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बिहार जमीन विवाद: बुलडोजर एक्शन, गरीबों पर सत्ता का वार

बिहार जमीन विवाद

बिहार जमीन विवाद एक ऐसा कड़वा सच है, जिसकी जड़ें ऐतिहासिक जमींदारी प्रथा और जातीय वर्चस्व में गहराई तक समाई हुई हैं। दशकों से, इस वर्चस्व ने ऊपरी जातियों, विशेषकर भूमिहारों, को सबसे ज्यादा फायदा पहुंचाया। पुराने सर्वेक्षणों और गहन अध्ययनों से यह बात स्पष्ट होती है कि भूमिहार जैसे समूह, जिनकी जनसंख्या राज्य की कुल आबादी का मुश्किल से 3% है, वे कभी बड़े भू-भाग पर काबिज रहे थे।

इसके विपरीत, दलित और अति पिछड़े समुदाय आज भी भयानक भूमिहीनता की मार झेल रहे हैं। उनकी आजीविका और अस्तित्व दोनों ही असुरक्षित हैं। यह असमानता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की विफलता का भी प्रतीक है।

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बदलती सत्ता समीकरण और जमीन की नई लड़ाई

समय के साथ, बिहार की सामाजिक-राजनीतिक संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं। यादव, कुर्मी और कोइरी जैसे अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समूहों ने राजनीतिक उभार और आर्थिक गतिशीलता के दम पर धीरे-धीरे जमीन हासिल की है। इस प्रक्रिया ने पुरानी संपत्ति संरचना में दरार डाली है और सत्ता के संतुलन को मध्य जातियों की ओर झुकाया है।

लेकिन इस बदलाव के बावजूद, सबसे निचले पायदान पर खड़े गरीब दलितों के छप्पर वाली बस्तियां आज भी सरकारी जमीन पर ही टिकी हुई हैं, जो उन्हें हमेशा विस्थापन के खतरे में रखती हैं। यह दर्शाता है कि जमीन पर नियंत्रण अभी भी जातिगत समीकरणों से गहराई से जुड़ा हुआ है।

गृह मंत्री बनते ही ‘बुलडोजर की गूँज’

सम्राट चौधरी के गृह मंत्री की कुर्सी संभालते ही बिहार के क्षितिज पर अचानक बुलडोजर की गूंज सुनाई देने लगी है। सरकार इसे अदालती आदेशों का अनुपालन बताते हुए अतिक्रमण हटाने की सामान्य प्रक्रिया का नाम देती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।

नालंदा से लेकर पटना तक, सैकड़ों परिवार बेघर हो रहे हैं, और एक भयावह पैटर्न सामने आया है—तोड़े जा रहे ज्यादातर घर गरीबों, दलितों और वंचितों के हैं। यह महज एक संयोग नहीं हो सकता कि बुलडोजर सबसे कमजोर वर्ग पर ही चल रहा है, जबकि बड़े माफिया और धनी अतिक्रमणकारी अभी भी सुरक्षित दिखते हैं।

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‘नीतीश मॉडल’ बनाम ‘यूपी मॉडल’: नाम का खेल

जब सम्राट चौधरी से इस कार्रवाई के बारे में पूछा जाता है, तो वह खुद को “बुलडोजर बाबा” कहलाने से साफ इनकार करते हैं। उनका कहना है कि यह ‘नीतीश मॉडल’ है, न कि उत्तर प्रदेश का ‘यूपी मॉडल’। लेकिन इस नाम बदलने के खेल के बावजूद, विपक्ष और सीपीआई(एमएल) जैसे दल इसे गरीबों की आजीविका छीनने की एक सुनियोजित साजिश बताकर चीख-चीखकर विरोध कर रहे हैं।

यहां तक कि राजद नेता तेज प्रताप यादव जैसे नेता भी खुलकर सरकार के खिलाफ बद्दुआ की बात तक कर रहे हैं, जो इस कार्रवाई के पीछे की गहरी राजनीतिक और सामाजिक पीड़ा को दर्शाता है।

माफिया पर कार्रवाई का सवाल: कॉम्बो पैक वाले खिलाड़ी कहाँ?

