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बजट 2026 की ज़मीनी हकीकत: सरकारी दावों और कड़वे सच का टकराव

बजट 2026 की ज़मीनी

बजट 2026 की ज़मीनी हकीकत आज भारत की अर्थव्यवस्था के उस स्याह पक्ष को उजागर कर रही है, जहाँ मोदी सरकार की नीतियां आम आदमी की कमर तोड़ रही हैं। बजट में विकास-उन्मुख होने का दावा तो जोर-शोर से किया गया है, लेकिन वास्तविकता में यह किसानों और मध्यम वर्ग की अनदेखी का एक बड़ा प्रतीक बन गया है।

आज देश में बेरोजगारी की दर 7-8% तक पहुंच चुकी है, जो हमारे युवाओं को विदेशों में अपमानजनक और जोखिम भरी नौकरियां तलाशने पर मजबूर कर रही है। सोशल प्लेटफॉर्म पर भाजपा के पारंपरिक वोटर्स का गुस्सा अब साफ देखा जा सकता है, क्योंकि सरकार की ‘एंटी-इंकंबेंसी’ अब छिपाए नहीं छिप रही है।

कांग्रेस की ‘रियल स्टेट ऑफ द इकोनॉमी 2026’ रिपोर्ट ने भी सरकारी जीडीपी आंकड़ों पर गहरे संदेह जताए हैं, जो गिरते हुए मैन्युफैक्चरिंग, एफडीआई और नौकरियों के स्तर को बेनकाब करती है। यह पूरी तस्वीर पेश करती है कि देश कॉर्पोरेट्स के लिए तो स्वर्ग है, पर किसान और मध्यम वर्ग के लिए किसी नर्क से कम नहीं।

यूएस-इंडिया ट्रेड डील: किसानों के लिए मौत का फरमान सरकार की यूएस-इंडिया ट्रेड डील को लेकर दिखाई जा रही उत्सुकता भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए किसी ‘मौत के फरमान’ से कम नहीं है। बजट 2026 की ज़मीनी हकीकत यह है कि यह डील अमेरिकी सब्सिडाइज्ड कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार में सस्ते दामों पर डंप करने की खुली छूट दे देगी।

इससे स्थानीय बाजार में फसलों की कीमतें गिरेंगी और छोटे किसानों की आय पूरी तरह खत्म हो जाएगी। सोशल मीडिया पर यह चर्चा आम है कि नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक किसी ने भी भारतीय किसानों के हितों को अमेरिका के हवाले नहीं किया, लेकिन मोदी सरकार ने यह ‘क्रूर विश्वासघात’ कर दिया है।

इसके परिणामस्वरूप ग्रामीण बेरोजगारी बढ़ेगी, शहरों की ओर पलायन तेज होगा और देश की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। सरकार की यह नीति किसानों को कॉर्पोरेट जाल में फंसा रही है और जीएमओ व रसायनों के जरिए हमारी मिट्टी व स्वास्थ्य को बर्बाद कर रही है।

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अन्नदाता की अनसुनी मांगें और स्थायी विद्रोह देश में किसान विरोध प्रदर्शन अब एक स्थायी विद्रोह का रूप ले चुके हैं, जहाँ 2017 से चली आ रही उनकी बुनियादी मांगें आज भी अनसुनी हैं। फसल की कम कीमतें, लगातार पड़ता सूखा और सिर चढ़ते कर्ज ने लाखों किसानों को आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठाने की ओर धकेला है।

बजट 2026 में कृषि और ग्रामीण आवंटन के लिए 1.63 लाख करोड़ का दावा तो किया गया है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा बड़े कारोबारियों और टेक-आधारित निवेशों की भेंट चढ़ रहा है। छोटे किसानों की आय सुरक्षा और उनके कल्याण को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है।

आज एक औसत किसान पर 74,000 रुपये का कर्ज है और 86% खेत दो हेक्टेयर से भी छोटे हैं, जहाँ कीमतों में जरा सी गिरावट 150 मिलियन परिवारों को तबाह कर सकती है। सरकार ‘वंदे मातरम’ के नारों से किसानों को बहला रही है, लेकिन असल में उन्हें कॉर्पोरेट लाभ के लिए कर्ज के जाल में झोंक रही है।

मध्यम वर्ग पर टैक्स की असहनीय दोहरी मार मध्यम वर्ग के लिए बजट 2026 की ज़मीनी हकीकत अत्यंत कड़वी है, जहाँ टैक्स का बोझ अब असहनीय हो चुका है। एलटीसीजी (LTCG) और एसटीटी (STT) की दोहरी कर व्यवस्था सरकार के लिए लूट का नया हथियार बन गई है।

2004 में यूपीए सरकार ने जब एसटीटी लगाया था, तो एलटीसीजी हटा दिया था, लेकिन मोदी सरकार ने 2018 में एलटीसीजी (10%) वापस लाने के बावजूद एसटीटी नहीं हटाया। बल्कि, पिछले बजट में एसटीटी को 60% और बढ़ा दिया गया। यूजीसी गाइडलाइंस और डिविडेंड पर बढ़ते करों के बोझ से मध्यम वर्ग की बरसों की जमा-पूंजी और बचत खत्म हो रही है।

