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हिन्दुत्व की राजनीति: अल्पसंख्यकों पर बढ़ते अत्याचार का सच।

हिन्दुत्व की राजनीति

हिन्दुत्व की राजनीति का दावा करने वाली भारत की ‘राष्ट्रवादी’ सरकारों के शासन में धार्मिक अल्पसंख्यकों और दलितों के खिलाफ हिंसा में भयावह वृद्धि हुई है। जनवरी से जुलाई 2025 के बीच अकेले ईसाई समुदाय पर 334 हमलों का आँकड़ा इन सरकारों के दावों की पोल खोलता है।

इवैंजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया (EFI) की रिपोर्ट के अनुसार, कुल हमलों में से 54% घटनाएँ केवल दो राज्यों—उत्तर प्रदेश में 95 और छत्तीसगढ़ में 86—में दर्ज हुईं। यह केवल संयोग नहीं, बल्कि बजरंग दल जैसे संगठनों द्वारा रची गई एक संगठित साजिश है, जिसमें प्रार्थना सभाओं पर हमले, झूठी गिरफ्तारियाँ और जेल में मारपीट जैसी घटनाएँ शामिल हैं।

यह राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि धार्मिक अल्पसंख्यकों को कुचलने की एक सुनियोजित साजिश है। कैथोलिक ननों को ‘धर्मांतरण’ के बहाने रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार करना और फिर जेल में उनके साथ मारपीट करना, धार्मिक स्वतंत्रता का घोर उल्लंघन है।

ओपन डोर्स की रिपोर्ट बताती है कि जनवरी से मई तक 950 से ज्यादा घटनाएँ हुईं, जिनमें महिलाओं, दलितों और आदिवासियों को निशाना बनाया गया। छत्तीसगढ़ में 13 मामलों में ईसाई परिवारों को दफनाने से इनकार किया गया, जिनमें से 12 घटनाएँ इसी राज्य में हुईं।

गुजरात में ईस्टर सेवा के दौरान सशस्त्र भीड़ ने हमला किया, वहीं बिहार के सरण में उपवास प्रार्थना सभा पर हिंसा की गई। यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (USCIRF) ने अप्रैल 2025 में भारत को ‘कंट्री ऑफ पार्टिकुलर कंसर्न’ (CPC) घोषित किया, क्योंकि भाजपा शासित 80% राज्यों में ‘एंटी-कन्वर्जन’ कानून अल्पसंख्यकों को कानूनी रूप से निशाना बनाते हैं।

यह हिंसा केवल शारीरिक नहीं, बल्कि सामाजिक बहिष्कार का रूप ले चुकी है, जहाँ ईसाई परिवारों को गाँवों से बेदखल किया जा रहा है।

सांप्रदायिक दंगे और राज्य-प्रायोजित ‘सामूहिक सजा’

सांप्रदायिक हिंसा के मामलों में भी चिंताजनक वृद्धि दर्ज की गई है। 2024 में सांप्रदायिक दंगों में 84% की वृद्धि हुई, जिसमें कुल 59 घटनाओं में 13 मौतें हुईं, जिनमें 10 मुस्लिम थे। सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म (CSSS) की रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र में 12, उत्तर प्रदेश और बिहार में 7-7 दंगे भड़के।

इनमें से ज्यादातर दंगे धार्मिक जुलूसों के बहाने किए गए। अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा पर चार दंगे और सरस्वती पूजा पर सात दंगे हुए। यह सब हिन्दुत्व की राजनीति द्वारा अल्पसंख्यकों को वोटबैंक के लिए निशाना बनाने का नाटक है।

ये दंगे भाजपा शासित 49 राज्यों में केंद्रित थे, जहाँ राज्य की मशीनरी हमलावरों को संरक्षण देती है और पीड़ितों के घरों पर बुलडोजर चलाती है। पश्चिमी क्षेत्र (महाराष्ट्र (12), गुजरात (5), मध्य प्रदेश (5), राजस्थान (3)) में 25 दंगे हुए, जो कुल का 42% हैं।

पूर्वी क्षेत्र में बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में 13 दंगे, और दक्षिण में कर्नाटक और तेलंगाना में सात दंगे हुए। दंगों का ट्रिगर बने 26 धार्मिक उत्सव या जुलूसों में मस्जिदों या दरगाहों पर हमले हुए, जहाँ हिंदुत्व समूहों ने अवैध निर्माण का आरोप लगाया।

मणिपुर में जारी जातीय-धार्मिक संघर्ष को छोड़कर, इन दंगों में राज्य सरकारें ‘सामूहिक सजा’ के रूप में मुस्लिम संपत्तियों को तोड़ रही हैं, जैसा कि 2024 में चार दंगों में हुआ।

दलितों पर अत्याचार: जातिवाद का जहर और कानूनी कमज़ोरी

एक ओर जहाँ धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर दलितों के खिलाफ जातिगत हिंसा भी बढ़ रही है। NCRB के आँकड़े 2024-25 में 60,000 से ज्यादा अत्याचार दर्ज करते हैं, जिनमें अकेले उत्तर प्रदेश में 13,000 मामले प्रकाश में आए।

ह्यूमन राइट्स वॉच की 2025 रिपोर्ट में जुलाई में एक 15 वर्षीय दलित लड़के को पेशाब पिलाने और अगस्त में मध्य प्रदेश में एक दलित महिला और उसके पोते को पीटने का जिक्र है। कर्नाटक में एक 21 वर्षीय दलित महिला को अंतरजातीय विवाह के लिए जहर देकर मार डाला गया, और गुजरात में एक युवक को इंस्टाग्राम प्रोफाइल के लिए पीटा गया।

