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MGNREGA का पुनर्गठन और नया जी राम जी बिल 2025:

MGNREGA का पुनर्गठन

तिरुवनंतपुरम में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय ने केंद्र सरकार के हालिया कदमों पर तीखा प्रहार किया है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (NREGA) के ढांचे में किए जा रहे बदलावों को ‘गरीबों पर आई सबसे बुरी आपदाओं में से एक’ बताते हुए उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि MGNREGA का पुनर्गठन लोकतंत्र पर हमला और देश के गरीब नागरिकों पर ‘मौत का फरमान’ है।

अरुणा रॉय बुधवार को यहां प्रेस क्लब में चिन्ता पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित अपनी किताब ‘द RTI स्टोरी: पावर टू द पीपल’ के मलयालम संस्करण के विमोचन के अवसर पर बोल रही थीं। उनके साथ इस मंच पर स्थानीय स्वशासन मंत्री एम बी राजेश और पूर्व मुख्य सचिव एस एम विजयानंद भी मौजूद थे।

रॉय ने चेतावनी दी कि लोगों का यह कानून, जिसे सालों की तैयारी, लंबी जांच और गहन विचार-विमर्श के बाद बनाया गया था, उसे ग्रामीण विकास मंत्रालय में कुछ हफ्तों या महीनों में तैयार किए गए किसी कानून से बदला नहीं जा सकता।

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लोकतंत्र पर प्रहार और रोजगार गारंटी का ऐतिहासिक महत्व

रोजगार गारंटी अधिनियम के गौरवशाली इतिहास को याद करते हुए अरुणा रॉय ने कहा कि यह एक असाधारण कानून था, जिसे भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से पारित किया था। उन्होंने वैश्विक स्तर पर इसकी साख का जिक्र करते हुए बताया कि विदेशी विशेषज्ञों ने इसे दुनिया का सबसे प्रभावी गरीबी विरोधी कार्यक्रम करार दिया था।

इस कानून की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यूरोपीय संसद से लेकर दक्षिण अमेरिका, उत्तरी अमेरिका, अफ्रीका और इंडोनेशिया तक में इसकी सफलता पर चर्चा हुई थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोलते हुए रॉय ने कहा कि संसद में अपने पहले ही संबोधन में उन्होंने देश की आर्थिक गिरावट के लिए NREGA को और नीतिगत पंगुता के लिए RTI को जिम्मेदार ठहराया था। उनके अनुसार, वर्तमान सरकार की नीतियां उस बुनियादी ढांचे को कमजोर कर रही हैं जिसने करोड़ों लोगों को सुरक्षा प्रदान की थी।

विकसित भारत-जी राम जी बिल 2025: बदलाव की गहराई

संसद के गलियारों में इस समय ‘विकसित भारत-जी राम जी बिल 2025’ को लेकर चर्चाएं तेज हैं। इस नई योजना पर बात करते हुए स्थानीय स्वशासन मंत्री एम बी राजेश ने कहा कि सरकार ने केवल नाम नहीं बदला है, बल्कि इसके मूल कंटेंट में भी भारी बदलाव किए हैं।

उन्होंने अपने उद्घाटन भाषण में चौंकाने वाले आंकड़े पेश करते हुए कहा कि MGNREGA का पुनर्गठन और नई संरचना से कम से कम 22 लाख परिवार सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि प्रभावित होने वाले इन लोगों में से कम से कम 90% महिलाएं हैं।

मंत्री ने संकेत दिया कि योजना के स्वरूप में बदलाव जमीनी स्तर पर काम करने वाली महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है।

125 दिन का रोजगार और नई तकनीकी व्यवस्था का ढांचा

लोकसभा में ‘विकसित भारत – रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) की गारंटी: विकसित भारत – जी राम जी बिल 2025’ पर विस्तार से चर्चा की गई। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान आज इस बिल पर सदन में जवाब देंगे। यह नया कानून बीस साल पुराने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 का स्थान लेगा।

सरकार का दावा है कि इस बिल का मुख्य उद्देश्य ‘विकसित भारत @2047’ के राष्ट्रीय विजन को प्राप्त करना है। इस नए कानून के तहत, हर ग्रामीण परिवार को अब 100 की जगह 125 दिनों के वेतन रोजगार की वैधानिक गारंटी दी जाएगी।

फंड शेयरिंग के मामले में केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 का अनुपात रहेगा, जबकि पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए यह 90:10 होगा। बेरोजगारी भत्ता और मुआवजे की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर बनी रहेगी।

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तकनीकी निगरानी और विकसित भारत इंफ्रास्ट्रक्चर स्टैक

