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भारत-पाक कैदी सूची: जेलों में बंद बेगुनाह मछुआरों की मानवीय त्रासदी

भारत-पाक कैदी सूची

भारत-पाक कैदी सूची जैसे ही दुनिया उत्साह और उम्मीद के साथ नए साल का इंतज़ार कर रही है, भारत और पाकिस्तान की जेलों में कुछ निर्दोष लोग फंसे हुए हैं। ये वे लोग हैं जो एक मामूली अपराध के लिए सालों से जेलों में सड़ रहे हैं—सिर्फ सीमा पार करना और गलती से दूसरे देश की सीमा में प्रवेश कर जाना।

हर साल, सैकड़ों मछुआरे और आम लोग अनजाने में सीमा लांघ जाते हैं, जिन्हें पकड़कर सलाखों के पीछे डाल दिया जाता है। कभी-कभी उन्हें रिहा होने में सालों लग जाते हैं, और जो कम भाग्यशाली होते हैं, वे कभी वापस नहीं आ पाते।

हालांकि वे कोई सुरक्षा खतरा नहीं हैं, लेकिन उनका भाग्य अक्सर भारत-पाकिस्तान की आपसी दुश्मनी और नौकरशाही की कागजी कार्रवाई के बीच फंसकर रह जाता है।

द्विपक्षीय समझौतों के तहत सूचियों का आदान-प्रदान

हर साल, भारत और पाकिस्तान 1 जनवरी को 2008 के कांसुलर एक्सेस समझौते के तहत भारत-पाक कैदी सूची का आदान-प्रदान करते हैं, जिसमें नागरिक कैदियों और मछुआरों का विवरण होता है। ये सूचियां एक ऐसी परेशान करने वाली मानवीय त्रासदी की गवाह हैं जिसे टाला जा सकता है।

आम मछुआरे अक्सर समुद्र में किसी स्पष्ट चिन्ह के अभाव में अदृश्य समुद्री सीमा पार कर जाते हैं। कई नागरिक ज़मीनी सीमाओं को पार कर जाते हैं और अपनी सज़ा पूरी होने के बहुत बाद तक विदेशी जेलों में बंद रहते हैं। यह प्रक्रिया दर्शाती है कि कूटनीतिक औपचारिकताएं तो पूरी हो रही हैं, लेकिन धरातल पर मानवीय संकट बरकरार है।

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नवीनतम आंकड़ों में कैद बेगुनाहों का दर्द

नवीनतम आंकड़ों का आदान-प्रदान इस समस्या की गंभीरता को साफ तौर पर उजागर करता है। पाकिस्तान ने अपनी हिरासत में 199 भारतीय मछुआरों और 58 भारतीय नागरिक कैदियों की मौजूदगी स्वीकार की है। वहीं, भारत के पास वर्तमान में 33 पाकिस्तानी मछुआरे और 391 नागरिक कैदी बंद हैं।

इस भारत-पाक कैदी सूची का सबसे दुखद पहलू यह है कि पाकिस्तान में 167 भारतीय मछुआरों और नागरिक कैदियों ने अपनी निर्धारित सज़ा पहले ही पूरी कर ली है, फिर भी वे केवल स्वदेश वापसी की कागजी प्रक्रिया पूरी होने का इंतज़ार कर रहे हैं। वे कोई कट्टर अपराधी नहीं हैं; उनमें से अधिकांश गरीब मछुआरे हैं जिनकी आजीविका अनिश्चित समुद्र पर टिकी है।

समुद्री सीमा की चुनौतियां और तकनीकी अभाव

गुजरात और सिंध के तटों पर मछली पकड़ने वाले समुदायों के लिए समुद्री सीमा नक्शे पर खींची गई एक अदृश्य रेखा मात्र है। इन मछुआरों की नावें छोटी होती हैं और इनके पास महंगे GPS डिवाइस नहीं होते। खराब नेविगेशन उपकरण, इंजन की खराबी, समुद्र की तेज़ धाराएं या मौसम में अचानक बदलाव इन्हें विदेशी पानी में धकेल देते हैं।

