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आरएसएस आतंकी साजिश: लोकतंत्र को खतरा, शिंदे के हलफनामे का सच

लोकतंत्र को खतरा  

यशवंत शिंदे का हलफनामा न सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की छवि को झकझोरने वाला है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र को खतरा पैदा करने वाली साजिश का खुलासा करता है। 2022 में नांदेड़ की अदालत में दाखिल इस हलफनामे में शिंदे ने दावा किया कि उन्हें और अन्य युवाओं को 2003-04 में बम बनाने का प्रशिक्षण दिया गया।

इस प्रशिक्षण का एकमात्र मकसद देशभर में धमाके कर मुसलमानों को बदनाम करना और इसके फलस्वरूप भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को चुनावी फायदा पहुँचाना था। यह कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं, बल्कि एक पूर्व प्रचारक का गवाह बनने का ऑफर है, जो यह साबित करता है कि आरएसएस का ‘सांस्कृतिक संगठन’ का मुखौटा वास्तव में हिंसक साजिशों के लिए एक आड़ का काम कर रहा था।

आश्चर्यजनक रूप से, इस गंभीर खुलासे के तीन साल बाद भी शिंदे पर कोई मुकदमा नहीं चला है, जो सत्ता में बैठे लोगों के गम्भीर खुलासे के डर का प्रमाण है।

आरएसएस की आतंकी प्रवृत्ति और सेना पर उठे सवाल

शिंदे के इस हलफनामे ने आरएसएस की आतंकी प्रवृत्ति को उजागर किया है। हलफनामे में दावा किया गया है कि 1999 से ही इंद्रेश कुमार जैसे वरिष्ठ नेता युवाओं को जम्मू भेजकर आधुनिक हथियारों का प्रशिक्षण दिलवाते थे। शिंदे ने जिन नामों का उल्लेख किया है, उनमें मिलिंद परांडे, राकेश धवादे, और हिमांशु पांसे शामिल हैं।

ये वही लोग हैं, जिन्हें 2006 में हुए नांदेड़ धमाके का मुख्य साजिशकर्ता बताया गया था। शिंदे के अनुसार, ये धमाके विशेष रूप से मस्जिदों को निशाना बनाने के लिए किए गए थे, ताकि देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ाया जा सके और भाजपा को वोटों का लाभ मिल सके।

इतना ही नहीं, इस पूरे ऑपरेशन में विहिप (विश्व हिंदू परिषद) और बजरंग दल के सदस्यों ने युवाओं का चयन किया, और सबसे चौंकाने वाला दावा यह है कि भारतीय सेना के जवान इन युवाओं को हथियार चलाना सिखाते थे।

यह दावा भारतीय सेना की निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। आरएसएस ने आज तक इन अति गंभीर आरोपों का आधिकारिक खंडन नहीं किया है, जो उनकी चुप्पी को एक तरह से अपराधी बना रही है।

सिंहगढ़ किले के पास बम-निर्माण शिविर की कहानी

आरएसएस का यह ‘ट्रेनिंग कैंप’ कोई साधारण गतिविधि या खेल नहीं था। शिंदे ने विस्तार से बताया कि सिंहगढ़ किले के पास एक रिसॉर्ट में तीन दिनों का बम-निर्माण शिविर आयोजित किया गया था। इस शिविर में लगभग 20 युवाओं को टाइमर बम बनाना सिखाया गया।

उन्होंने बताया कि परीक्षण के दौरान बड़े धमाके हुए, और पत्थर दूर-दूर तक उछल गए थे। वर्ष 2004 के चुनाव से पहले जलना, पूर्णा, परभणी में हुए धमाके इसी बड़ी साजिश का हिस्सा थे, जो कथित तौर पर भाजपा की हार का बदला लेने के लिए किए गए थे।

शिंदे ने खुद 500-600 धमाकों को विफल करने का दावा किया, लेकिन 2006 में नांदेड़ में हिमांशु पांसे की मौत ने इस पूरी साजिश को उजागर कर दिया। यह संपूर्ण प्रकरण साबित करता है कि आरएसएस का हिंदुत्व, आतंकवाद का पर्याय बन चुका है, और संगठन लोकतंत्र को सत्ता के लिए कुर्बान करने को तैयार है।