यह जातिवाद का जहर है, जो संविधान को ताक पर रखकर बहुसंख्यक वर्चस्व को मजबूत करता है। ‘राष्ट्रवादी’ सरकारें SC/ST एक्ट को कमजोर करने की कोशिश करती हैं, जबकि उच्च जातियाँ हिंसा से दलितों की आर्थिक उन्नति को दबाती हैं। 2022 में SC के खिलाफ 51,656 मामले दर्ज हुए, जिनमें उत्तर प्रदेश (12,287), राजस्थान (8,651) और मध्य प्रदेश (7,732) शीर्ष पर थे।

दलित महिलाओं पर बलात्कार में 89.9% वृद्धि हुई (2014-2022), कुल 27,719 मामले सामने आए, और 45% बलात्कार वृद्धि (2015-2020 के बीच) जारी है, जहाँ रोज 10 मामले दर्ज होते हैं।

मई 2025 में मध्य प्रदेश के छत्रपुर में एक दलित किशोर को राशन मांगने पर गोली मार दी गई। जून 2025 में कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ में एक 60 वर्षीय विकलांग दलित महिला का बलात्कार हुआ। राजस्थान के करौली में एक दलित गैंगरेप सर्वाइवर को मजिस्ट्रेट ने निरीक्षण के बहाने कपड़े उतारने को कहा।

एटा के नवीन जिले में एक छह वर्षीय दलित बच्चे को स्कूल में शौचालय साफ करने पर मजबूर किया गया। यह सब हिन्दुत्व की राजनीति का ही दुष्परिणाम है।

मॉब लिंचिंग और कानूनी निष्क्रियता

मॉब लिंचिंग भी राज्य प्रायोजित लग रही है। 2024 में 13 घटनाओं में मौतें हुईं, जिनमें 9 मुस्लिम, 1 ईसाई और 1 हिंदू मारे गए। CSSS रिपोर्ट के अनुसार, सात घटनाएँ गौ-रक्षा के नाम पर हुईं, बाकी अंतरधार्मिक रिश्तों या मुस्लिम पहचान पर घटीं। 2025 में भी यह सिलसिला जारी है, अलीगढ़ और विजय नगर में मई में लिंचिंग के मामले प्रकाश में आए, जहाँ बिना सबूत के गोमांस के आरोप लगे। 2010-2017 में 63 गौ-हिंसा की घटनाओं में 28 मौतें हुईं, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम थे।

2024 में 13 लिंचिंग में सात गौ-रक्षा से जुड़ी थीं, जैसे हरियाणा में एक ट्रक ड्राइवर को गोमांस के शक में पीटा गया। मई 2025 में छत्तीसगढ़ के रायपुर में तीन लोगों को मवेशी तस्करी के शक में हिंदुत्व भीड़ ने लिंच किया।

दक्षिणपंथी नेता खुलेआम इनाम घोषित करते हैं, जैसे महाराष्ट्र में एक भाजपा विधायक ने ईसाई मिशनरी के लिए 11 लाख का इनाम रखा। EFIRLC की रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ के भिलाई में छह पादरियों को जेल में पीटने का जिक्र है, जहाँ हमलावरों पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी। पुलिस FIR दर्ज करने से इनकार करती है, और अदालतें सजा देने में नाकाम हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में Tehseen Poonawala केस में गाइडलाइंस दी थीं (नोडल ऑफिसर की नियुक्ति, तेज जाँच, विशेष अदालतें), लेकिन 2025 में भी अमल शून्य है। फरवरी 2025 में कोर्ट ने राष्ट्रीय स्तर पर मॉब लिंचिंग के लिए एक समान मुआवजा देने से इनकार किया। यूएन ह्यूमन राइट्स कमिटी ने जुलाई 2024 में अल्पसंख्यकों पर हिंसा पर चिंता जताई।

घुसपैठिये का ठप्पा और सामाजिक ताने-बाने का विनाश

हिन्दुत्व की राजनीति ‘घुसपैठिए’ कहकर अल्पसंख्यकों पर हिंसा को वैध ठहराती है। राजस्थान का 2025 एंटी-कन्वर्जन बिल, जो 10 साल की सजा और 50,000 जुर्माना लगाता है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है। गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक जैसे 12 राज्यों में ये कानून हैं, जहाँ ‘प्रलोभन’ की अस्पष्ट परिभाषा का दुरुपयोग हो रहा है। मध्य प्रदेश के मंडला में 11 मुस्लिम घरों को गोमांस के बहाने तोड़ा गया।

Pew रिसर्च के अनुसार, भारत का सोशल हॉस्टिलिटी इंडेक्स (SHI) 9.3 है, जो पाकिस्तान से भी ज्यादा है (2022 में)। 2024 में 947 हेट-क्राइम की घटनाएँ दर्ज हुईं, जिनमें 602 हिंसा और 345 हेट स्पीच शामिल थे जो ज्यादातर भाजपा से जुड़े लोगों द्वारा किए गए। 2025 में जनवरी-मार्च में 245 ईसाई हिंसा की घटनाएँ दर्ज हुईं।

ईसाई कब्रिस्तानों में दफनाने से इनकार (छत्तीसगढ़ में 92% मामले) सामने आए। यह सब बहुसंख्यक वर्चस्व का नंगा नाच है, जो भारत को विभाजन की ओर धकेल रहा है। नागरिक समाज और विपक्षी दलों को SC/ST एक्ट को मजबूत करने और हेट स्पीच के खिलाफ अभियान चलाने की आवश्यकता है, अन्यथा यह सांप्रदायिक और जातीय जहर पूरे भारतीय समाज को निगल जाएगा।

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