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बजट 2026: मध्यम वर्ग पर बोझ, कॉर्पोरेट को छूट और सामाजिक अनदेखी

मध्यम वर्ग पर बोझ

मध्यम वर्ग पर बोझ वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा 1 फरवरी 2026 को पेश किया गया केंद्रीय बजट 2026-27 देश की आर्थिक दिशा को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े करता है। इस बार कुल प्राप्तियों में व्यक्तिगत आयकर (Income Tax) की हिस्सेदारी 21% रही है, जबकि कॉर्पोरेट टैक्स का योगदान महज 18% दर्ज किया गया है।

यह आंकड़ा पिछले कुछ वर्षों की उसी प्रवृत्ति को मजबूत करता है, जिसमें मध्यम वर्ग पर बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। बजट दस्तावेजों के आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, कॉर्पोरेट टैक्स से सरकार को 12,31,000 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है, जबकि व्यक्तिगत आयकर से यह वसूली 14,66,000 करोड़ रुपये तक जा पहुँची है। यह भारी अंतर प्रत्यक्ष रूप से कॉर्पोरेट दरों में दी जा रही लगातार छूट और व्यक्तिगत करदाताओं की संख्या में हुई वृद्धि का परिणाम है।

कॉर्पोरेट को रियायत और व्यक्तिगत करदाताओं की बढ़ती भागीदारी

इस बजट संरचना के पीछे के कारणों का विश्लेषण करें तो स्पष्ट होता है कि मोदी सरकार की नीतियां कॉर्पोरेट सेक्टर को निवेश के लिए प्रोत्साहित करने पर केंद्रित हैं। नई रिजीम के तहत कॉर्पोरेट टैक्स की प्रभावी दर को 22% तक लाना और MAT (मिनिमम अल्टरनेट टैक्स) को 15% से घटाकर 14% करना इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं।

हालांकि, दूसरी ओर मध्यम वर्ग पर बोझ कम होने का नाम नहीं ले रहा है, क्योंकि बेहतर अनुपालन (Compliance) और सैलरी स्ट्रक्चर के चलते व्यक्तिगत कर का योगदान कुल टैक्स राजस्व का सबसे बड़ा हिस्सा बन गया है।

सरकार पर यह आरोप कि वह “खुलेआम” आम आदमी से अधिक वसूल रही है, सांख्यिकीय रूप से आंशिक रूप से सही प्रतीत होता है। यह नीति भविष्य में असमानता को और बढ़ा सकती है, विशेषकर तब जब मध्यम वर्ग की आय वृद्धि मुद्रास्फीति की तुलना में धीमी बनी हुई है।

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सामाजिक क्षेत्रों पर आवंटन: मामूली बढ़ोत्तरी या महज आंकड़ों का खेल?

बजट के व्यय पक्ष को देखें तो शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक क्षेत्रों के आवंटन में वृद्धि तो की गई है, लेकिन यह वृद्धि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। शिक्षा के लिए 1.39 लाख करोड़ रुपये और स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 1.05-1.07 लाख करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं।

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को 1.40-1.63 लाख करोड़ रुपये आवंटित हुए हैं। हालांकि ये आंकड़े पिछले संशोधित अनुमानों से 10-14% की बढ़ोत्तरी दिखाते हैं, लेकिन 53.5 लाख करोड़ रुपये के कुल बजट और 12.2 लाख करोड़ रुपये के कैपिटल एक्सपेंडिचर के सामने यह हिस्सा बेहद मामूली है। विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक विकास के लिए आवश्यक यह निवेश पर्याप्त नहीं है।

बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य लक्ष्यों से दूरी

आलोचकों का एक बड़ा वर्ग इस बात से चिंतित है कि नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत जीडीपी का 6% शिक्षा पर खर्च करने का लक्ष्य अभी भी एक सपना बना हुआ है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बजट भाषण में ‘स्कूल शिक्षा’ का विशेष जिक्र तक नहीं किया गया, जो मानव पूंजी विकास की बुनियादी अनदेखी को दर्शाता है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में 10% की वृद्धि के साथ AIIMS विस्तार और मानसिक स्वास्थ्य पर जोर तो है, लेकिन कुल जीडीपी के अनुपात में यह खर्च अभी भी वैश्विक मानकों से काफी पीछे है। बुनियादी सुविधाओं में निवेश की कमी दर्शाती है कि मध्यम वर्ग पर बोझ केवल टैक्स तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें मिलने वाली सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता पर भी इसका असर पड़ रहा है।

