भारत जनगणना 2027: डिजिटल बदलाव और नई “सेंसस 2027 प्रश्नावली”
सेंसस 2027 प्रश्नावली भारत की जनगणना के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। 16 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद होने वाली यह कवायद महज एक गिनती नहीं, बल्कि ब्रिटिश काल की पारंपरिक पद्धतियों से पूरी तरह अलग एक आधुनिक छलांग है। 22 जनवरी, 2026 को गृह मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, इस बार की जनगणना पूरी तरह डिजिटल होगी।
सेंसस 2027 प्रश्नावली में इस बार डिजिटल-एज इंडिकेटर्स को विशेष प्राथमिकता दी गई है, जो 2011 की हाउसलिस्टिंग अप्रोच से एक बड़े नीतिगत बदलाव को दर्शाता है। यह देश की पहली डिजिटल जनगणना होगी, जिसमें Android और iOS प्लेटफॉर्म पर मोबाइल एप्लिकेशन का उपयोग किया जाएगा।
2011 बनाम 2027: सवालों की संख्या और डिजिटल फोकस में बदलाव
जब हम 2011 की हाउसलिस्टिंग शेड्यूल की तुलना वर्तमान योजना से करते हैं, तो स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। 2011 में हाउसहोल्ड स्टेज पर डेमोग्राफिक डिटेलिंग काफी विस्तृत थी, जिसमें 35 सवाल शामिल थे। हालांकि, गृह मंत्रालय की नई अधिसूचना के मुताबिक, सेंसस 2027 प्रश्नावली में सवालों की संख्या को घटाकर 33 कर दिया गया है।
यह एक कम विस्तृत लेकिन अधिक केंद्रित अप्रोच है। सबसे बड़ा बदलाव एसेट्स और कनेक्टिविटी के क्षेत्र में है। जहाँ 2011 में रेडियो, टेलीविजन और लैंडलाइन फोन की ओनरशिप दर्ज की जाती थी, वहीं अब इंटरनेट और स्मार्टफोन जैसे डिजिटल एक्सेस वाले सवालों को सर्विस डिलीवरी में उनकी भूमिका देखते हुए शामिल किया गया है।
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ब्रिटिशकालीन 1881 की जनगणना: इतिहास के झरोखे से एक नजर
भारत में जनगणना का सफर 19वीं सदी के ब्रिटिश राज से शुरू हुआ था। पीपुल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया (PARI) के अनुसार, 17 फरवरी, 1881 को ली गई जनगणना भारतीय आबादी की पहली सही मायने में एक साथ की गई गिनती थी। उस दौर में कश्मीर और पुर्तगाली-फ्रांसीसी इलाकों को छोड़कर लगभग पूरे उपमहाद्वीप को कवर किया गया था।
तब कुल आबादी 25.38 करोड़ दर्ज की गई थी, जिसमें 12.99 करोड़ पुरुष और 12.39 करोड़ महिलाएं थीं। उस समय का औसत जनसंख्या घनत्व 184 व्यक्ति प्रति वर्ग मील था। बंगाल जैसे इलाकों में आबादी घनी थी, जबकि राजपूताना के रेगिस्तानों में विरल थी।
औपनिवेशिक काल की चुनौतियां और 12-कॉलम का शेड्यूल
1881 की जनगणना के दौरान ब्रिटिश अधिकारियों ने “सेंसस शेड्यूल” के तहत 12 कॉलम का उपयोग किया था। इसमें पहली बार वैवाहिक स्थिति, मातृभाषा और साक्षरता जैसे मानक प्रश्न शामिल किए गए थे। उस समय की रिपोर्ट ने समाज की कड़वी सच्चाई पेश की थी, जिसमें कुल साक्षरता दर महज 6.3% थी और महिलाओं की साक्षरता दर तो 0.5% से भी कम थी।
धार्मिक आधार पर 74.3% हिंदू और 19.7% मुस्लिम आबादी रिकॉर्ड की गई थी। साथ ही, लगभग 70% आबादी अपनी आजीविका के लिए सीधे तौर पर खेती पर निर्भर थी। तत्कालीन सरकार ने इसे ‘सेंसस एक्ट 1880’ का कानूनी समर्थन दिया था ताकि डेटा की गोपनीयता बनी रहे और शक करने वाले लोगों को शांत किया जा सके।
हाथ से गिनती से लेकर GPS और जियोफेंसिंग तक का सफर
