बीमा FDI 100%: भारतीय वित्तीय सुरक्षा विदेशी नियंत्रण में?
बीमा FDI 100% का रास्ता साफ़ करते हुए, भारत सरकार ने 12 दिसंबर 2025 को कैबिनेट में इंश्योरेंस लॉज (अमेंडमेंट) बिल 2025 को मंज़ूरी दे दी है। इस बिल में इंश्योरेंस कंपनियों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमा को मौजूदा 74% से बढ़ाकर 100% करने का प्रावधान है।
यह बिल अब संसद के विंटर सेशन में पेश किया जाएगा। सरकार का दावा है कि इसका मुख्य उद्देश्य ‘इंश्योरेंस फॉर ऑल बाय 2047’ के लक्ष्य को हासिल करना है। हालांकि, सवाल यह उठता है कि जिस सेक्टर में पहले से ही ₹82,000 करोड़ का FDI आ चुका है, क्या यह फैसला केवल पूंजी लाने का साधन है, या फिर यह भारतीय इंश्योरेंस सेक्टर को विदेशियों के हवाले करने की एक सोची-समझी साज़िश है? क्या हम वाकई अपनी वित्तीय सुरक्षा विदेशी मुनाफाखोरों के हाथ सौंपना चाहते हैं?
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पूंजी निवेश या बाज़ार पर कब्ज़ा?
इस बदलाव से निश्चित तौर पर विदेशी निवेश में वृद्धि होगी, क्योंकि अब ग्लोबल दिग्गज इंश्योरेंस कंपनियां बिना किसी भारतीय पार्टनर के पूरी कंपनी खरीदकर या चलाकर भारतीय बाज़ार में उतर सकती हैं। 74% की पुरानी सीमा ने कई बड़े विदेशी प्लेयर्स को भारत आने से रोक रखा था, लेकिन अब वे आज़ादी से निवेश करेंगे।
माना जा रहा है कि ये कंपनियां अपने साथ नई तकनीक, डिजिटल मॉडल्स और इनोवेटिव प्रोडक्ट्स लाएंगी। इंडस्ट्री लीडर्स, जैसे आदित्य बिड़ला सन लाइफ और जनराली के सीईओ, इस कदम का स्वागत कर रहे हैं, उनका कहना है कि इससे बाज़ार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और ग्राहकों को बेहतर अनुभव मिलेगा।
लेकिन क्या यह प्रतिस्पर्धा स्वस्थ होगी? विदेशी कंपनियों के पास असीमित पूंजी है, जिससे वे छोटी भारतीय प्राइवेट कंपनियों को आसानी से ‘निगल’ सकती हैं या उनका बाज़ार हिस्सा छीन सकती हैं। आशंका है कि अंततः बाज़ार पर कुछ चुनिंदा विदेशी दिग्गजों का एकाधिकार हो जाएगा, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
उपभोक्ताओं के लिए अल्पकालिक लाभ और दीर्घकालिक जोखिम
उपभोक्ताओं के लिए शुरुआती दौर में प्रीमियम थोड़े सस्ते हो सकते हैं। नई कंपनियां बाज़ार पर कब्ज़ा करने के लिए डिस्काउंट की रणनीति अपना सकती हैं। लेकिन सवाल यह है कि लंबे समय में क्या गारंटी है? विदेशी कंपनियां यहाँ केवल मुनाफ़ा कमाने आई हैं, और यह मुनाफ़ा वापस उनके देश जाएगा।
क्लेम सेटलमेंट के मामलों में वे मनमानी कर सकती हैं। भारत में इंश्योरेंस पेनेट्रेशन (FY24 में) अभी भी सिर्फ 3.7% है, जो वैश्विक औसत (7%) से काफी कम है, और ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी ख़राब है। यह चिंता वाजिब है कि विदेशी कंपनियां मुनाफ़ा-केंद्रित होने के कारण, केवल शहरों के अमीर ग्राहकों पर ध्यान केंद्रित करेंगी।
ग्रामीण और कम आय वाले लोगों तक बीमा पहुंचाने का ‘इंश्योरेंस फॉर ऑल’ का सपना अधूरा रह सकता है। मुनाफ़े की प्राथमिकता होने के कारण, क्लेम रिजेक्शन बढ़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
स्थानीय कंपनियों और रोज़गार पर संकट
इस फैसले का सबसे बुरा असर स्थानीय प्लेयर्स पर पड़ सकता है। एक ओर, LIC जैसी सरकारी दिग्गज मजबूत है, क्योंकि बिल में उसे अधिक ऑटोनॉमी (जैसे ब्रांच खोलने और स्टाफ हायरिंग) दी जा रही है। दूसरी ओर, प्राइवेट भारतीय कंपनियां और मौजूदा जॉइंट वेंचर्स गंभीर दबाव में आएंगे।
आशंका है कि कई विदेशी पार्टनर, भारतीय हिस्सेदारी खरीदकर पूरी कंपनी का अधिग्रहण कर लेंगे। इससे हज़ारों भारतीय कर्मचारियों की नौकरियाँ खतरे में पड़ सकती हैं, और कंपनियों के मैनेजमेंट में भारतीय नियंत्रण खत्म हो जाएगा। ऑल इंडिया इंश्योरेंस एम्प्लॉईज़ एसोसिएशन ने इस कदम को इंडस्ट्री की ग्रोथ रोकने वाला बताया है।