इसके बाद शुरू होता है गिरफ्तारी, अदालती मुकदमा और जेल की भयानक परिस्थितियों का अंतहीन सिलसिला। हालांकि दोनों सरकारें जेलों में मानवीय व्यवहार का दावा करती हैं, लेकिन सज़ा पूरी होने के बावजूद उन्हें वर्षों तक रोके रखना तंत्र की गंभीर खामियों को दर्शाता है।

कांसुलर एक्सेस और राष्ट्रीयता सत्यापन में देरी

राष्ट्रीयता का सत्यापन करने में होने वाली देरी और समय पर कांसुलर एक्सेस न मिलना इन कैदियों के दुख को और अधिक बढ़ा देता है। हालांकि भारत-पाक कैदी सूची का आदान-प्रदान करना एक विश्वास बहाली का कदम है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। एक मानवीय दृष्टिकोण की सख्त आवश्यकता है।

जो मछुआरे अनजाने में सीमा पार करते हैं, उन्हें अपराधी के बजाय सामान्य व्यक्ति माना जाना चाहिए और पहचान पक्की होते ही तत्काल रिहा किया जाना चाहिए। साथ ही, सरकारों को मछुआरों को सस्ते और विश्वसनीय GPS व चेतावनी सिस्टम उपलब्ध कराने चाहिए ताकि ऐसी घटनाओं को कम किया जा सके।

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परमाणु प्रतिष्ठानों की सुरक्षा पर ऐतिहासिक समझौता

संबंधों में जारी भारी तनाव के बावजूद, भारत और पाकिस्तान ने अपने परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची का भी आदान-प्रदान किया। विदेश मंत्रालय (MEA) के अनुसार, यह आदान-प्रदान परमाणु प्रतिष्ठानों और सुविधाओं पर हमले के निषेध से संबंधित 1988 के समझौते के तहत किया गया।

यह प्रक्रिया नई दिल्ली और इस्लामाबाद में राजनयिक चैनलों के माध्यम से एक साथ पूरी की गई। तीन दशक पुरानी इस प्रथा के तहत, दोनों पक्ष एक-दूसरे को अपनी परमाणु संपत्तियों की जानकारी देते हैं ताकि युद्ध जैसी स्थिति में भी इन पर हमला न किया जाए। इस बार यह आदान-प्रदान तब हुआ जब पिछले मई में चार दिनों की सैन्य शत्रुता के कारण संबंध पहले से ही तनावपूर्ण हैं।

राजनयिक चैनलों के माध्यम से पारदर्शिता का प्रयास

विदेश मंत्रालय (MEA) ने स्पष्ट किया कि 31 दिसंबर, 1988 को हस्ताक्षरित और 27 जनवरी, 1991 को लागू हुए इस समझौते के तहत यह 35वां लगातार आदान-प्रदान था। पहला आदान-प्रदान 1 जनवरी, 1992 को हुआ था।

हाल ही में जम्मू और कश्मीर के पहलगाम (बैसरन) में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े आतंकवादियों द्वारा पर्यटकों सहित 26 लोगों की हत्या के बावजूद, दोनों देशों ने अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का पालन किया है। भारत-पाक कैदी सूची के साथ-साथ इन सूचियों का आदान-प्रदान यह सुनिश्चित करता है कि तनाव के बीच भी बातचीत और पारदर्शिता के कुछ द्वार खुले रहें।

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मानवीय आधार पर रिहाई और भारत की मांग

भारत ने पाकिस्तान से उन 167 भारतीय मछुआरों और नागरिक कैदियों की तत्काल रिहाई की मांग की है जिन्होंने अपनी सज़ा काट ली है। साथ ही, 35 अन्य नागरिकों के लिए तुरंत कांसुलर एक्सेस मांगा गया है जो फिलहाल बिना किसी पहुंच के पाकिस्तान की हिरासत में हैं।

भारत सरकार ने पाकिस्तान द्वारा हिरासत में लिए गए लापता भारतीय रक्षा कर्मियों की वापसी का भी मुद्दा उठाया है। 2014 से अब तक भारत 2,661 मछुआरों और 71 नागरिकों को वापस लाने में सफल रहा है। अंततः, सीमाएं देशों को परिभाषित कर सकती हैं, लेकिन इन मछुआरों और निर्दोष नागरिकों के प्रति दिखाई गई दयालुता ही हमारी इंसानियत को परिभाषित करेगी।

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