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गांधी हत्या, गोडसे-आरएसएस संबंध: हिंदुत्व बनाम गांधी का सच

हिंदुत्व बनाम गांधी

हिंदुत्व बनाम गांधी का संघर्ष भारतीय इतिहास का वह काला अध्याय है, जब 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी के सीने में तीन गोलियां उतार दीं। यह न केवल एक व्यक्ति की हानि थी, बल्कि यह हिंदू राष्ट्रवाद की उस जहर भरी धारा का प्रतीक भी था, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और हिंदू महासभा की विचारधारा से लगातार पोषित हो रही थी। गोडसे केवल एक हत्यारा नहीं था, बल्कि वह इसी विचारधारा का प्रतिनिधि था।

गोडसे का आरएसएस से गहरा जुड़ाव कोई रहस्य नहीं है। वह संगठन का सक्रिय सदस्य था और बौद्धिक कार्यकर्ता के रूप में काम करता था। इस जुड़ाव का सबसे स्पष्ट साक्ष्य गोडसे के भाई, गोपाल गोडसे, ने दिया था। गोपाल गोडसे ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि “हम सभी भाई, नाथूराम, दत्तात्रेय, मैं और गोविंद आरएसएस में थे।

हमारा पालन-पोषण घर की बजाय आरएसएस में हुआ था। यह हमारे लिए एक परिवार की तरह था।” यह बयान न केवल पारिवारिक साक्ष्य है, बल्कि ऐतिहासिक दस्तावेजों से भी पुष्ट होता है, जो गोडसे के आरएसएस सदस्यता को 1932 से उसकी मौत तक जोड़ते हैं। आज जब आरएसएस अपनी शताब्दी मना रहा है, तो यह कनेक्शन एक गहरा सवाल खड़ा करता है: क्या संगठन ने कभी इस वैचारिक जहर को खुद से अलग करने की कोशिश की?

आरएसएस का दावा और झूठ का पर्दाफाश

आरएसएस हमेशा से यह दावा करता रहा है कि गोडसे ने 1930 के दशक में संगठन छोड़ दिया था, लेकिन यह दावा ऐतिहासिक साक्ष्यों के सामने एक सफेद झूठ साबित होता है। कारवां मैगजीन की 2020 की शोधपरक रिपोर्ट से यह साबित होता है कि गोडसे आरएसएस की मीटिंग्स में 1938 के बाद भी शामिल था, जबकि आरएसएस ने दावा किया था कि वह हिंदू महासभा में चला गया था।

गोडसे के भाई गोपाल गोडसे ने फ्रंटलाइन को दिए इंटरव्यू में इस झूठ की पोल खोली। उन्होंने कहा, “नाथूराम ने अदालत में आरएसएस छोड़ने का दावा किया क्योंकि गोलवलकर और संगठन पर दबाव था, लेकिन वह कभी नहीं छोड़ा।” यह केवल परिवार का बयान नहीं है, बल्कि 15 नवंबर 1949 को अंबाला जेल में फांसी से ठीक पहले का दृश्य इसका जीवंत प्रमाण है।

फांसी से पहले, गोडसे और नारायण आप्टे ने आरएसएस की संस्कृत प्रार्थना के पहले चार वाक्य पढ़े, जो 1939 में ही तैयार हुई थी। अगर गोडसे ‘पूर्व’ सदस्य था, तो मौत के क्षण में आरएसएस की प्रार्थना क्यों? यह दिखाता है कि गोडसे की विचारधारा की जड़ें कितनी गहराई तक आरएसएस में समाई हुई थीं, जो गांधी के हिंदू-मुस्लिम एकता के सपने को ‘राष्ट्र-विरोधी’ मानती थी।

सरदार पटेल का ऐतिहासिक पत्र: जिसने ‘सांप्रदायिक जहर’ को बेनकाब किया

तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल, जो आरएसएस के प्रति कभी नरम नहीं थे, ने इस वैचारिक संबंध को बेनकाब किया। उन्होंने 18 जुलाई 1948 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा, “आरएसएस और हिंदू महासभा की गतिविधियों के परिणामस्वरूप, विशेष रूप से पहले की, देश में एक ऐसा वातावरण बना जिसमें इस तरह की त्रासदी संभव हो गई।”

पटेल ने आरएसएस को ‘विषैली’ भाषणों का दोषी ठहराया और 4 फरवरी 1948 को संगठन पर प्रतिबंध लगाया, क्योंकि महात्मा गांधी की हत्या के बाद इसके सदस्यों ने मिठाइयां बांटी थीं। यह पत्र कोई व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि गृह मंत्रालय के आधिकारिक दस्तावेजों पर आधारित था।

