हरियाणा बीजेपी अध्यक्ष विवाद: मोहन लाल बड़ौली और रॉकी मित्तल पर गहराया
हरियाणा की सियासत और न्यायपालिका के गलियारों में इस समय हरियाणा बीजेपी अध्यक्ष विवाद सबसे अधिक चर्चा का विषय बना हुआ है। बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मोहन लाल बड़ौली और हरियाणवी गायक रॉकी मित्तल (जय भगवान) के खिलाफ दर्ज सामूहिक बलात्कार का मामला अब एक लंबी और पेचीदा कानूनी लड़ाई का रूप ले चुका है।
दिसंबर 2024 में हिमाचल प्रदेश के कसौली पुलिस थाने में दिल्ली की एक महिला की शिकायत पर 13 दिसंबर को एफआईआर दर्ज की गई थी। पीड़िता का आरोप था कि जुलाई 2023 में कसौली के एक निजी होटल में इन दोनों प्रभावशाली व्यक्तियों ने उसे नशीली शराब पिलाकर न केवल उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया, बल्कि अश्लील वीडियो भी बनाए और उसे जान से मारने की धमकियां दीं।
नौकरी और एलबम में रोल का झांसा देकर शोषण का आरोप
पीड़िता ने अपनी शिकायत में बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि मोहन लाल बड़ौली ने उसे सरकारी नौकरी लगवाने का लालच दिया था, जबकि रॉकी मित्तल ने उसे अपने म्यूजिक एलबम में मुख्य भूमिका देने का झांसा दिया। महिला का दावा है कि इसी विश्वास का फायदा उठाकर उसे कसौली बुलाया गया और फिर इस घिनौनी वारदात को अंजाम दिया गया।
हालांकि, घटना के बाद से ही दोनों आरोपियों ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे एक सोची-समझी ‘राजनीतिक साजिश’ और पूरी तरह से फर्जी करार दिया है।
इसे भी पढ़े :–बीजेपी डबल वोटिंग: लोकतंत्र की खुली लूट, ECI पर बड़ा सवाल!
पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट और कसौली कोर्ट का प्रारंभिक फैसला
मामले की जांच के दौरान फरवरी 2025 में कसौली पुलिस ने कोर्ट में एक क्लोजर रिपोर्ट (कैंसिलेशन रिपोर्ट) दाखिल की। पुलिस का तर्क था कि आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं।
12 मार्च 2025 को कसौली कोर्ट ने इस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया, क्योंकि पीड़िता समन जारी होने के बावजूद कोर्ट में पेश नहीं हुई थी। इसके परिणामस्वरूप आरोपियों को शुरुआती तौर पर क्लीन चिट मिल गई। लेकिन यहीं से इस कानूनी लड़ाई ने एक नया मोड़ लिया।
सोलन सेशन कोर्ट का बड़ा फैसला: दोबारा खुल सकता है केस
पीड़िता ने हार न मानते हुए सोलन जिला एवं सत्र न्यायालय में रिविजन पिटीशन दाखिल की। उसने दलील दी कि रॉकी मित्तल द्वारा दर्ज कराए गए एक्सटॉर्शन केस के दबाव के कारण वह कसौली कोर्ट में पेश नहीं हो पाई थी। जुलाई 2025 में कोर्ट ने इस याचिका को मंजूर करते हुए कसौली कोर्ट के 12 मार्च के आदेश को ‘अवैध’ घोषित कर दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पीड़िता को अपना पक्ष रखने और क्लोजर रिपोर्ट पर आपत्ति दर्ज करने का उचित मौका नहीं दिया गया था। 30 जुलाई 2025 को पीड़िता को पुनः पेश होने का निर्देश दिया गया, जिससे केस के दोबारा खुलने की संभावनाएं प्रबल हो गई हैं।