सत्ता की मिलीभगत और न्याय व्यवस्था की संदिग्ध भूमिका

भाजपा का ‘आतंकवाद से लड़ाई’ का दावा अब हास्यास्पद लगता है, जब शिंदे का हलफनामा बताता है कि 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद ये ‘अंडरग्राउंड फोर्सेस’ फिर से सक्रिय हो गईं। शिंदे ने मोहन भागवत से लेकर श्रीकांत जोशी तक, वरिष्ठ नेताओं को इन गतिविधियों के बारे में चेतावनी दी, लेकिन उनकी बातों को अनसुना कर दिया गया।

यह स्पष्ट रूप से संगठनात्मक समर्थन का प्रमाण है, जहाँ हिंसा को ‘राष्ट्रीय हित’ का नाम दिया जाता रहा है। आज भी विहिप का महासचिव मिलिंद परांडे संगठन में एक ऊंचे पद पर बना हुआ है, और सेना पर प्रशिक्षण देने का आरोप बिना किसी जवाब के लटका हुआ है।

सबसे गंभीर बात यह है कि भाजपा सरकार ने सीबीआई को शिंदे के गवाह बनने की याचिका खारिज करवाने का पूरा प्रयास किया, जो सीधे तौर पर सत्ता की मिलीभगत को उजागर करता है। इस तरह की गतिविधियाँ सचमुच लोकतंत्र को खतरा पहुँचाती हैं।

इस मामले में न्याय व्यवस्था की भूमिका भी संदिग्ध रही है। नांदेड़ कोर्ट ने शिंदे की गवाही याचिका को ‘प्रक्रियागत आधार’ पर खारिज कर दिया, और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे खारिज कर दिया। सीबीआई ने विहिप नेताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, जबकि शिंदे ने नामजद सबूत पेश किए थे।

यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि कैसे सत्ता के इशारे पर न्याय मैन्युफैक्चर किया जाता है। दिग्विजय सिंह ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि शिंदे की जान को खतरा है, लेकिन सरकार की चुप्पी उन्हें एक तरह का संरक्षण देती है। यह भारतीय लोकतंत्र का अपमान है, जहाँ साक्ष्य को दबाया जाता है ताकि ‘हिंदू आतंक’ का काला इतिहास हमेशा के लिए दफन हो जाए।

इतिहास की पुनरावृत्ति: एक चेतावनी

आरएसएस का इतिहास हमेशा से ही विभाजनकारी रहा है। गांधी हत्या से लेकर 2002 गुजरात दंगों तक, इस संगठन पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। लेकिन शिंदे का खुलासा इसे एक आतंकी संगठन के रूप में प्रमाणित करता है। यह संगठन हिंदू एकता का ढोंग करता है, जबकि असल में मुसलमानों को निशाना बनाकर वोट बटोरने का काम करता है।

2025 तक भी, जब सोशल मीडिया पर ये चर्चाएँ हो रही हैं, संगठन की चुप्पी उनकी केंद्रीय भूमिका को स्वीकार करने जैसी है। यह संगठन भारत की बहुलता और धर्मनिरपेक्षता के लिए एक गंभीर खतरा है, जहाँ एक विशेष विचारधारा सत्ता की मदद से पूरे राष्ट्र को बंधक बनाने को तुली हुई है।

अंत में, शिंदे का हलफनामा एक कड़ी और स्पष्ट चेतावनी है: अगर आरएसएस जैसे संगठनों को नहीं रोका गया, तो भारत का भविष्य सांप्रदायिक आग में जल जाएगा। भाजपा को आतंकवाद का विरोध करने का नैतिक अधिकार नहीं है, जब उनके आका ही इस तरह की आतंकवादी साजिशें रचते हैं।

समाज को जागना होगा, क्योंकि मौजूदा सत्ताधारियों से न्याय की उम्मीद करना बेमानी होगी। इतिहास इन्हें ‘हिंदुत्व’ के नाम पर आतंकी साजिशकर्ता के रूप में याद करेगा। यह समय है कि हम इन साजिशों को उजागर करें, और देश की जनता को इनसे अवगत करायें, जिससे लोग इनके झाँसे में आकर अपना और देश का भविष्य बर्बाद न करें।

अगर नागरिक और संस्थाएँ अपनी भूमिका नहीं निभाएँगे तो लोकतंत्र को खतरा स्थायी बन सकता है। मजबूत विपक्ष, स्वतंत्र मीडिया और जागरूक नागरिक ही इसका समाधान हैं। पारदर्शिता और जवाबदेही के बिना लोकतंत्र का अस्तित्व अधूरा है।

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