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चुनाव आयोग का सख्त कदम: 474 राजनीतिक दलों की मान्यता रद्द,

SIR डेडलाइन

भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने एक बड़ा और चुनाव आयोग का सख्त कदम उठाते हुए 474 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों (आरयूपीपी) को अपनी सूची से हटा दिया है। इन दलों को हटाने का मुख्य कारण यह है कि ये पिछले छह वर्षों से लगातार कोई चुनाव नहीं लड़े हैं, जो कि राजनीतिक दल के पंजीकरण के लिए एक अनिवार्य शर्त है। यह कार्रवाई चुनाव प्रणाली को स्वच्छ और जवाबदेह बनाने की एक व्यापक और सतत रणनीति का हिस्सा है।

इस अभियान के तहत, चुनाव आयोग ने 2019 से उन राजनीतिक दलों की पहचान करना शुरू किया था, जो लगातार छह वर्षों तक एक भी चुनाव लड़ने की अनिवार्य शर्त को पूरा करने में विफल रहे थे। इसी कड़ी में, पहले चरण में 9 अगस्त को 334 राजनीतिक दलों को सूची से हटाया गया था, जबकि दूसरे चरण में 18 सितंबर को 474 और दलों को हटाया गया है।

उत्तर प्रदेश, पंजाब और अन्य राज्यों पर असर

चुनाव आयोग की इस कार्रवाई से पूरे देश के 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के राजनीतिक दल प्रभावित हुए हैं। इनमें पंजाब के 21 और उत्तर प्रदेश के 121 दल भी शामिल हैं, जिनकी मान्यता रद्द कर दी गई है। उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) नवदीप रिनवा ने बताया कि यह निर्णय 19 सितंबर, 2025 के एक आदेश के माध्यम से जारी किया गया है। इन दलों ने 2019 के बाद से कोई भी लोकसभा या विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था।

रिनवा ने कहा, “आयोग ने पंजीकृत दलों की गतिविधियों की समीक्षा की और पाया कि 121 संगठनों ने समीक्षाधीन अवधि के दौरान न तो संसदीय चुनावों में और न ही विधानसभा चुनावों में अपने उम्मीदवार उतारे थे। पंजीकृत राजनीतिक दलों के रूप में उनकी मान्यता तत्काल प्रभाव से वापस ले ली गई है।”

क्यों लिया गया यह फैसला?

राजनीतिक दलों के पंजीकरण के लिए दिशानिर्देशों में यह प्रावधान है कि यदि कोई पार्टी छह साल तक लगातार चुनाव नहीं लड़ती है, तो उसे पंजीकृत दलों की सूची से हटा दिया जाएगा। यह चुनाव आयोग का सख्त कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि कई दल केवल विशेषाधिकार और लाभ प्राप्त करने के लिए पंजीकृत होते हैं, जैसे कि चुनाव चिह्न, कर छूट और अन्य कानूनी अधिकार।

इन दलों के पंजीकरण रद्द होने के बाद, वे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (धारा 29बी और 29सी), आयकर अधिनियम, 1961 और चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के तहत मिलने वाले लाभों के हकदार नहीं होंगे। इस कार्रवाई से इन दलों को आरक्षित चुनाव चिह्नों, वित्तीय या कर-संबंधी छूटों और मान्यता प्राप्त दर्जे से वंचित होना पड़ेगा।

एमएमके और जमींदार पार्टी का मामला

इस सूची से हटाए गए दलों में तमिलनाडु की मणिथानेया मक्कल काची (एमएमके) भी शामिल है, जिसने इस फैसले को चुनौती देने की बात कही है। एमएमके अध्यक्ष और पापनासम विधायक एमएच जवाहिरुल्लाह ने कहा है कि यह आदेश मनमाना और राजनीति से प्रेरित है।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 2000 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी पार्टी को केवल तभी हटाया जा सकता है जब वह धोखाधड़ी से पंजीकृत हुई हो या गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त हो। उन्होंने यह भी बताया कि एमएमके नियमित रूप से आयकर रिटर्न दाखिल करती रही है।

वहीं, राजस्थान में भी 17 दलों का पंजीकरण रद्द किया गया है, जिनमें 2013 के चुनाव में दो सीटें जीतने वाली जमींदार पार्टी भी शामिल है। 17 में से 6 दल जयपुर के हैं। इन दलों को अब चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं होगी और उन्हें कोई छूट या सुविधा नहीं मिलेगी।

और भी दलों पर होगी कार्रवाई

चुनाव आयोग ने उन 359 दलों की भी पहचान की है, जिन्होंने पिछले तीन वित्तीय वर्षों (2021-22 से 2023-24) के अपने वार्षिक लेखा-परीक्षित खाते निर्धारित समय अवधि में जमा नहीं किए हैं और चुनाव लड़ने के बावजूद चुनाव खर्च की रिपोर्ट दाखिल नहीं की है।

इनमें राजस्थान के 7 और पंजाब के 11 आरयूपीपी भी शामिल हैं। इन दलों को अब स्पष्टीकरण के लिए नोटिस जारी किए जाएंगे और सुनवाई का अवसर दिया जाएगा। यदि वे संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाते हैं, तो उन्हें भी गैर-मान्यता प्राप्त दलों की सूची से हटा दिया जाएगा।

यह चुनाव आयोग का सख्त कदम है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भविष्य में भी ऐसे दलों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

यह चुनाव आयोग का सख्त कदम चुनाव प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इन दलों की मान्यता छिन जाने के बाद, इनके उम्मीदवार 2027 के चुनावों से पहले बड़े राजनीतिक दलों के साथ फिर से जुड़ने की कोशिश कर सकते हैं।

प्रभावित दलों को अपील करने का अधिकार दिया गया है और वे आदेश की तारीख से 30 दिनों के भीतर नई दिल्ली स्थित भारत निर्वाचन आयोग से संपर्क कर सकते हैं।

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