हर्ष हेट स्पीच बिल: कर्नाटक में अभिव्यक्ति की आजादी का अंत या तानाशाही?
हर्ष हेट स्पीच बिल कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने ‘हेट स्पीच और हेट क्राइम्स (प्रिवेंशन) बिल, 2025’ को पारित कर यह संकेत दे दिया है कि नफरत रोकने की आड़ में वह वैचारिक असहमति को पूरी तरह कुचलने की मंशा रखती है। 18-19 दिसंबर को विधानसभा और विधान परिषद की मुहर लगने के बाद अब राज्य में बोलने की आजादी पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं।
इस कानून के तहत पहली बार अपराध होने पर 1 से 7 साल तक की जेल और 50 हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान है। वहीं, दोबारा अपराध दोहराने पर कम से कम 2 साल से लेकर 7 साल तक की सजा दी जाएगी, जिसे पूरी तरह से गैर-जमानती बनाया गया है। हर्ष हेट स्पीच बिल के इन कठोर प्रावधानों ने लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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अस्पष्ट परिभाषाएं और “विचार पुलिस” का खौफ
इस बिल में “enmity, ill-will या disharmony” (शत्रुता, दुर्भावना या वैमनस्य) जैसी अत्यंत अस्पष्ट शब्दावलियों का प्रयोग किया गया है। वरिष्ठ पत्रकारों और कानूनी जानकारों का मानना है कि इन लचीली धारणाओं के कारण अब कोई भी सामान्य ट्वीट, व्यंग्यात्मक मीम या सरकार की आलोचना को अपराध की श्रेणी में डाला जा सकता है।
सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की यह राजनीतिक चाल लोकतंत्र पर सीधा वार मानी जा रही है। सवाल यह उठता है कि क्या अब कर्नाटक में सत्ता से सवाल पूछना राजद्रोह माना जाएगा? “भावनात्मक चोट” जैसे शब्दों का सहारा लेकर प्रशासन अब चुनिंदा तरीके से लोगों को निशाना बना सकता है।
हर्ष हेट स्पीच बिल से अभिव्यक्ति की आज़ादी पर असर
इस कानून की सबसे भयावह बात यह है कि यह पुलिस को ‘राजा’ बना देता है। अब पुलिस के पास बिना वारंट के किसी को भी गिरफ्तार करने और बिना कोर्ट के आदेश के कंटेंट ब्लॉक करने की असीमित शक्ति होगी। हिंदू उत्सवों पर की गई सामान्य टिप्पणियों या भाषाई गौरव की बातों को “शत्रुता” करार देकर जेल भेजा जा सकता है, जबकि आलोचकों का आरोप है कि इसमें जबरन धर्मांतरण जैसी गंभीर समस्याओं को छूट दी गई है।
हर्ष हेट स्पीच बिल के माध्यम से प्रशासन अब लोगों के निजी विचारों पर पहरा बिठाने की तैयारी में है, जिसे बीजेपी ने “हिटलरशाही” और “विचार पुलिस” की संज्ञा दी है।
सोशल मीडिया पर ‘इमरजेंसी 2.0’ का शोर
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इस बिल के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा देखा जा रहा है। आनंद रंगनाथन जैसे बुद्धिजीवियों से लेकर आम यूजर्स तक इसे “इमरजेंसी 2.0” कह रहे हैं। लोगों में इस बात का डर है कि एक साधारण रीट्वीट पर भी उन्हें 7 साल के लिए सलाखों के पीछे जाना पड़ सकता है।
यह कानून सीधे तौर पर सेल्फ-सेंसरशिप के दौर की शुरुआत है, जहां सच बोलना या अपनी आस्था व्यक्त करना भी खतरनाक हो जाएगा। कांग्रेस पर तुष्टीकरण के आरोप लग रहे हैं, क्योंकि धार्मिक ग्रंथों की आयतों को हेट स्पीच की श्रेणी में रखा जा सकता है, लेकिन इस पर सरकार ने रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है।
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संवैधानिक अधिकारों का हनन और सुप्रीम कोर्ट का रुख
बीजेपी नेताओं ने राज्यपाल से अपील की है कि वे इस बिल को राष्ट्रपति के पास भेजें, क्योंकि यह सीधे तौर पर संविधान के आर्टिकल 19(1)(a) का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने ‘श्रेया सिंघल जजमेंट’ में पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि अस्पष्ट धाराओं के आधार पर अभिव्यक्ति को नहीं दबाया जा सकता।
जब मौजूदा भारतीय न्याय संहिता (BNS) में पर्याप्त धाराएं मौजूद हैं, तो इस “राक्षसी कानून” की क्या आवश्यकता थी? जानकारों का कहना है कि यह केवल आरएसएस, बजरंग दल और अन्य राजनीतिक विरोधियों को चुप कराने का एक कानूनी हथियार है। हर्ष हेट स्पीच बिल वास्तव में युवाओं की आजादी को छीनने की एक गहरी साजिश नजर आती है।
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हर्ष हेट स्पीच बिल और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइ
इस कानून का एक और चिंताजनक पहलू ‘विकारी दायित्व’ (Vicarious Liability) है। इसके तहत किसी संगठन के एक कृत्य के लिए उसके हर सदस्य को तब तक दोषी माना जाएगा, जब तक वह अपनी बेगुनाही साबित न कर दे। यह न्याय शास्त्र के उस बुनियादी सिद्धांत का मजाक है जिसमें व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक दोष सिद्ध न हो जाए।
इससे पत्रकार, कार्टूनिस्ट और एक्टिविस्ट्स के मन में भय पैदा होगा। हालांकि कांग्रेस दावा कर रही है कि इससे पीड़ितों को मुआवजा मिलेगा, लेकिन जमीन पर इसका असल मकसद सत्ता की रक्षा और विरोध के सुरों को दबाना ही दिखाई देता है।
तटीय कर्नाटक का बहाना और राजनीतिक लक्ष्य
सरकार ने तटीय कर्नाटक में होने वाली अप्रिय घटनाओं का हवाला देकर इस बिल को पास किया है, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि असली लक्ष्य भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे ज्वलंत मुद्दों पर बोलने वालों को डराना है। क्या भारत का लोकतंत्र अब इतना कमजोर हो गया है कि एक राज्य खुलेआम तानाशाही ला रहा है?
जनता पूछ रही है कि बीजेपी और कांग्रेस में फिर क्या अंतर रहा, यदि दोनों का ही अंतिम लक्ष्य नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को खत्म करना है। कांग्रेस की यह “काली विरासत” आने वाले समय में देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को भारी नुकसान पहुँचा सकती है।
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गवर्नर की दहलीज पर न्याय की उम्मीद
अब पूरा मामला राज्यपाल थावरचंद गहलोत के पास है। उनके पास विकल्प है कि वे इस पर असेंट (सहमति) दें या इसे रोक दें। यदि यह बिल कानून बनता है, तो इसे हाई कोर्ट में चुनौती मिलना तय है। कर्नाटक के लोगों से आह्वान किया जा रहा है कि वे सोशल मीडिया और सड़कों पर इसका कड़ा विरोध करें।
हर्ष हेट स्पीच बिल एक चेतावनी है कि सत्ता में बैठे लोग अब सवालों से इतना डरते हैं कि नफरत रोकने के नाम पर खुद नफरत और दमन का सहारा ले रहे हैं। अगर आज आवाज नहीं उठाई गई, तो कल की खामोशियां बहुत महंगी पड़ेंगी।



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