1881 में गणना की प्रक्रिया दो चरणों में होती थी—एक शुरुआती ड्राफ्ट रिकॉर्ड और फिर 17 फरवरी की रात को एक फाइनल वेरिफिकेशन। उस रात गणना करने वाले हर घर में जाकर जन्म, मृत्यु और यात्रियों का हिसाब लेते थे। इसके उलट, 2027 की जनगणना में मैन्युअल कॉलोनियल रिकॉर्ड के बजाय हाई-टेक तकनीक का इस्तेमाल होगा।
आधुनिक जनगणना में GPS टैगिंग और जियोफेंसिंग जैसे एडवांस्ड फीचर्स का उपयोग किया जाएगा। लगभग 30 लाख एन्यूमेरेटर मोबाइल ऐप के जरिए डेटा फीड करेंगे। सेंसस 2027 प्रश्नावली को इस तरह डिजाइन किया गया है कि डेटा प्रोसेसिंग की गति 1881 की तुलना में कई गुना तेज होगी, जहाँ रिपोर्ट आने में वर्षों लग जाते थे।
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सेल्फ-एन्यूमेरेशन: नागरिकों के हाथ में अपनी जानकारी का नियंत्रण
इस बार की जनगणना में एक बड़ा क्रांतिकारी बदलाव ‘सेल्फ-एन्यूमेरेशन’ की शुरुआत है। इसके तहत नागरिक घर-घर जाकर गणना शुरू होने से 15 दिन पहले ही एक विशेष पोर्टल के माध्यम से अपनी जानकारी खुद जमा कर सकते हैं। यह प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होगी।
पहला चरण, यानी हाउसलिस्टिंग और हाउसिंग सेंसस, 1 अप्रैल से 30 सितंबर, 2026 के बीच निर्धारित है। इसके बाद, फरवरी 2027 में जनसंख्या गणना (Population Enumeration) का मुख्य कार्य शुरू होगा।
जहाँ 1881 की जनगणना शाही टैक्स और नियंत्रण के लिए थी, वहीं 2027 का डेटा परिसीमन (Delimitation) और महिला आरक्षण विधेयक को लागू करने के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करेगा।
सामाजिक चुनौतियां और ऐतिहासिक अफवाहों का दौर
जनगणना का कार्य भारत में कभी आसान नहीं रहा। 1881 में भी अधिकारियों को भारी जन-विरोध और शक का सामना करना पड़ा था। लोगों को डर था कि यह टैक्स बढ़ाने, जबरदस्ती मजदूरी कराने या अफगान युद्ध के लिए सेना में भर्ती करने की एक साजिश है।
बुनियादी ढांचे की कमी और भाषाई रुकावटों के कारण ग्रामीण इलाकों में डेटा जुटाना एक नामुमकिन सा काम लगता था। आज भी, उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जैसे जिलों में प्री-टेस्ट एक्सरसाइज के दौरान अधिकारियों को जनता के बीच विश्वसनीयता बनानी पड़ती है।
भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त (RG&CCI) ने स्पष्ट किया है कि सेंसस 2027 प्रश्नावली के माध्यम से जुटाया गया डेटा पूरी तरह सुरक्षित और राष्ट्र विकास के लिए समर्पित है।
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वैश्विक घटनाक्रम और जनगणना का भविष्य
जहाँ भारत अपनी जनगणना की तैयारियों में जुटा है, वहीं वैश्विक स्तर पर भी बड़े बदलाव हो रहे हैं। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने हाल ही में आर्कटिक में नाटो की स्थायी मौजूदगी का समर्थन किया है। लेकिन भारत का ध्यान अपनी आंतरिक जनसांख्यिकीय मजबूती पर है।
2027 की यह डिजिटल जनगणना न केवल हमें सटीक आंकड़े देगी, बल्कि यह भी बताएगी कि 1881 की 6.3% साक्षरता दर से चलकर आज का भारत कहाँ खड़ा है। आधुनिक डिजिटल टूल्स और स्मार्टफोन आधारित यह प्रक्रिया भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों में खड़ा कर देगी जिनके पास अपनी आबादी का रीयल-टाइम डेटाबेस उपलब्ध होगा।
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