सरकार बुलडोजर को माफिया पर कार्रवाई का प्रतीक बता रही है, लेकिन सवाल यह है कि यदि कार्रवाई का उद्देश्य माफिया को खत्म करना है, तो बालू, शराब और जमीन माफिया की पूरी सूची अभी तक क्यों लागू नहीं की गई है? $\text{बिहार जमीन विवाद}$ में शामिल कॉम्बो पैक वाले बड़े खिलाड़ी कहां हैं?

अभी तक ज्यादातर कार्रवाई छोटे दुकानदारों और झुग्गी-झुग्गीवालों पर ही केंद्रित क्यों है, जिन्हें केवल 10,000 रुपये के जुर्माने और घर उजड़ने की खबरों का सामना करना पड़ रहा है? सम्राट चौधरी पर भी बालू और शराब माफिया होने के पुराने आरोप हैं, भले ही कोई ठोस सबूत सामने न आया हो। ऐसे में, यह न्याय है या सत्ता का नया, विचलित करने वाला खेल, यह एक बड़ा प्रश्न है।

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जातीय संपत्ति और ‘क्लियरेंस’ का अर्थ

बिहार की राजनीति में जाति और जमीन का गठजोड़ पुराना और जटिल है। ओबीसी उभार ने भले ही यादव और कुर्मी जैसी जातियों को आर्थिक रूप से मजबूत किया हो, लेकिन दलित समुदाय आज भी हाशिए पर है। बिहार जमीन विवाद अब एक नए मोड़ पर है, जहां सरकारी जमीन पर बसी दलितों की बस्तियां अब ‘क्लियरेंस’ के नाम पर उजाड़ी जा रही हैं।

सवाल यह है कि क्या यह ‘क्लियरेंस‘ केवल विकास के लिए है, या इसके पीछे पुरानी जातीय संपत्ति को बचाने और नई संपत्ति पर कब्जा करने की गहरी तैयारी छिपी हुई है? गरीबों को उजाड़कर किसे फायदा पहुंचाया जा रहा है, इसकी जाँच आवश्यक है।

वोट बैंक या वास्तविक नागरिक?

यह पूरी स्थिति दर्शाती है कि बिहार की सत्ता हमेशा ऊपरी और मध्य जातियों के हितों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। दलित और गरीब समुदाय, दुखद रूप से, केवल वोट बैंक बनकर रह गए हैं, जिनके घर आसानी से तोड़े जा सकते हैं। यह संघीय विचारधारा में संवेदना के स्थान पर केवल लूट की तिजोरी को महत्व देने जैसा है।

सत्ता यह भूल जाती है कि गरीबों के आंसू और बद्दुआ कभी खाली नहीं जाते, और जनता की याददाश्त बहुत लंबी होती है। यह क्रूरता सत्ता के लिए भविष्य में सख्त सजा का कारण बन सकती है।

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न्याय की असली मांग: बुलडोजर नहीं, पट्टा

अंत में, बिहार को असली न्याय की आवश्यकता है। यह न्याय केवल बुलडोजर चलाने में नहीं है, बल्कि जमीन की ऐतिहासिक असमानता को दूर करने में है, जहां हर गरीब और दलित को कानूनी पट्टा (Land Title) मिले, न कि उनके सिर पर बुलडोजर।

यदि सरकार ने अब संवेदना नहीं दिखाई, तो यह ‘सुशासन’ केवल अमीरों का शासन बनकर रह जाएगा, और गरीबों का गुस्सा कभी भी फूट सकता है। समय है कि सरकार अपनी कार्रवाई पर पुनर्विचार करे, वरना इतिहास उसे माफ नहीं करेगा।

बिहार में बिहार जमीन विवाद आज भी आम लोगों के लिए बड़ी समस्या बना हुआ है। जमीन के कागजात, नक्शा, और दाखिल-खारिज की गड़बड़ियां इसके मुख्य कारण हैं।

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