दिल्ली-एनसीआर वायु आपातकाल: जहरीली हवा और अरावली पर बड़ा संकट
जनवरी 2026 में दिल्ली-एनसीआर की हवा अब महज एक मौसम का मिजाज नहीं, बल्कि एक ‘जीवित आपदा’ बन चुकी है। यह दिल्ली-एनसीआर वायु आपातकाल का ही खौफनाक मंजर है कि महीने की शुरुआत से ही एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) बार-बार 300-400 (गंभीर) और कई मौकों पर 400-500 (खतरनाक) के स्तर को पार कर रहा है।
17 जनवरी 2026 को दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में शीर्ष पर रही, जहाँ AQI का कांटा 500 के पार दर्ज किया गया। यहाँ तक कि 23 जनवरी तक भी हालात सुधरे नहीं हैं और AQI 200-300 के बीच बना हुआ है।
PM 2.5 का स्तर 150-180 µg/m³ तक पहुँच गया है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सुरक्षित मानकों से 10-15 गुना अधिक है। यह एक ऐसी व्यवस्थागत विफलता है, जहाँ हर साल 20,000 से 30,000 लोग समय से पहले मौत के आगोश में समा रहे हैं।
मुंबई की बिगड़ती स्थिति और स्वास्थ्य का गहराता संकट
प्रदूषण का यह कहर केवल राजधानी तक सीमित नहीं है। मुंबई का एयर क्वालिटी इंडेक्स भी 230-250 तक पहुँच रहा है, जो संकेत है कि समुद्री हवाएं भी अब प्रदूषण को सोखने में असमर्थ हो रही हैं। इस जहरीली हवा का सबसे सीधा और क्रूर प्रहार बच्चों और बुजुर्गों पर हो रहा है।
बच्चे स्कूलों में सांस लेने में तकलीफ महसूस कर रहे हैं, जिससे उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित हैं। अस्पतालों के आंकड़े डराने वाले हैं; श्वसन संबंधी बीमारियों के मामलों में 30-40% की भारी वृद्धि हुई है।
वहीं, बुजुर्गों में दिल के दौरे (Heart Attack) और स्ट्रोक के मामले खतरनाक रूप से बढ़ रहे हैं। यह एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल है, जिसे अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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अरावली का विनाश: सुरक्षा कवच से खिलवाड़ और रेगिस्तानी धूल
दिल्ली-एनसीआर वायु आपातकाल को और अधिक घातक बना रहा है अरावली पर्वतमाला का निरंतर क्षरण। दुनिया की सबसे पुरानी (लगभग 2 अरब साल पुरानी) यह श्रृंखला दिल्ली-एनसीआर की प्राकृतिक ढाल और ‘हरित फेफड़े’ है। यह थार रेगिस्तान की धूल को रोकती है, हवा संतुलित करती है और भूजल रिचार्ज करती है।
लेकिन नीतिगत फैसलों ने इसे खतरे में डाल दिया है। 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने ऊँचाई-आधारित परिभाषा (100 मीटर से ऊपर की भूमि को अरावली मानना) को स्वीकार किया, जिससे खनन माफियाओं के लिए रास्ते खुल गए।
हालांकि, 29 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने खुद ‘सूओ मोटो’ (Suo Moto) संज्ञान लेते हुए इस आदेश को स्थगित कर विशेषज्ञ समिति बनाने का फैसला किया, लेकिन जमीन पर अवैध खनन और अतिक्रमण बदस्तूर जारी है।
प्रशासनिक विफलता और जीआरएपी (GRAP) का लचर क्रियान्वयन
प्रदूषण के कारणों की फेहरिस्त लंबी है—पंजाब-हरियाणा में पराली जलाना, दिल्ली की सड़कों पर दौड़ रहे 1.5 करोड़ से अधिक वाहनों का धुआँ, निर्माण कार्यों की धूल और उद्योगों का बेलगाम उत्सर्जन। जब स्थिति नियंत्रण से बाहर होती है, तो जीआरएपी (GRAP) स्टेज 4 लागू कर दिया जाता है।
ट्रकों के प्रवेश पर रोक, स्कूल बंदी और ऑड-ईवन जैसे कदम उठाए जाते हैं, लेकिन इनका क्रियान्वयन (Implementation) हमेशा कमजोर रहता है।
सर्दियों की ‘इनवर्शन लेयर’ प्रदूषण को जमीन के करीब जकड़ लेती है, जिससे यह क्षेत्र गैस चैंबर बन जाता है। दिल्ली-एनसीआर वायु आपातकाल के दौरान राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी साफ झलकती है, जहाँ समाधान खोजने के बजाय सिर्फ वक्त गुजारा जाता है।
