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CJI चंद्रचूड़ लोया विवाद: ऑटो या कार बयान पर नया बवाल

CJI चंद्रचूड़ लोया विवाद

CJI चंद्रचूड़ लोया की मौत का मामला न केवल भारतीय न्यायपालिका की साख पर एक काला धब्बा है, बल्कि पूरे लोकतंत्र की नींव को खोखला करने वाली साजिश का प्रतीक भी है। सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस की सुनवाई कर रहे जस्टिस बी.एच. लोया की 2014 में नागपुर में हुई संदिग्ध हृदयाघात से मौत ने शुरू से ही सवालों का पुलिंदा बांध दिया था।

परिवार ने खुलासा किया था कि लोया को अमित शाह के पक्ष में फैसला देने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस मोहित शाह ने 100 करोड़ रुपये के रिश्वत का ऑफर दिया था।

मौत के बाद की परिस्थितियां, जिनमें कपड़ों पर खून के धब्बे, टूटा बेल्ट, और पैंट का क्लिप टूटना शामिल था, ‘प्राकृतिक मौत’ की थ्योरी को शुरू से ही चूर-चूर करते रहे। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसकी जांच बंद कर दी, लेकिन अब 2025 में पूर्व सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ का लल्लनटॉप पर बयान आया कि लोया को ऑटो रिक्शा में अस्पताल ले जाया गया था। यह बयान एक बार फिर सारे घावों को हरा कर रहा है।

ऑटो रिक्शा या कार: चंद्रचूड़ बनाम गवई के विरोधाभास की परतें

यह बयान झूठ नहीं तो क्या है? क्योंकि मौजूदा सीजेआई बी.आर. गवई ने 2017 में ही जांच अधिकारी संजय बर्वे को लिखे पत्र में साफ कहा था कि लोया को दो कारों में डांडेकर अस्पताल ले जाया गया था। चंद्रचूड़ का यह बयान न केवल जांच की पोल खोलता है, बल्कि न्यायपालिका को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश को भी उजागर करता है।

यह ‘झूठ’ अकेला नहीं है; यह एक सिस्टम का हिस्सा लगता है जो सत्ता के गलियारों से जुड़े मामलों में आंखें बंद कर लेता है। 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में चंद्रचूड़ ने ही 114 पेज का जजमेंट लिखा था, जिसमें पीआईएल (PIL) को ‘राजनीतिक दुर्भावना’ का नाम देकर खारिज कर दिया गया। उन्होंने चार जजों—श्रीकांत कुलकर्णी, एस.एम. मोडक, विजयकुमार बार्डे और रूपेश राठी—के बयानों पर भरोसा किया, जो कहते थे कि मौत प्राकृतिक थी।

कारवां मैगजीन की जांच बताती है कि रवि भवन गेस्टहाउस के 17 कर्मचारियों को लोया की तबीयत बिगड़ने की भनक तक नहीं लगी थी। उनकी ईसीजी रिपोर्ट गायब है, पोस्टमॉर्टम में ‘कजिन’ का नाम फर्जी डाला गया है, दवाओं का कोई रिकॉर्ड नहीं है, ये सब ‘प्राकृतिक मौत’ की गढ़ी गयी कहानी को फर्जी साबित करते हैं।

चंद्रचूड़ ने रिश्वत के आरोप को ‘हर्से’ कहकर खारिज किया, लेकिन परिवार की गुहार अनसुनी रही। गवई का पत्र, जो इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ है, साफ कहता है: लोया को कार में ले जाया गया, न कि ऑटो में। CJI चंद्रचूड़ लोया विवाद में यह विरोधाभास न्यायपालिका की आंतरिक सड़ांध को उजागर करता है, जहां सच्चाई को दबाने के लिए झूठ का सहारा लिया जाता है।