हालांकि बजट में कुछ टैक्स राहतों का दावा किया गया है, लेकिन वे मुख्यतः शहरी उच्च-मध्यम वर्ग तक सीमित हैं, जबकि ग्रामीण और निम्न-मध्यम वर्ग को भुला दिया गया है। 12 लाख तक कोई टैक्स नहीं होने का दावा महज एक ‘हेडलाइन मैनेजमेंट’ है, जबकि हकीकत में सैलरीड क्लास पर कर वसूली की कई परतें थोपी गई हैं।

बेरोजगारी का दंश और युवाओं का विदेशों की ओर पलायन मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता बेरोजगारी के मोर्चे पर है, जहाँ दो करोड़ नौकरियों का सालाना वादा पूरी तरह हवा-हवाई साबित हुआ। सीएमआईई 2025 के आंकड़े बताते हैं कि देश का युवा वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित है।

ऊपर से एआई (AI) के आने से 5.6 मिलियन टेक जॉब्स पर खतरा मंडरा रहा है। स्थिति इतनी विकट है कि किसानों के पढ़े-लिखे बेटे-बेटियां विदेशों में अपमानजनक परिस्थितियों में काम करने को मजबूर हैं। घरेलू अर्थव्यवस्था में रोजगार सृजन का स्तर बेहद असंतुलित है और हर सेक्टर में असमानता, स्थिर वेतन व कम उत्पादकता का बोलबाला है।

विपक्षी सांसदों द्वारा उठाए गए गिग वर्कर्स की असुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी जैसे मुद्दे इसे और गहरा बनाते हैं। सरकार युवाओं को ‘नई नौकरियों’ के सपने तो दिखा रही है, लेकिन हकीकत में उन्हें बेरोजगारी के गहरे अंधेरे में धकेल रही है।

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गिग वर्कर्स और स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकार की उदासीनता प्लेटफॉर्म इकोनॉमी में काम करने वाले गिग वर्कर्स की सुरक्षा को लेकर सरकार का रवैया किसी अपराध से कम नहीं है। गिग वर्कर्स का आंदोलन लगातार बढ़ रहा है, क्योंकि ‘कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी 2022’ में उन्हें ‘फ्लेक्सिबल’ करार देकर श्रम नियमों से बाहर रखा गया है।

यह मोदी की उन ‘न्यू एज पॉलिसीज’ का हिस्सा है जो श्रमिकों को असुरक्षित बनाती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में भी असमानता की खाई चौड़ी हुई है। महामारी के बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बेहद सीमित बनी हुई है।

सोशल मीडिया पर इन मुद्दों को लेकर विपक्षी सांसदों के तर्क वायरल हो रहे हैं, लेकिन सरकार की प्राथमिकताएं केवल कॉर्पोरेट डील्स तक सीमित हैं। यह नीति गिग वर्कर्स को आधुनिक युग का गुलाम बना रही है और स्वास्थ्य संकट के समय आम आदमी को उसके हाल पर छोड़ दिया जाता है।

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एंटी-इंकंबेंसी की आग और भाजपा वोटर्स का गुस्सा आज बजट 2026 की ज़मीनी हकीकत के बीच ‘एंटी-इंकंबेंसी’ मोदी सरकार की परछाई बन चुकी है। भाजपा के अपने वोटर्स के बीच बढ़ता गुस्सा इस बात का गवाह है।

किसानों का ऋण संकट, मध्यम वर्ग पर टैक्स का असहनीय बोझ और बेरोजगारी ने मिलकर एक ऐसा विस्फोटक वातावरण तैयार किया है, जहाँ 2024 के चुनाव परिणामों के बाद से इंकंबेंट्स की हार का वैश्विक ट्रेंड भारत में भी दिखने लगा है।

सरकार की नीतियां केवल कॉर्पोरेट्स और विदेशी हितों को साधने में लगी हैं, जबकि आम भारतीय जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है। यह असंतोष किसी भी समय एक बड़े राजनीतिक भूकंप में तब्दील हो सकता है।

विकसित भारत बनाम कड़वी सच्चाई अंत में, कड़वी सच्चाई यही है कि मोदी सरकार द्वारा दिखाया गया ‘विकसित भारत’ का सपना वास्तव में देश के बहुसंख्यक वर्ग के लिए असमानता और निराशा का एक पुलिंदा बनकर रह गया है।

मध्यम वर्ग की खाली होती जेबें और किसानों की बढ़ती बदहाली इस बात की तस्दीक करती है कि विकास का पहिया केवल कुछ खास लोगों के लिए ही घूम रहा है। यदि सरकार समय रहते नहीं जागी, तो यह जन-आक्रोश सत्ता की जड़ों को हिलाने के लिए पर्याप्त होगा। यह बजट केवल आंकड़ों की बाजीगरी है, जो धरातल की समस्याओं का समाधान करने में पूरी तरह विफल रहा है।

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