ज्ञानेश कुमार विवाद: सुप्रीम कोर्ट, लोकतंत्र और संविधान की रक्षा
ज्ञानेश कुमार विवाद के केंद्र में खड़े सवालों ने आज देश के संवैधानिक ढांचे और लोकतंत्र की नींव को हिलाकर रख दिया है। एक वरिष्ठ संपादक होने के नाते, यह कहना दुखद है कि अब देश की जनता के बीच यह गंभीर आशंका बलवती हो रही है कि भारत के संविधान और लोकतन्त्र की रक्षा सुप्रीम कोर्ट बिल्कुल नहीं करेगा
क्योंकि यह भी बीजेपी के साथ खड़ा हो गया है। यह आरोप सीधा और विस्फोटक है, जो न केवल न्यायपालिका की सबसे बड़ी संस्था की निष्पक्षता पर, बल्कि देश के राजनीतिक परिदृश्य की वर्तमान दशा पर भी एक तीखा प्रश्नचिह्न लगाता है।
इस देश के नागरिक होने के नाते, हमें इस भयावह स्थिति का सीधा सामना करना होगा, क्योंकि अब मामला केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, बल्कि देश के भविष्य का है।
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सर्वोच्च न्यायपालिका पर विश्वास का टूटना
न्यायपालिका को लोकतंत्र का तीसरा और सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता है, जिसका मुख्य कार्य संविधान की अंतिम व्याख्या करना और नागरिक अधिकारों की रक्षा करना है।
लेकिन जब यह धारणा आम होने लगे कि सुप्रीम कोर्ट भी एक विशेष राजनीतिक दल के साथ ‘खड़ा’ है, तो यह देश की न्यायिक स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
जनता का विश्वास ही न्यायपालिका की वास्तविक शक्ति है, और इस विश्वास का क्षरण होना हमारे लोकतंत्र के लिए एक आत्मघाती मोड़ है। यह स्थिति सीधे तौर पर उन सभी संवैधानिक आदर्शों का खंडन करती है जिन पर हमारा राष्ट्र खड़ा है।
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ज्ञानेश कुमार: लोकतन्त्र के हत्यारे को सड़क पर लाने की मांग
मौजूदा विवाद का एक प्रमुख बिंदु ज्ञानेश कुमार से जुड़ा हुआ है। आम जनता में यह भावना घर कर गई है कि ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति विवादों से परे नहीं है, और इस नियुक्ति को लोकतंत्र के लिए एक गहरा आघात माना जा रहा है।
जनता के इस आक्रोश को शब्दों में व्यक्त करते हुए यह कहा गया है कि, “अब तो देश की जनता को ही ज्ञानेश कुमार जैसे लोकतन्त्र के हत्यारे को घसीट कर सड़क पर लाकर संविधान और लोकतन्त्र के न्याय करना होगा वर्ना अब देश नहीं बचेगा।”
यह वाक्य न केवल नागरिक हताशा को दर्शाता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि जनता को अब न्यायिक प्रक्रिया पर नहीं, बल्कि अपने सामूहिक प्रतिरोध पर अधिक भरोसा है।
चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता पर उठे सवाल
ज्ञानेश कुमार विवाद का जन्म मुख्य रूप से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को बदलने वाले नए कानून से हुआ। पूर्व में, चयन पैनल में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल होते थे। सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं यह अंतरिम व्यवस्था तब तक के लिए दी थी जब तक संसद कानून न बना दे।
लेकिन केंद्र सरकार ने नए कानून (मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023) के तहत CJI को पैनल से हटाकर उनकी जगह एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर लिया।
इस बदलाव ने विपक्ष को बहुमत से बाहर कर दिया, जिससे चयन में सरकार का प्रभुत्व स्थापित हो गया। विपक्ष ने इस कदम को संविधान की भावना के खिलाफ बताया और ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति पर अपनी असहमति (राहुल गांधी ने) दर्ज कराई।
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संविधान की रक्षा: जनता की अंतिम आस
यह स्थिति हमें एक कठोर सत्य की ओर ले जाती है: लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास होती है। जब सभी संवैधानिक संस्थाओं पर संदेह होता है, तब संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी सीधे देश की जनता पर आ जाती है।
यह एक आह्वान है कि नागरिकों को निष्क्रिय दर्शक बने रहने के बजाय, अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग होकर खड़ा होना होगा।
सड़क पर उतरना और संवैधानिक मूल्यों के लिए आवाज़ उठाना ही एकमात्र तरीका बचता है, क्योंकि अन्यथा, जैसा कि कहा गया है, “अब देश नहीं बचेगा”।
लोकतंत्र का न्याय: सड़क पर क्यों घसीटना चाहते हैं?
जब न्याय की उम्मीद न्याय के मंदिरों से टूट जाती है, तब लोग न्याय के लिए अपने ही तरीकों की कल्पना करने लगते हैं। ज्ञानेश कुमार को सड़क पर “घसीट कर” न्याय करने की बात, न्यायपालिका की स्थापित प्रक्रिया में जनता के विश्वास के गंभीर ह्रास को दर्शाती है।
यह न्याय की मांग की एक अतिवादी अभिव्यक्ति है, जो यह बताती है कि लोग मानते हैं कि मौजूदा संस्थागत ढांचे के भीतर अब न्याय संभव नहीं है। यह आक्रोश कानून के शासन को बनाए रखने की चुनौती है और साथ ही नागरिक जागृति का संकेत भी।
राजनीतिक दलों के आरोप और प्रत्यारोप
यह विवाद केवल एक नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बीजेपी और विपक्षी दलों के बीच गहरे राजनीतिक संघर्ष को दर्शाता है। विपक्षी दल, विशेषकर कांग्रेस, ज्ञानेश कुमार पर बीजेपी की सदस्यता ग्रहण करने और प्रवक्ता बनने जैसे गंभीर आरोप भी लगा रहे हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि चुनाव आयोग किसी दल के प्रति गलत भावना नहीं रख सकता और उनके लिए सत्तारूढ़ और विपक्षी दल समान हैं।
उन्होंने वोट चोरी के आरोपों को संविधान का अपमान बताया और संवैधानिक कर्तव्यों से पीछे न हटने की बात दोहराई। हालांकि, ज्ञानेश कुमार विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव आयोग जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थान भी आज गहरे राजनीतिक ध्रुवीकरण का शिकार हो गए हैं।
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वैश्विक मंच पर भारत के लोकतंत्र की छवि
भारत को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में जाना जाता है। इस प्रकार के विवाद, जहाँ सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न उठाए जाते हैं, वैश्विक मंच पर देश की लोकतांत्रिक साख को चोट पहुँचाते हैं।
एक मजबूत लोकतंत्र के लिए संस्थागत ईमानदारी और पारदर्शिता अपरिहार्य है। यदि ज्ञानेश कुमार विवाद को संवैधानिक मर्यादाओं और जनता के विश्वास के अनुरूप हल नहीं किया गया, तो यह भारत की लोकतांत्रिक छवि के लिए एक स्थायी क्षति साबित हो सकता है।



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