अमित शाह, सोहराबुद्दीन केस और न्याय का कठपुतली होना

यह विवाद अमित शाह और सोहराबुद्दीन केस से सीधा जुड़ा है, जहां लोया की मौत के महज दो हफ्ते बाद उनके उत्तराधिकारी ने शाह को बरी कर दिया। क्या यह संयोग था कि अगली सुनवाई का दिन लोया के मौत के ठीक बाद तय था? एनकाउंटर केस में अमित शाह पर तीन व्यक्तियों—सोहराबुद्दीन, उसकी पत्नी कौशर बी और तुलसी प्रजापति—की हत्या का आरोप था, और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जज (लोया) को केस सौंपा गया था।

लेकिन मौत के बाद सब कुछ बदल गया। CJI चंद्रचूड़ लोया के ऑटो रिक्शा वाला बयान इस सिलसिले को फिर से हवा देता है, क्योंकि अगर ऑटो रिक्शा की बात सही होती, तो गवई का पत्र झूठा क्यों? यह राजनीतिक दबाव का नंगा नाच है, जहां जजों को या तो खरीदा जाता है या चुप करा दिया जाता है।

2025 में यह मामला फिर चर्चा में आया क्योंकि चंद्रचूड़ का इंटरव्यू सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, और सोशल मीडिया पर यूजर्स ने इसे ‘झूठ का पुलिंदा’ करार दिया। विपक्ष ने इसे न्यायपालिका पर हमला बताया, लेकिन सच्चाई यह है कि सत्ता पक्ष ने हमेशा इसे दबाने की कोशिश की। लोया की मौत ने साबित कर दिया कि न्याय का तराजू पैसे और पावर की तरह झुका हुआ है।

आंतरिक कलह का आईना: क्यों ट्रेंड हो रहा है #JusticeLoyaDeath

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का दावा करने वाले चंद्रचूड़ ने अपने कार्यकाल में कई ऐसे फैसले दिए, जो सत्ता के हित में लगे, जैसे अनुच्छेद 370 हटाना और अयोध्या विवाद सुलझाना। लेकिन लोया केस में उनकी भूमिका सबसे भयानक और काली है। 2018 के फैसले में उन्होंने कहा कि पीआईएल ‘न्याय पर हमला’ हैं, लेकिन असल हमला तो सच्चाई पर उनकी तरफ से हुआ।

गवई, जो आज सीजेआई हैं, ने बर्वे को पत्र लिखकर कार का जिक्र किया, जो जांच के दस्तावेजों में दर्ज है। चंद्रचूड़ का ऑटो वाला बयान न केवल गवई के पत्र से टकराता है, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाता है। सोशल मीडिया X पर #JusticeLoyaDeath ट्रेंड कर रहा है, जहां लोग चंद्रचूड़ को ‘झूठा’ कह रहे हैं।

यह महज एक बयान नहीं, बल्कि न्यायपालिका के आंतरिक कलह का आईना है, जहां पूर्व सीजेआई खुद को बचाने के लिए इतिहास से छेड़छाड़ करने लगे। क्या यह लोकतंत्र है, जहां जजों की मौत पर सवाल उठाने वाले को ही दोषी ठहराया जाए?

जस्टिस लोया की मौत का केस बंद नहीं हुआ है; यह एक जख्म है जो फिर से फूट पड़ा है। चंद्रचूड़ का लल्लनटॉप इंटरव्यू साबित करता है कि सत्ता के करीब रहने वाले जज भी आज झूठ बोलने से नहीं हिचक रहे हैं। गवई का 2017 का पत्र साफ कहता है: कार में ले जाया गया, न कि ऑटो में।

यह विरोधाभास न केवल चंद्रचूड़ की साख को मिटाता है, बल्कि पूरे सुप्रीम कोर्ट को सवालों के घेरे में ला खड़ा करता है। समय आ गया है कि इस मामले की स्वतंत्र जांच के लिए SIT गठित हो, और जस्टिस लोया की संदिग्ध मौत की सच्चाई बाहर आए।

अन्यथा, न्यायपालिका का यह काला अध्याय इतिहास में दर्ज रहेगा, जहां एक जज की मौत ने साबित कर दिया कि सत्ता के आगे न्याय कठपुतली बन जाता है। लोया जैसे ईमानदार जजों को सलाम, और उन लोगों को लानत जो उनकी सच्चाई को दबाने की कोशिश कर रहे हैं।

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