गांधी बनाम मोदी मॉडल: मनरेगा का नाम बदलने पर छिड़ा सियासी संग्राम
गांधी बनाम मोदी मॉडल की यह बहस आज देश के राजनीतिक गलियारों में एक तूफान की तरह गूंज रही है। मोदी सरकार द्वारा हाल ही में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) को निरस्त करने और उसकी जगह ‘विकसित भारत ग्रामीण रोजगार और आजीविका मिशन’ (VB-G RAM G) एक्ट लाने के फैसले ने एक गंभीर विवाद को जन्म दे दिया है।
साल 2005 में शुरू हुई इस यूपीए-काल की प्रमुख योजना को 2009 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम से सम्मानित किया गया था, लेकिन अब इस नई व्यवस्था में उनके नाम को पूरी तरह से विलोपित कर दिया गया है।
वरिष्ठ पत्रकारों और विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक नाम का बदलाव नहीं है, बल्कि गांधीजी के आत्मनिर्भरता और ग्रामीण सशक्तिकरण के उन मूल आदर्शों पर एक प्रतीकात्मक हमला है, जिन्हें अब एक कॉर्पोरेट-शैली के संक्षिप्त नारे में तब्दील कर दिया गया है।
ग्राम स्वराज की आत्मा और आर्थिक न्याय के सिद्धांत पर संकट
इस योजना की जड़ें गहराई से महात्मा गांधी के ‘ग्राम स्वराज’ और ग्रामीण गरीबों के लिए आर्थिक न्याय के विचार से जुड़ी हुई हैं। MGNREGA ने देश के हर ग्रामीण परिवार को साल में कम से कम 100 दिन की मजदूरी का एक कानूनी अधिकार प्रदान किया था। यह सरकार की ओर से दिया गया कोई दान नहीं था, बल्कि यह गरीबों का हक था।
गांधी बनाम मोदी मॉडल के इस टकराव में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या अब अधिकारों की इस कानूनी गारंटी को कमजोर किया जा रहा है?
हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने खुद 2015 में संसद के पटल पर इसे “विफलताओं का स्मारक” करार दिया था, लेकिन यह भी एक कड़वी हकीकत है कि कोविड जैसी वैश्विक आपदा के दौरान इसी योजना ने देश के करोड़ों बेसहारा लोगों को भूख से बचाकर एक बड़ा सहारा दिया था।
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मांग-आधारित ढांचे का अंत और केंद्रीकृत नियंत्रण की शुरुआत
मनरेगा की सबसे बड़ी ताकत इसकी मांग-आधारित प्रकृति और काम के बदले भुगतान की पारदर्शिता में निहित थी। अब गांधीजी का नाम हटाकर जिस तरह से इतिहास को फिर से लिखने की कोशिश की जा रही है, वह ऐसा प्रतीत होता है मानो सरकार उस योजना का पूरा श्रेय खुद लेना चाहती है, जिसकी वह पहले सार्वजनिक रूप से हंसी उड़ाती रही थी।
VB-G RAM G के तहत केवल नाम का ही कायाकल्प नहीं किया गया है, बल्कि योजना के नियंत्रण को पूरी तरह से केंद्र में केंद्रित कर दिया गया है। इस नए बदलाव ने राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ा दिया है और बजट पर एक सख्त ‘कैप’ लगा दी है।
इसके अलावा, प्रदर्शन-आधारित मापदंडों की शुरुआत से यह गंभीर खतरा पैदा हो गया है कि समाज के सबसे कमजोर वर्ग इस सुरक्षा कवच से बाहर हो सकते हैं।
सुधार का मुखौटा और पुरानी व्यवस्था को तोड़ने की रणनीति
योजना के समर्थकों का तर्क है कि यह पुरानी व्यवस्था में सुधार और कुशलता लाने का एक प्रयास है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। वास्तव में, यह सुधार के नाम पर ग्रामीण भारत की लाइफलाइन को कमजोर करने का एक तरीका लगता है। पिछले कई वर्षों से मनरेगा को फंडिंग में भारी कटौती और वेतन भुगतान में होने वाली लंबी देरी जैसी समस्याओं से जूझना पड़ा है।
अब गांधी बनाम मोदी मॉडल के तहत इसे “सुधार” के नाम पर पहले तोड़ा जा रहा है, जबकि सच्चाई यह है कि ग्रामीण संकट आज भी उतना ही गहरा है जितना पहले था। सरकार इसे एक नए कलेवर में पेश कर रही है, लेकिन पुराने ढांचे की मजबूती को दरकिनार करना ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
