद चिराग पासवान पर तंज कसा कि वे ‘मूक दर्शक’ बने रहे। यह दोहरा मापदंड लोकतंत्र का गला घोंट रहा है, जहां सत्ता पक्ष को छूट है और विपक्ष को जेल की धमकी। पप्पू यादव जैसे कार्यकर्ता बिहार की सच्ची आवाज हैं, जो बाढ़ की लहरों से ज्यादा सत्ता की लहरों से जूझ रहे हैं।

ज्ञानेश कुमार: आयोग ‘न्यूट्रल’ नहीं, ‘नीतीश-मोदी का टूल’

चुनाव आयोग के नए चीफ ज्ञानेश कुमार पर उंगली उठना लाजमी है, क्योंकि वे बीजेपी के साथ मिलकर लोकतंत्र पर ‘लगातार हमले’ कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर सैकड़ों पोस्ट यह बता रहे हैं कि आयोग ‘न्यूट्रल’ नहीं, बल्कि ‘नीतीश-मोदी का टूल’ है। 6 और 11 नवंबर को वोटिंग है और 14 को रिजल्ट, लेकिन 7 नवंबर को पैसा?

यह संयोग नहीं, सुनियोजित साजिश है। लोकतंत्र की नीलामी बिहार में हो रही है, और ज्ञानेश कुमार बीजेपी फर्जीवाड़े के ‘साइलेंट पार्टनर’ लगते हैं, जो विपक्ष की छोटी-मोटी मदद को दबाते हैं लेकिन सत्ता की लूट को हरी झंडी दिखाते हैं। 17 अगस्त 2025 को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुमार ने राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ आरोपों पर बीजेपी स्टाइल में जवाब दिया।

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में बिहार से 3.66 लाख वोटरों के नाम काटे गए, जिसे विपक्ष ‘गरीबों और OBCs को हटाने’ का आरोप लगाता है, लेकिन कुमार ने इसे ‘शून्य शिकायतों’ वाला प्रोजेक्ट बताया। सीपीआई(एमएल) ने कुमार को पत्र लिखकर डिलीटेड नामों की लिस्ट मांगी, लेकिन जवाब? सन्नाटा।

इसे भी पढ़े :-बिहार चुनाव में राहुल गांधी का बड़ा आरोप: ‘वोट चोरी’ से सत्ता में रहने का दावा

महिला सशक्तिकरण का ढोंग या चुनावी मजबूरी?

बीजेपी का ‘महिला सशक्तिकरण’ का दावा अब एक मज़ाक बन चुका है। 75 लाख महिलाओं को ₹10,000 देकर ‘लखपति’ बनाने का वादा, असल में यह वोट खरीदने की ‘कीमत’ है। कांग्रेस ने सही कहा, यह ‘वोट रिवड़ी’ के साथ ‘वोट चोरी’ भी है। X पर एक वीडियो वायरल है, जहां लाभार्थी पति कहते हैं, “ये ब्राइब है, पूरे देश की महिलाओं को क्यों नहीं दिया? हम कांग्रेस-आरजेडी को वोट देंगे।

” योजना के तहत सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स के जरिए बिजनेस शुरू करने का दावा है, लेकिन ग्रामीण विकास विभाग की रिपोर्ट्स बताती हैं कि ज्यादातर महिलाओं को असल ‘रोजगार’ नहीं मिला, सिर्फ पैसे का लॉलीपॉप। झारखंड की ‘मैया सम्मान योजना’ से तुलना करें, जहां ₹2,500 मासिक दिए जाते हैं, लेकिन बिहार में यह ‘एकमुश्त’ 10 हजार चुनाव से ठीक पहले क्यों?

इस योजना में फ्रॉड भी सामने आए हैं: 172 महिलाओं को फर्जी डॉक्यूमेंट्स पर पकड़ा गया, और 2,912 संदिग्ध अकाउंट्स फ्लैग हुए, जो योजना की कमजोरी या सत्ता की मजबूरी को उजागर करते हैं।

बिहार के भविष्य को लीलता 10 हजार का लालच

बीजेपी द्वारा 10 हजार के लालच का यह खेल बिहार के भविष्य को लील जाने की योजना है। जहाँ बाढ़ पीड़ित सड़कों पर मर रहे हैं, वहाँ करोड़ों का ‘ट्रांसफर’ वोट के लिए हो रहा है। पप्पू यादव जैसे लोग मदद के नाम पर सताए जा रहे हैं, जबकि बीजेपी खुलेआम ‘राज्य-प्रायोजित रिश्वत’ बांट रही है।

बिहार की सड़कें, शिक्षा, स्वास्थ्य सब उपेक्षित हैं, लेकिन वोट खरीदने के लिए 7,500 करोड़? यह लोकतंत्र नहीं, ‘डेमोक्रेसी का ड्रामा’ है, जहाँ गरीबों को पैसे से ललकारा जाता है और अमीर सत्ता हथियाते हैं। SIR एक्सरसाइज में 22 साल बाद वोटर लिस्ट क्लीनअप हुआ, लेकिन विपक्ष का आरोप है कि 80 लाख वोट ‘चोरी’ हो गए, खासकर गरीब, OBC और मुस्लिम वोटर्स के नाम काटे गए।

प्रशांत किशोर ने इसे ‘राजनीतिक साजिश’ कहा। अगर 10-10 हजार में वोट बिकते हैं, तो बिहार की आत्मा कहां बचेगी? लोकतंत्र की नीलामी बिहार की यह घटना सिर्फ चुनाव पर नहीं, पूरे भारतीय लोकतंत्र पर हमला है।

इसे भी पढ़े :-बिहार चुनाव गठबंधन वार्ता : तेजस्वी और खड़गे की मुलाकात

वोटरों से अपील: अपनी आज़ादी मत बेचो

बिहार के वोटरों से अपील है कि यह 10 हजार लौटाओ, ध्यान रहे, बीजेपी को अपनी आजादी मत बेचो। मोदी-शाह का यह ‘मनी ट्रांसफर तमाशा’ उल्टा पड़ेगा, जैसे 2024 में ‘गारंटी’ वाले वादे धूल चाट गए। पप्पू यादव की तरह खड़े हो जाओ, आयोग को जगाओ, और बीजेपी को आईना दिखाओ कि लोकतंत्र पैसे से नहीं, प्रजा की ताकत से चलता है।

अगर 7 नवंबर को पैसा आया, तो 11 नवंबर को वोट से जवाब दो। यह न सिर्फ बिहार की जीत होगी, बल्कि पूरे देश के लोकतंत्र की भी जीत होगी।

महागठबंधन का ‘माई-बहिन सम्मान’ वादा और राहुल गांधी का चेहरा बिहार को नई दिशा दे सकता है, लेकिन जीत के लिए एकजुटता जरूरी है। याद रखो, असली ताकत 7 करोड़ वोटरों की है, उन्हें बेचो मत, बल्कि इस्तेमाल करो सत्ता बदलने के लिए।

Spread the love

Post Comment

You May Have Missed