कम मुद्रास्फीति और राजकोषीय घाटे का समीकरण

आर्थिक स्थिरता के दृष्टिकोण से 2026-27 का बजट पिछले वर्षों के मुकाबले अधिक विश्वसनीय नजर आता है। साल 2025 में औसत CPI मुद्रास्फीति 1.7% रही है, जो RBI के 4% के लक्ष्य से काफी कम है। इस कम महंगाई के दौर में 10% की नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ वास्तविक खर्च को मजबूती प्रदान करती है।

सरकार ने राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को 4.3% पर रखने का लक्ष्य रखा है, जो पिछले वर्ष के 4.4% से मामूली गिरावट है। हालांकि, यह समेकन की धीमी गति की ओर इशारा करता है। समस्या यह भी है कि कम खर्च की पुरानी बीमारी अभी भी बरकरार है; उदाहरण के तौर पर 2025-26 में कई महत्वपूर्ण योजनाओं के बजट में 10-20% की कटौती देखी गई थी।

कृषि क्षेत्र में संकट और नवाचार के बीच का द्वंद्व

किसानों के लिए बजट में पीएम-किसान योजना के 63,500 करोड़ रुपये बरकरार रखे गए हैं और ‘Bharat Vistar’ जैसे AI टूल्स व उच्च मूल्य वाली फसलों (नारियल, काजू, सैंडलवुड) पर फोकस बढ़ाया गया है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि कृषि अनुसंधान में 4.8% की कटौती की गई है।

किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य अभी भी अधूरा है और इनपुट लागत स्थिर होने के बावजूद ग्रामीण संकट कम नहीं हुआ है।

बजट विविधता को तो प्रोत्साहित करता है, लेकिन एमएसपी (MSP) या प्रत्यक्ष आय समर्थन में कोई बड़ा उछाल न होने से किसान संगठनों में असंतोष की स्थिति बनी रहने की संभावना है। स्पष्ट तौर पर यह बजट कॉर्पोरेट-फ्रेंडली छवि की ओर अधिक झुका हुआ दिखता है।

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रक्षा और बुनियादी ढांचे पर भारी निवेश बनाम सामाजिक कल्याण

सरकार की प्राथमिकताएं स्पष्ट रूप से रक्षा और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) की ओर मुड़ी हुई हैं। रक्षा क्षेत्र को 7.85 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो 15-20% की भारी वृद्धि दर्शाता है। इसके विपरीत, पीएम-जय (PM-JAY) और पोषण (POSHAN) जैसी योजनाओं में कटौती या कम आवंटन यह संकेत देता है कि सामाजिक कल्याण की तुलना में हार्ड इंफ्रास्ट्रक्चर को तरजीह दी जा रही है।

ऐसे में मध्यम वर्ग पर बोझ और बढ़ जाता है क्योंकि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सेवाओं के लिए उन्हें निजी क्षेत्र पर निर्भर रहना पड़ता है। यद्यपि सरकार का लक्ष्य 2031 तक ऋण-से-जीडीपी अनुपात को 50% तक लाना है, लेकिन इस प्रक्रिया में समावेशी विकास का लक्ष्य कहीं पीछे छूटता नजर आ रहा है।

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विकसित भारत का सपना और मध्यम वर्ग की निराशा

निष्कर्ष के तौर पर, बजट 2026-27 राजकोषीय अनुशासन और विकास (जैसे मैन्युफैक्चरिंग, CCUS और बायोफार्मा) के बीच संतुलन बनाने की एक कोशिश है। नई आय कर अधिनियम 2025 जैसे सुधार लंबी अवधि के लिए बेहतर हो सकते हैं, लेकिन वर्तमान में टैक्स स्लैब में कोई बदलाव न होने से करदाताओं में निराशा है।

यह सच है कि मध्यम वर्ग पर बोझ बढ़ाकर सरकार कॉर्पोरेट को जो राहत दे रही है, उसका लाभ निचले स्तर तक पहुँचने में समय लगेगा। यदि भारत को 7% से अधिक की विकास दर बनाए रखनी है, तो उसे शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि में और अधिक आक्रामक निवेश करना होगा। अन्यथा, यह असमान विकास सामाजिक अशांति का कारण बन सकता है और ‘विकसित भारत’ की राह कठिन हो सकती है।

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