गिग वर्कर्स देशव्यापी हड़ताल: 10-मिनट डिलीवरी मॉडल के खिलाफ विद्रोह
यह 10-मिनट डिलीवरी का चमकता हुआ जादू अब पूरी तरह खून से सना नजर आ रहा है। जिसे हम अपनी सुविधा समझते हैं, उसके पीछे छिपे दर्द और शोषण की गूंज अब सड़कों पर सुनाई दे रही है। इस साल क्रिसमस (25 दिसंबर 2025) के मौके पर Swiggy, Zomato, Zepto, Blinkit, Amazon और Flipkart जैसे दिग्गज प्लेटफॉर्म्स के हजारों डिलीवरी वर्कर्स ने गिग वर्कर्स देशव्यापी हड़ताल की शुरुआत कर दी है।
इस अचानक हुई फ्लैश स्ट्राइक ने देश के बड़े शहरों, खासकर गुरुग्राम, हैदराबाद, बेंगलुरु और दिल्ली-NCR में फूड और ग्रॉसरी डिलीवरी व्यवस्था को पूरी तरह ठप कर दिया।
यह कोई सामान्य विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म इकोनॉमी में व्याप्त उस शोषण के खिलाफ एक संगठित विद्रोह है, जहां कंपनियां तो अरबों का मुनाफा कूट रही हैं, लेकिन इन वर्कर्स को केवल “पार्टनर” का झुनझुना थमाकर उन्हें ‘डिस्पोजेबल’ यानी इस्तेमाल करो और फेंको वाली वस्तु बना दिया गया है।
एल्गोरिदम का जाल और शोषक बनता डिजिटल सिस्टम
आज के दौर में इन वर्कर्स का सबसे बड़ा शोषक कोई इंसान नहीं, बल्कि एक ‘एल्गोरिदम’ बन चुका है। पारदर्शी सैलरी स्ट्रक्चर की जगह अब इन वर्कर्स के पास केवल अनिश्चित पेमेंट की चिंता बची है। घटती कमाई और लगातार बढ़ते फ्यूल, मेंटेनेंस व लाइफ कॉस्ट के बोझ तले ये लोग दबे जा रहे हैं।
एक डिलीवरी वर्कर दिन के 12 से 15 घंटे हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद औसतन महज ₹700-800 ही कमा पाता है। इस मामूली रकम के लिए उन्हें अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती है। गिग वर्कर्स देशव्यापी हड़ताल का मुख्य उद्देश्य इसी एल्गोरिदमिक भेदभाव और अनिश्चितता को खत्म करना है, ताकि एक गरिमापूर्ण आजीविका सुनिश्चित हो सके।
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10-मिनट डिलीवरी मॉडल: सड़कों पर बिछती मौत की बिसात
कंपनियों के बीच छिड़ी ’10-मिनट डिलीवरी’ की इस अंधी दौड़ ने भारतीय सड़कों को ‘मौत का मैदान’ बना दिया है। ग्राहकों को चंद मिनटों में सामान पहुंचाने के दबाव में इन राइडर्स को ट्रैफिक नियम तोड़ने, जानलेवा ओवरस्पीडिंग करने और रेड लाइट जंप करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
आंकड़े इसकी गवाही देते हैं; अकेले बेंगलुरु में 2025 के पहले 9 महीनों में डिलीवरी पर्सन्स के खिलाफ 63,718 ट्रैफिक वॉयलेशन केस दर्ज किए गए। सबसे दुखद पहलू यह है कि पिछले तीन सालों में 27 से ज्यादा डिलीवरी वर्कर्स अलग-अलग एक्सीडेंट्स में अपनी जान गंवा चुके हैं या गंभीर रूप से घायल हुए हैं।
क्या हमारी 10 मिनट की सुविधा किसी की जान से ज्यादा कीमती है? यह सवाल आज हर उस शख्स से है जो बिना सोचे ऐप पर ‘ऑर्डर’ बटन दबाता है।
यूनियनों का नेतृत्व और 31 दिसंबर की ‘बड़ी जंग’ का ऐलान
इस ऐतिहासिक संघर्ष का नेतृत्व ‘Telangana Gig and Platform Workers Union’ (TGPWU) और ‘Indian Federation of App-Based Transport Workers’ (IFAT) कर रहे हैं। इन यूनियनों ने स्पष्ट कर दिया है कि क्रिसमस की स्ट्राइक तो बस एक चेतावनी थी। अब 31 दिसंबर 2025 (न्यू ईयर ईव) पर और भी बड़ी और लंबी हड़ताल की घोषणा की गई है।
यूनियन लीडर्स जैसे शेख सलाहुद्दीन (TGPWU) और मोहम्मद इनायत अली (IFAT) का कहना है कि जब तक उनकी बुनियादी मांगें नहीं मानी जातीं, संघर्ष जारी रहेगा। गिग वर्कर्स देशव्यापी हड़ताल के जरिए यह संदेश दिया गया है कि उत्सवों की चमक इन वर्कर्स के पसीने और खून की बलि देकर नहीं मनाई जा सकती।
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जीवन-मरण का सवाल: यूनियनों की पांच प्रमुख मांगें
यूनियनों ने कंपनियों और सरकार के सामने पांच ऐसी मांगें रखी हैं जो उनके लिए जीवन-मरण का सवाल बन चुकी हैं। पहली मांग है पारदर्शी और फेयर पेमेंट स्ट्रक्चर, ताकि वर्कर को पता हो कि उसे कितनी मेहनत का क्या फल मिल रहा है। दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण मांग है ’10-मिनट डिलीवरी मॉडल’ का तत्काल खात्मा।
इसके अलावा, बिना किसी ठोस कारण के वर्कर्स की ID या अकाउंट ब्लॉक करने की मनमानी पर रोक, बेहतर सेफ्टी गियर व पर्याप्त एक्सीडेंट इंश्योरेंस की उपलब्धता और एल्गोरिदमिक भेदभाव का अंत करना शामिल है। ये मांगें सिर्फ पैसों की बढ़ोतरी के लिए नहीं हैं, बल्कि यह सम्मान, सुरक्षा और मानवीय गरिमा की लड़ाई है।
सरकारी सुधार: हकीकत या सिर्फ कागजी खानापूर्ति?