अगर हमारा इंश्योरेंस सेक्टर, जो लाखों लोगों की सुरक्षा का आधार है, पूरी तरह विदेशी नियंत्रण में चला गया, तो इसका सीधा असर देश की वित्तीय संप्रभुता पर होगा।
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सरकारी दावे और सुरक्षा कवच की प्रभावशीलता
सरकार और इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) दावा करते हैं कि सेफगार्ड्स (सुरक्षा उपाय) मजबूत होंगे। अनिवार्य किया गया है कि प्रीमियम का निवेश भारत में ही करना होगा और टॉप मैनेजमेंट (चेयरमैन, MD या CEO) में कम से कम एक भारतीय नागरिक होना अनिवार्य होगा।
साथ ही, IRDAI की सख्त निगरानी भी जारी रहेगी। बिल में पॉलिसीहोल्डर प्रोटेक्शन फंड और डिस्गॉर्जमेंट पावर्स जैसे प्रावधान भी जोड़े जा रहे हैं। लेकिन ये शर्तें कितनी प्रभावी होंगी? पहले 74% बीमा FDI 100% की सीमा में भी कई लूपहोल्स थे, और विदेशी कंपनियां अपना रास्ता निकाल लेती थीं।
यदि विदेशी कंपनियां बाज़ार में प्रभावी हो गईं, तो वे प्रीमियम बढ़ाने, क्लेम अस्वीकार करने या पॉलिसी शर्तों को बदलने में मनमानी कर सकती हैं, और सवाल यह है कि IRDAI ऐसे शक्तिशाली प्लेयर्स पर कितना नियंत्रण रख पाएगा। ये केवल कागज़ी सुरक्षा है, जबकि वास्तविकता में उपभोक्ता असुरक्षित हो सकते हैं।
जल्दबाजी में लिया गया फैसला?
यह फैसला कहीं न कहीं जल्दबाजी और विदेशी लॉबी के दबाव में लिया गया प्रतीत होता है। भारत का इंश्योरेंस पेनेट्रेशन कम ज़रूर है, लेकिन इसे बढ़ाने के लिए केवल विदेशी पूंजी ही एकमात्र विकल्प नहीं है। घरेलू कंपनियों को मजबूत करना, डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क बढ़ाना, जागरूकता अभियान चलाना, और टैक्स बेनिफिट्स देना जैसे तरीके अधिक सुरक्षित और स्वावलंबी हैं।
बीमा FDI 100% से शॉर्ट टर्म में चमक ज़रूर आएगी और नई कंपनियां बाज़ार में उतरेंगी, लेकिन लॉन्ग टर्म में भारतीय सेक्टर विदेशी नियंत्रण में चला जाएगा, मुनाफ़ा विदेश जाएगा, और हमारी वित्तीय संप्रभुता कमजोर होगी। क्या ‘विकसित भारत’ का अर्थ विदेशी कंपनियों का गुलाम बनना है?
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नीतिगत विकल्प और आत्म-निर्भरता
यह समझना आवश्यक है कि देश के विकास के लिए आत्म-निर्भरता सबसे महत्वपूर्ण है। बीमा जैसे संवेदनशील सेक्टर में, जहाँ लाखों लोगों की बचत और भविष्य जुड़ा है, पूर्ण विदेशी नियंत्रण हानिकारक हो सकता है।
‘इंश्योरेंस फॉर ऑल’ केवल नारा नहीं, हकीकत बनना चाहिए, लेकिन यह हकीकत भारतीय नियंत्रण और भारतीय हितों के संरक्षण में बननी चाहिए, न कि केवल विदेशी मुनाफ़े के लिए। देश की वित्तीय सुरक्षा और आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने के लिए घरेलू कंपनियों को समर्थन और प्रोत्साहन देना एक सुरक्षित रास्ता है।
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संसद में बहस की आवश्यकता
अंत में, यह बिल विकास और इनोवेशन की आड़ में भारतीय इंश्योरेंस सेक्टर को बेचने का एक प्रयास प्रतीत होता है। उपभोक्ता सुरक्षा, स्थानीय कंपनियों की मजबूती और हज़ारों नौकरियों की चिंता को दरकिनार किया जा रहा है। यदि संसद में इस पर ठोस और गंभीर बहस नहीं हुई, और बेहद सख्त सुरक्षा उपाय नहीं जोड़े गए, तो यह फैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महंगा सौदा साबित हो सकता है।
मोदी सरकार के इस निर्णय पर सावधानी बरतनी होगी, अन्यथा हमारी वित्तीय सुरक्षा विदेशियों के हाथों खिलौना बनकर रह जाएगी।
भारत में बीमा FDI 100% की अनुमति देने का फैसला निवेश के लिहाज़ से अहम माना जा रहा है। सरकार का मानना है कि बीमा FDI 100% से विदेशी पूंजी आएगी और बीमा सेक्टर मज़बूत होगा।



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