पटेल ने एमएस गोलवलकर को 11 सितंबर 1948 को लिखे एक पत्र में और भी तीखे शब्दों का प्रयोग किया: “संगठन के नेताओं के भाषणों में सांप्रदायिक जहर भरा था, जिसके फलस्वरूप गांधीजी की हत्या हुई।” आज जब भाजपा पटेल को अपना हीरो बताती है, तो यह पत्र उसके मुँह पर एक तमाचा है, क्योंकि आरएसएस की विचारधारा ने ही वह माहौल बनाया, जो गांधी की हत्या का कारण बनी। यह ऐतिहासिक सच हिंदुत्व बनाम गांधी के शाश्वत टकराव को दर्शाता है।

हिंदू महासभा और फ़ासीवाद से प्रेरित विचारधारा

इस घिनौने कृत्य में हिंदू महासभा का रोल भी कम नहीं था। गोडसे इसका सक्रिय सदस्य था और विनायक दामोदर सावरकर का नजदीकी अनुयायी। महासभा ने गांधी को ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ का दोषी ठहराया, और सावरकर ने खुद कहा था कि गांधी ‘हिंदू हितों की बलि’ चढ़ा रहे हैं।

1946 में गोडसे ने महासभा के अखबार ‘हिंदू राष्ट्र’ का संपादन किया, जहां गांधी-विरोधी कैंपेन चलाया गया। पटेल ने मुखर्जी को लिखा था, “मुझे कोई संदेह नहीं कि हिंदू महासभा का चरमपंथी धड़ा साजिश में शामिल था।” महासभा ने हत्या के बाद खुद को भंग कर लिया, लेकिन इसकी विचारधारा आरएसएस में समाहित हो गई।

आरएसएस की स्थापना ही ब्रिटिश साम्राज्यवाद के दौर में केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में की थी। संगठन ने कभी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया; क्विट इंडिया मूवमेंट के दौरान गोलवलकर ने सदस्यों को ब्रिटिश आदेशों का पालन करने को कहा था।

हेडगेवार के मेंटर, बी.एस. मूंजे, ने 1931 में मुसोलिनी से मिलकर फासीवादी युवा संगठनों का अध्ययन किया और हिंदू समाज को ‘मिलिटराइज’ करने की योजना बनाई। यह फासीवाद से प्रेरित विचारधारा ही गोडसे को जन्म देती है, जो गांधी के अहिंसा को ‘कमजोरी’ मानता था। आज के भारत में यह हिंदुत्व बनाम गांधी की लड़ाई फिर से मुखर है।

सत्य और वैचारिक पुनरुत्थान

आज के भारत में, जब गांधी को ‘पापा’ कहकर मजाक उड़ाया जाता है और गोडसे के मंदिर बनते हैं, तो यह कनेक्शन और भी गहरा हो जाता है। आरएसएस ने कभी गांधी की हत्या के लिए माफी नहीं मांगी; उल्टा, एनसीईआरटी की किताबों से गोडसे के ब्राह्मण होने का उल्लेख हटा दिया गया, ताकि हिंदुत्व की छवि साफ रहे।

लेकिन सच्चाई यह है कि गोडसे आरएसएस का ही उत्पाद था, उसकी विचारधारा का, उसके प्रशिक्षण का। हाल के वर्षों में, जब भाजपा सांसद गोडसे को ‘देशभक्त’ कहते हैं, तो यह वैचारिक हत्या का पुनरुत्थान है।

गांधी का सपना, एक समावेशी भारत, आज भी आरएसएस के हिंदू राष्ट्र के सामने खड़ा है, और इतिहास हमें चेतावनी देता है कि जहर फैलाने वाले कभी नहीं बदलते। अंत में, यह त्रासदी हमें सिखाती है कि राष्ट्रवाद का नाम लेकर हिंसा को जायज ठहराना सबसे बड़ा अपराध है।

आरएसएस-हिंदू महासभा का कनेक्शन गोडसे के हाथों में बंदूक थमाने जैसा था, और पटेल जैसे नेताओं ने इसे पहचाना। आज, जब संगठन अपनी शताब्दी मना रहा है, तो समय है कि हम गांधी की हत्या में आरएसएस की साजिश को नहीं भूलें, बल्कि उससे सीखें।

गोडसे की गोलियां महात्मा गांधी के शरीर में घुसकर उन्हें मार डाला था, लेकिन आरएसएस का जहर आज भी भारत के चप्पे-चप्पे में घूम रहा है, यह भारत जो कि गांधी का है, उनके विचारों का है, उनके बलिदान का है, न कि गोडसे का।

हिंदुत्व बनाम गांधी की बहस भारतीय राजनीति का सबसे पुराना वैचारिक संघर्ष है। एक ओर राष्ट्रवादी पहचान पर ज़ोर देने वाला हिंदुत्व है, दूसरी ओर सर्वधर्म समभाव का गांधीवादी दर्शन। दोनों विचार आज भी भारत के लोकतांत्रिक विमर्श को दिशा दे रहे हैं।

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