सरकार की ओर से किए जा रहे सुधारों की स्थिति फिलहाल ‘कागजी’ ही नजर आती है। हालांकि, ‘Code on Social Security’ 21 नवंबर 2025 से लागू कर दिया गया है, जिसमें प्लेटफॉर्म्स को अपने टर्नओवर का 1-2% (कुल पेमेंट्स का 5% तक कैप्ड) सोशल सिक्योरिटी फंड में देने का प्रावधान है।
इस फंड से हेल्थ इंश्योरेंस, एक्सीडेंट कवर और पेंशन जैसी सुविधाएं मिलनी चाहिए। कर्नाटक, राजस्थान, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों ने ‘Gig Workers Welfare Acts’ भी पास किए हैं, लेकिन धरातल पर इनका अमल लगभग शून्य है।
e-Shram पोर्टल पर अब तक केवल 3-4 लाख प्लेटफॉर्म वर्कर्स ही रजिस्टर्ड हो पाए हैं, जबकि असल संख्या 1 करोड़ से भी ज्यादा है। यूनियन नेताओं का मानना है कि जब तक असली सुरक्षा और फंड का सही इस्तेमाल नहीं होता, ये कानून सिर्फ एक दिखावा ही बने रहेंगे।
डिजिटल इकोनॉमी की रीढ़, फिर भी कंपनियां मानती हैं ‘डिस्पोजेबल’
ये वर्कर्स आज की डिजिटल इकोनॉमी की असली रीढ़ हैं। इनके बिना न घर पर खाना पहुंचेगा, न जरूरी सामान और न ही कोई उत्सव पूरा होगा। लेकिन विडंबना देखिए कि कंपनियां इन्हें महज एक डिस्पोजेबल पुर्जा मानती हैं। एक क्लिक पर इनका अकाउंट ब्लॉक कर दिया जाता है, कोई ग्रिवांस रिड्रेसल सिस्टम (शिकायत निवारण) नहीं है और न ही कंपनियों में कोई मानवीय संपर्क का जरिया है।
पीक पीरियड जैसे कि फेस्टिवल्स, सेल या न्यू ईयर के दौरान जब ऑर्डर का दबाव सबसे ज्यादा होता है, तब इन वर्कर्स का शोषण भी अपने चरम पर होता है।
यह एक नंगा शोषण है, जहां ग्राहक की 10 मिनट की खुशी वर्कर की जिंदगी के 10 साल कम कर रही है। जो भी वर्कर अपनी आवाज उठाता है या यूनियन बनाने की कोशिश करता है, उसे कंपनियां धमकाती हैं और ब्लैकलिस्ट कर देती हैं।
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रणनीतिक प्रहार: उत्सव की खुशियों पर हक की आवाज
इस गिग वर्कर्स देशव्यापी हड़ताल का समय बेहद रणनीतिक चुना गया है। जब कंपनियां पीक सीजन (क्रिसमस और न्यू ईयर) में सबसे ज्यादा मुनाफा कमाती हैं, ठीक उसी वक्त वर्कर्स ने अपनी आवाज बुलंद की है। क्रिसमस की स्ट्राइक में गुरुग्राम जैसे शहरों में डिलीवरी व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई, जबकि दिल्ली-NCR में इसका आंशिक असर रहा।
अब 31 दिसंबर को होने वाली पूर्ण हड़ताल अगर सफल हुई, तो न्यू ईयर की पार्टियां और उत्सव ठप हो सकते हैं। मुनाफा उनका और दर्द हमारा—यह नारा अब सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है, बल्कि लाखों वर्कर्स के दिलों में मशाल बनकर जल रहा है।
अगर कंपनियां अब भी नहीं जागीं, तो आने वाले महीनों में यह संघर्ष और भी व्यापक, संगठित और लंबा होगा। डिजिटल गुलामी का अंत अब दूर नहीं है, इसकी शुरुआत हो चुकी है।
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