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अरावली की कटाई और मरुस्थलीकरण का सीधा संबंध
विशेषज्ञों की चेतावनी स्पष्ट है: अरावली की कटाई से न केवल जैव-विविधता नष्ट हो रही है, बल्कि मरुस्थलीकरण भी तेज हो रहा है। अरावली की क्षति से थार की धूल भरी आंधियाँ अब सीधे और लंबे समय तक दिल्ली पहुँच रही हैं, जो PM10 के स्तर को कई गुना बढ़ा देती हैं।
पर्यावरणविदों का मानना है कि अरावली के प्राकृतिक हवा अवरोधक (Natural Barriers) टूटने से धूल का योगदान प्रदूषण में 20-30% तक बढ़ सकता है। यह सिर्फ पहाड़ों की मौत नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिक सुरक्षा की तबाही है। गिरता भूजल स्तर और जहरीली होती हवा इस बात का प्रमाण है कि हम एक अपरिवर्तनीय तबाही की ओर बढ़ रहे हैं।
सड़कों पर युवा आक्रोश: “मैं सिर्फ साँस लेना चाहता हूँ”
इस संकट के बीच जेन-जेड (Gen-Z) और युवाओं ने मोर्चा संभाल लिया है। नवंबर 2025 से शुरू हुए प्रदर्शनों ने 2026 में एक जन-आंदोलन का रूप ले लिया है। इंडिया गेट और जंतर-मंतर पर छात्र, माता-पिता और युवा गैस मास्क पहनकर प्रदर्शन कर रहे हैं।
उनके प्लेकार्ड्स पर लिखे नारे—”मैं सिर्फ साँस लेना चाहता हूँ” और “भविष्य अभी है”—सत्ता के गलियारों को झकझोर रहे हैं। नवंबर 2025 में पुलिसिया कार्रवाई और हिरासत के बावजूद युवाओं का जोश कम नहीं हुआ है।
वे जानते हैं कि यह उनकी पीढ़ी है जो आजीवन फेफड़ों की क्षति और 10 साल कम जीवन प्रत्याशा का दंश झेलेगी। सोशल मीडिया के माध्यम से यह आक्रोश अब राष्ट्रीय स्तर पर फैल चुका है।
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सत्ता का दमन और वर्ग असमानता का कड़वा सच
यह विडंबना ही है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत “स्वच्छ हवा का अधिकार” माँगने वालों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जा रहा है। सरकारों की प्रतिक्रिया दमनकारी रही है; शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पेपर स्प्रे और बल प्रयोग किया जा रहा है, जबकि असली दोषी—अवैध खनिक और बड़े उद्योगपति—खुलेआम घूम रहे हैं।
राहुल गांधी जैसे नेताओं ने इसे मौलिक मानवाधिकार बताया है, लेकिन सरकारी मशीनरी फोटो-ऑप और अस्थायी उपायों में उलझी है। यह दिल्ली-एनसीआर वायु आपातकाल सामाजिक-आर्थिक न्याय का भी मुद्दा है। अमीर तो एयर प्यूरीफायर और गेटेड कम्युनिटी में सुरक्षित हैं, लेकिन बाहर काम करने वाले मजदूर और निम्न-आय वर्ग के लोग इस जहरीले धुएं में मरने के लिए मजबूर हैं।
निर्णायक कार्रवाई का समय: अब नहीं तो कभी नहीं
यदि हमें दिल्ली-एनसीआर को बचाना है, तो अब आधे-अधूरे उपायों का समय बीत चुका है। अरावली को पूर्ण संरक्षित दर्जा देना, अवैध खनन पर ‘जीरो टॉलरेंस’ और बड़े पैमाने पर वनरोपण तत्काल अनिवार्य है। मुंबई के संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान का संरक्षण और 2030 तक 100% इलेक्ट्रिक सार्वजनिक परिवहन जैसे कड़े कदम उठाने होंगे।
उद्योगों पर सख्त उत्सर्जन मानक और पंजाब-हरियाणा के साथ पराली के विकल्पों पर ठोस अंतर-राज्य सहयोग की आवश्यकता है।
युवाओं का यह रोष एक चेतावनी है—या तो आज निर्णायक कार्रवाई करें, या फिर आने वाली पीढ़ी के क्षतिग्रस्त फेफड़ों और पारिस्थितिक पतन की जिम्मेदारी स्वीकार करें। समय आ गया है कि पुरानी पीढ़ी जवाब दे कि उन्होंने भविष्य की साँसें क्यों चुराईं।
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