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छगन भुजबल की वापसी: महाराष्ट्र की राजनीति में OBC आरक्षण का नया मोड़

छगन भुजबल

महाराष्ट्र में एक बार फिर आरक्षण की राजनीति उबाल पर है। इस बार केंद्र में हैं वरिष्ठ नेता छगन भुजबल, जो ओबीसी आरक्षण संघर्ष वापसी के प्रतीक बनकर उभरे हैं। कैबिनेट में उनकी पुनः एंट्री को केवल एक नियुक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में सत्ता की मजबूरी भी माना जा रहा है।

दिसंबर 2024 में उपेक्षा, मार्च 2025 में वापसी

  • दिसंबर 2024 में जब महाराष्ट्र मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ, तब भुजबल को जगह नहीं दी गई।
  • यह फैसला ओबीसी समाज को नागवार गुज़रा।
  • राज्यभर में प्रदर्शन शुरू हो गए, जिसमें आरक्षण की अनदेखी और भुजबल की उपेक्षा को मुद्दा बनाया गया।
  • ओबीसी समाज ने इसे ‘अपमान’ करार देते हुए दबाव बनाया।
  • मार्च 2025 में जब एनसीपी नेता धनंजय मुंडे को हत्या साजिश मामले में इस्तीफा देना पड़ा, तो यह भुजबल की वापसी का मौका बन गया।

मराठा कोटे पर सख्त रुख, सीधा टकराव

भुजबल हमेशा से मराठा कोटे को लेकर सजग रहे हैं।
उनका साफ कहना है –

“ओबीसी कोटे में मराठाओं की कोई घुसपैठ बर्दाश्त नहीं होगी।”

  • उनके इस रुख से मनोज जरांगे जैसे मराठा नेताओं की नाराज़गी बढ़ गई।
  • जरांगे ने उन्हें “जातीय ध्रुवीकरण का जनक” तक कह दिया।
  • मगर ओबीसी समाज ने भुजबल के समर्थन में लामबंदी तेज कर दी।
  • सरकार को यह समझ आया कि भुजबल को बाहर रखने का अर्थ है ओबीसी वोट बैंक की दूरी।

ओबीसी एकजुटता की रणनीति

भुजबल की वापसी से सरकार ने ओबीसी समाज की नाराजगी को नियंत्रित करने की कोशिश की है:

  • सरकार जानती है कि ओबीसी लगभग 52% जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है।
  • ओबीसी का समर्थन किसी भी चुनाव में निर्णायक साबित हो सकता है।
  • भुजबल की छवि एक जुझारू ओबीसी नेता की रही है।
  • उनकी वापसी सरकार के लिए एक सियासी दांव है, ताकि मराठा आंदोलन के बीच ओबीसी मोर्चे को मजबूत किया जा सके।

विवादों में घिरे लेकिन अडिग

  • भुजबल 2003 के तेलगी घोटाले में फंसे थे।
  • उन्हें जेल जाना पड़ा, 2018 में उन्हें ज़मानत मिली।
  • लेकिन इन विवादों के बावजूद उन्होंने अपनी राजनीतिक जमीन नहीं छोड़ी।
  • एनसीपी के भीतर और ओबीसी समाज में उनकी पकड़ बनी रही।

जातीय ध्रुवीकरण बनाम सामाजिक न्याय

महाराष्ट्र में आज की राजनीति तीन ध्रुवों पर खड़ी है:

  1. मराठा आरक्षण आंदोलन – जिसमें समाज को एसईबीसी दर्जा देने की मांग है।
  2. ओबीसी आंदोलन – जिसमें आरक्षण में घुसपैठ का विरोध है।
  3. सरकारी संतुलन साधना – जिसमें जातीय संतुलन के साथ-साथ राजनीतिक मजबूरियां हैं।

भुजबल की वापसी ने इस जटिल समीकरण में एक नया संतुलन जोड़ने की कोशिश की है।

राजनीतिक विश्लेषण :