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महात्मा की ‘दूसरी हत्या’ और विपक्ष का तीखा प्रतिरोध
कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों ने सरकार के इस कदम को “महात्मा की दूसरी हत्या” और गरीबों के खिलाफ एक सुनियोजित साजिश करार दिया है। सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे दिग्गज नेताओं ने इस फैसले को प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की मनमानी बताया है।
उनका आरोप है कि बिना किसी व्यापक कैबिनेट विचार-विमर्श के इतना बड़ा फैसला ले लिया गया। यह मुद्दा केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दो विचारधाराओं की सीधी टक्कर है।
एक तरफ गांधी का विकेंद्रीकरण का विचार है, जहाँ शक्ति गांवों के पास होती है, और दूसरी तरफ मोदी का व्यक्तिवादी, ‘टॉप-डाउन’ शासन मॉडल है, जो अपने रास्ते में आने वाली किसी भी विपरीत विरासत को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं दिखता।
विकसित भारत का दावा बनाम ग्रामीण पलायन की कड़वी हकीकत
दूसरी ओर, भाजपा के कुछ नेता और समर्थक इसे एक “व्यावहारिक रीसेट” के रूप में देख रहे हैं। उनका तर्क है कि मनरेगा तकनीकी रूप से “मृत” हो चुकी थी और VB-G RAM G अब संपत्ति निर्माण और कौशल विकास पर केंद्रित होगा, जो “विकसित भारत” की उनकी दृष्टि के साथ मेल खाता है।
लेकिन यह दावा उन आंकड़ों के सामने खोखला नजर आता है, जिन्होंने साबित किया है कि पुरानी योजना ने गरीबी कम करने और बड़े पैमाने पर होने वाले पलायन को रोकने में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है।
विशेषज्ञों का सवाल है कि अगर वास्तव में सुधार की मंशा थी, तो मौजूदा ढांचे को मजबूत करने के बजाय वैचारिक बदले की भावना से नाम बदलकर इतिहास मिटाने की जरूरत क्यों पड़ी?
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साबरमती से ‘साबरमोदी’ तक: विरासत मिटाने का डर
इस घटना के दूरगामी निहितार्थ बेहद डरावने हो सकते हैं। इसे गांधीजी से जुड़े अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों के नाम बदलने की एक शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में अब “साबरमोदी आश्रम” या “मोदीघाट” जैसे व्यंग्यात्मक डर चर्चा का विषय बन रहे हैं, जो भविष्य में हकीकत में भी बदल सकते हैं।
गांधी बनाम मोदी मॉडल की यह असुरक्षा इस बात को रेखांकित करती है कि आखिर सरकार को उस व्यक्ति से इतना डर क्यों है जो दशकों पहले शहीद हो चुका है? यदि सरकार की अपनी उपलब्धियां इतनी ठोस और मजबूत हैं, तो उसे किसी पुरानी विरासत को मिटाने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?
गरीबों के कल्याण से गांधी का नाम हटाकर सरकार अनजाने में उन ग्रामीण मतदाताओं को ही नाराज कर रही है, जिन्हें वह अपना सबसे बड़ा वोट बैंक मानती है।
लोकतांत्रिक ढांचे की नाजुकता और सत्य की शक्ति
निष्कर्ष के तौर पर, यह पूरा प्रसंग भारत की लोकतांत्रिक संरचना की नाजुकता को उजागर करता है, जहां राष्ट्रीय विरासतों को राजनीतिक दलों द्वारा एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। एक सच्चा और आत्मविश्वास से भरा नेतृत्व कभी भी अतीत को तोड़ता नहीं है, बल्कि वह पुरानी नींव पर नई मंजिलों का निर्माण करता है।
इसके विपरीत, हम आज मिटाने की एक ऐसी प्रक्रिया देख रहे हैं, जो अंततः सरकार पर ही उल्टी पड़ सकती है। गरीब जनता, जो गांधी की भावना से सशक्त हुई है, अपने हक वापस लेने के लिए फिर से खड़ी होगी।
इतिहास को काटने या दबाने पर वह खामोश नहीं रहता। मोदी सरकार योजनाओं के नाम तो बदल सकती है, लेकिन वह ‘सत्य’ का नाम और उसकी शक्ति को नहीं बदल सकती।
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