एक्सटॉर्शन केस और काउंटर एफआईआर की उलझन
यह हरियाणा बीजेपी अध्यक्ष विवाद तब और अधिक उलझ गया जब रॉकी मित्तल ने सितंबर 2024 में पीड़िता और उसके साथियों पर 50 लाख रुपये की रंगदारी (एक्सटॉर्शन) मांगने का केस दर्ज करा दिया। इस शिकायत के आधार पर हरियाणा पुलिस ने कुछ गिरफ्तारियां भी कीं।
पीड़िता का कहना है कि यह काउंटर केस सिर्फ उस पर दबाव बनाने और मुख्य मामले से ध्यान भटकाने की कोशिश है। बचाव के लिए पीड़िता ने पंचकूला कोर्ट से अग्रिम जमानत ली और कानूनी लड़ाई जारी रखी।
इसे भी पढ़े :–हरियाणा न्याय व्यवस्था: दलित आईएएस विधवा अमनीत का दमन
हाईकोर्ट का हस्तक्षेप और गोपनीयता के निर्देश
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए हाईकोर्ट ने जुलाई 2025 में एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया। कोर्ट ने पीड़िता को न्यायिक कार्यवाही के बाहर किसी भी तरह का सार्वजनिक बयान देने या मीडिया बाइट देने से रोक दिया।
साथ ही, गोपनीयता बनाए रखने के लिए पीड़िता के नाम को ई-कोर्ट पोर्टल से हटाने का भी निर्देश दिया गया। इस आदेश के बाद मामले की मीडिया कवरेज में एक ठहराव आया, लेकिन कानूनी प्रक्रिया निरंतर जारी रही।
दिसंबर 2025 तक की वर्तमान स्थिति और राजनीतिक रंग
आज दिसंबर 2025 के अंत तक स्थिति यह है कि मामला पूरी तरह बंद नहीं हुआ है, लेकिन जांच अभी भी उसी मोड़ पर खड़ी है। न तो कोई नई चार्जशीट दाखिल हुई है और न ही औपचारिक ट्रायल शुरू हो सका है। सोशल मीडिया पर हरियाणा बीजेपी अध्यक्ष विवाद पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले चुका है।
बीजेपी के विरोधी इसे ‘सत्ता के दुरुपयोग’ का उदाहरण बता रहे हैं, वहीं समर्थकों का कहना है कि यह केवल एक ‘हनीट्रैप’ का मामला है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट में कोई बड़ी अपील लंबित नहीं दिख रही है।
इसे भी पढ़े :–राहुल गांधी बर्लिन संबोधन भाजपा पर संविधान खत्म करने का आरोप
न्याय की प्रतीक्षा और भारतीय न्याय व्यवस्था पर सवाल
यह पूरा प्रकरण भारतीय न्याय व्यवस्था की कई कमजोरियों को भी सतह पर लाता है—चाहे वह एफआईआर दर्ज करने में देरी हो, सबूतों का अभाव हो, या फिर रसूखदार लोगों के खिलाफ केस में होने वाली देरी। यद्यपि पीड़िता को सोलन कोर्ट से राहत मिली है कि क्लोजर रिपोर्ट पर दोबारा सुनवाई होगी, लेकिन न्याय की यह लंबी प्रक्रिया अक्सर उम्मीदों को कमजोर कर देती है।
अंततः, यह केस अब सिर्फ बलात्कार की एक शिकायत नहीं रह गया है, बल्कि पावर और पॉलिटिक्स के बीच एक बड़ी जंग बन चुका है। अब सबकी नजरें कसौली कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं कि क्या जांच दोबारा शुरू होगी या यह मामला हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।
हरियाणा बीजेपी अध्यक्ष विवाद ने समाज के सामने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या रसूख के दम पर इंसाफ की आवाज को दबाया जा सकता है?
इसे भी पढ़े :–दलित नेताओं की चुप्पी: कुर्सी के लिए बहुजनों से विश्वासघात



Post Comment