भुजबल की वापसी: ओबीसी वोट बैंक को फिर से साधने की रणनीति

धनंजय मुंडे के इस्तीफे से खाली हुए कैबिनेट पद ने छगन भुजबल की वापसी का मार्ग प्रशस्त किया। यह केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि ओबीसी समुदाय के वोट बैंक को पुनः सक्रिय करने की एक सोची-समझी रणनीति थी। लंबे समय से हाशिए पर पड़े भुजबल को एक मजबूत ओबीसी चेहरे के रूप में पेश करना, सरकार की सामाजिक संतुलन साधने की योजना का हिस्सा लगता है। यह कदम मराठा बनाम ओबीसी आरक्षण विवाद के बीच ओबीसी समुदाय को साथ रखने का प्रयास भी है।

दिसंबर 2024 की उपेक्षा: सरकार पर बढ़ा ओबीसी का दबाव

कैबिनेट विस्तार में भुजबल को शामिल न करना दिसंबर 2024 में सरकार के लिए एक बड़ा सामाजिक जोखिम बना। ओबीसी संगठनों ने इसे अपमानजनक बताते हुए सड़कों पर प्रदर्शन किए और सार्वजनिक रूप से नाराज़गी जताई। इस विरोध ने सरकार को राजनीतिक रूप से घेर लिया, विशेषकर जब मराठा समुदाय के दबाव के बीच ओबीसी का समर्थन ढीला पड़ने लगा था। भुजबल की वापसी इस दबाव का सीधा परिणाम मानी जा सकती है, जिससे सरकार ने सामाजिक संतुलन कायम करने का संकेत दिया।

मराठा कोटे का विरोध: अडिग रुख से मिली ओबीसी में मजबूती

छगन भुजबल ने बार-बार यह स्पष्ट किया कि ओबीसी कोटे में मराठा समुदाय की कोई ‘घुसपैठ’ स्वीकार्य नहीं होगी। उनका यह अडिग रुख मराठा आंदोलन के नेताओं को असहज करता रहा, लेकिन ओबीसी समुदाय के भीतर उनकी साख मजबूत हुई। मनोज जरांगे जैसे मराठा नेताओं ने भुजबल पर “जातीय ध्रुवीकरण” का आरोप लगाया, लेकिन भुजबल ने खुद को सामाजिक न्याय के सेनापति की तरह प्रस्तुत किया। यह स्थिति ओबीसी बनाम मराठा राजनीतिक ध्रुवीकरण को और तेज करती है।

तेलगी घोटाले का अतीत: विवादों के बावजूद बना रहा सामाजिक नेतृत्व

तेलगी घोटाले में नाम आने के बाद 2003 में भुजबल को पद छोड़ना पड़ा था। 2018 में उन्हें जमानत मिली, लेकिन उनका राजनीतिक जीवन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। विवादों में घिरे होने के बावजूद, भुजबल ने ओबीसी समुदाय में अपनी पैठ बनाए रखी और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर लगातार सक्रिय रहे। उनकी वापसी यह साबित करती है कि एक बार विवाद में आए नेता भी सामाजिक समीकरणों के कारण फिर प्रासंगिक बन सकते हैं।

एक नई शुरुआत की तरफ

भुजबल की वापसी केवल एक व्यक्तिगत जीत नहीं है।
यह आरक्षण की जंग में एक नए अध्याय की शुरुआत है।

  • यह संघर्ष केवल मराठा बनाम ओबीसी नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व बनाम राजनीतिक दबाव का भी है।
  • सरकार को अब दोनों समुदायों को साधने की चुनौती है।
  • और भुजबल, एक बार फिर, सत्ता संतुलन के केंद्र में हैं।

छगन भुजबल की कैबिनेट वापसी, ओबीसी आरक्षण संघर्ष वापसी का प्रतीक बन गई है। उनकी मौजूदगी ने जहां ओबीसी समाज को नया उत्साह दिया है, वहीं मराठा नेताओं को नई चुनौती। यह कहानी सिर्फ एक नेता की वापसी नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की राजनीति में संतुलन साधने की एक जटिल रणनीति है।

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