नए बिल में पारदर्शिता लाने के लिए कई तकनीकी प्रावधान किए गए हैं। अब लेनदेन के लिए बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण अनिवार्य होगा, जबकि योजनाओं की निगरानी के लिए जियोस्पेशियल तकनीक और रियल-टाइम ट्रैकिंग हेतु मोबाइल एप्लीकेशन-आधारित डैशबोर्ड का उपयोग किया जाएगा।

साप्ताहिक सार्वजनिक प्रकटीकरण प्रणालियों के माध्यम से डेटा साझा किया जाएगा। बिल के तहत होने वाले सभी कार्यों को ‘विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण बुनियादी ढांचा स्टैक’ में एकीकृत किया जाएगा। इस नए ढांचे में जल सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।

जल संबंधी कार्यों, ग्रामीण बुनियादी ढांचे और आपदा तैयारी जैसे विशेष कार्यों पर जोर दिया जाएगा ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ और परिवर्तनकारी संपत्तियों का निर्माण सुनिश्चित हो सके।

नेशनल हेराल्ड फैसला और डीके शिवकुमार का पलटवार

इसी बीच कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने नेशनल हेराल्ड मामले में आए अदालती फैसले का स्वागत करते हुए इसे लोकतंत्र की जीत बताया है। सुवर्ण विधान सौधा परिसर में विरोध प्रदर्शन के दौरान उन्होंने कहा कि MGNREGA का पुनर्गठन करने वाली सरकार दरअसल बदले की राजनीति कर रही है।

शिवकुमार ने कहा, “मुझे खुशी है कि कोर्ट ने ED की चार्जशीट पर विचार करने से इनकार कर दिया। ED ने सत्ता का दुरुपयोग करके अपनी प्रतिष्ठा खो दी है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि नेशनल हेराल्ड एक राष्ट्रीय संपत्ति है और सोनिया गांधी व राहुल गांधी ने इसे निजी संपत्ति नहीं बनाया है।

उन्होंने तर्क दिया कि ट्रस्ट का अध्यक्ष होने के नाते वह संपत्ति के मालिक नहीं बन जाते, बल्कि यह संस्था की होती है। उन्होंने बीजेपी पर साजिश रचने का आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी को इन हथकंडों से डराया नहीं जा सकता।

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संसद में आधी रात तक चली बहस और विपक्ष के सवाल

संसद में ‘जी राम जी बिल’ पर हुई चर्चा ऐतिहासिक रही, जो बुधवार को आधी रात के बाद करीब 1:35 बजे तक चली। इस बहस में कुल 98 सदस्यों ने भाग लिया। कांग्रेस सांसद जय प्रकाश ने सरकार को घेरते हुए कहा कि जब यूपीए सरकार नरेगा लेकर आई थी, तब बीजेपी ने इसका विरोध किया था।

उन्होंने सवाल उठाया कि सरकार ने रोजगार के लिए तो नया बिल लाया, लेकिन किसानों के लिए MSP की कानूनी गारंटी सुनिश्चित करने वाला कोई बिल पेश नहीं किया।

वहीं दूसरी ओर, बीजेपी के बृजमोहन अग्रवाल ने बिल का समर्थन करते हुए कहा कि MGNREGA का पुनर्गठन महात्मा गांधी के आत्मनिर्भर और गरीबी मुक्त गांवों के विजन को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। उन्होंने कांग्रेस पर पुराने अधिनियम के माध्यम से भ्रष्टाचार करने का भी आरोप लगाया।

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वायु प्रदूषण पर चर्चा और भविष्य की रणनीति

आज लोकसभा की कार्यवाही में ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान सदन के सवालों का जवाब देंगे, जिससे नए बिल की स्थिति और स्पष्ट होगी। इसके साथ ही, सदन में दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बढ़ते वायु प्रदूषण पर भी चर्चा प्रस्तावित है।

कांग्रेस की ओर से प्रियंका गांधी वाड्रा इस चर्चा की शुरुआत कर सकती हैं, जबकि डीएमके की कनिमोझी और बीजेपी की बांसुरी स्वराज ने भी इस गंभीर मुद्दे पर चर्चा के लिए नोटिस दिए हैं। ग्रामीण विकास से लेकर पर्यावरण तक के इन मुद्दों पर सदन के भीतर और बाहर राजनीतिक सरगर्मी तेज बनी हुई है।

सरकार जहां इसे ‘विकसित भारत’ की ओर बढ़ता कदम बता रही है, वहीं अरुणा रॉय जैसे सामाजिक कार्यकर्ता और विपक्षी दल इसे गरीबों के अधिकारों का हनन मान रहे हैं।

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