भारत-यूएस ट्रेड डील विवाद: क्या एक मिस्ड कॉल ने बिगाड़ा खेल?
अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक द्वारा एक पॉडकास्ट में दिए गए बयान ने भारत-यूएस ट्रेड डील विवाद को लेकर एक नई राजनीतिक चर्चा शुरू कर दी है।
यह विवाद मोदी सरकार की सबसे बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक चूक का स्पष्ट प्रमाण माना जा रहा है, जहां एक बेहद फायदेमंद भारत-अमेरिका व्यापार समझौता हाथों में था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा डोनाल्ड ट्रंप को वो निर्णायक फोन कॉल न करने से सब कुछ बिगड़ गया।
लुटनिक के इस खुलासे ने भारतीय कूटनीति की टाइमिंग और निर्णय लेने की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसका असर अब सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था और निर्यातकों पर पड़ता दिख रहा है।
लुटनिक का सनसनीखेज खुलासा: ‘ऑल सेट’ थी डील
अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने 9 जनवरी 2026 को मशहूर ‘All-In’ पॉडकास्ट में चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने बताया कि जून-जुलाई 2025 में डील पूरी तरह “ऑल सेट अप” थी। तकनीकी शर्तें, बाजार पहुंच और टैरिफ में छूट जैसे सभी जटिल मुद्दे सुलझा लिए गए थे।
लुटनिक के अनुसार, बस ट्रंप को मोदी से एक ‘पर्सनल क्लोजर कॉल’ चाहिए था। यह वैसा ही था जैसा ब्रिटिश पीएम कीर स्टार्मर ने किया और यूके को जून 2025 में सबसे बेहतर डील मिल गई। लुटनिक ने बताया कि ट्रंप की व्यापार नीति एक “स्टेयरकेस” यानी सीढ़ी की तरह काम करती है: जो देश पहले आता है, उसे सबसे कम टैरिफ और सबसे ज्यादा छूट मिलती है।
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‘तीन शुक्रवार’ की समयसीमा और चूक का गणित
इस पूरे भारत-यूएस ट्रेड डील विवाद में समय की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही। लुटनिक ने बताया कि भारत को यूके के बाद दूसरा नंबर दिया गया था, लेकिन “असहज” महसूस करने के कारण मोदी ने वो कॉल नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि “तीन शुक्रवार” की वह महत्वपूर्ण समयसीमा निकल गई जिसे ट्रंप प्रशासन ने तय किया था।
भारत की इस हिचकिचाहट का फायदा इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम जैसे देशों ने उठाया और जुलाई 2025 में फटाफट डील फाइनल कर ली। जब तक भारत वापस टेबल पर आया, तब तक लुटनिक के शब्दों में “ट्रेन स्टेशन छोड़ चुकी थी” और पुरानी शर्तें अब उपलब्ध नहीं थीं।
50% टैरिफ की भारी कीमत चुका रहा है भारत
इस एक मिस्ड कॉल की कीमत अब भारत को बहुत भारी पड़ रही है। अगस्त 2025 में ट्रंप ने भारतीय आयात पर कुल 50% टैरिफ लगा दिया। इसमें 25% ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ और 25% रूसी तेल खरीद के लिए ‘पेनल्टी’ शामिल है। यह किसी भी बड़े ट्रेडिंग पार्टनर पर लगाया गया अब तक का सबसे ऊंचा शुल्क है।
टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वेलरी, फार्मा और स्टील जैसे प्रमुख सेक्टरों में निर्यातकों की लागत रातों-रात दोगुनी हो गई है। अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धा लगभग खत्म हो गई है और 2025-26 के वित्तीय वर्ष में भारत के यूएस एक्सपोर्ट में अरबों डॉलर के नुकसान का अनुमान है।
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रणनीतिक अवसर का नुकसान और कूटनीतिक विफलता
हॉवर्ड लुटनिक ने स्पष्ट किया कि वे खुद “हायर रेट” पर नेगोशिएट कर चुके थे, लेकिन समय निकलने के बाद डील वापस ले ली गई। यह सिर्फ टैरिफ का मामला नहीं है, बल्कि एक बड़े रणनीतिक अवसर का नुकसान है।
इस समझौते के जरिए भारत रूसी तेल पर लगने वाले दबाव को कम कर सकता था, कृषि और डेयरी क्षेत्र में कम छूट देकर अपना बाजार बचा सकता था और अमेरिकी बाजार में एक मजबूत स्थायी फुटहोल्ड बना सकता था। लेकिन इस भारत-यूएस ट्रेड डील विवाद ने दिखाया कि कैसे व्यक्तिगत कूटनीति की कमी ने एक तैयार मौके को हाथ से जाने दिया।
सरकार का बचाव और विदेश मंत्रालय की सफाई
मोदी सरकार की ओर से इस मामले में लगातार बचाव किया जा रहा है। विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने बयान दिया कि 2025 में मोदी और ट्रंप के बीच कुल 8 बार फोन पर बातचीत हुई। हालांकि, लुटनिक ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि वे बातचीत सामान्य पार्टनरशिप पर केंद्रित थीं, न कि ‘ट्रेड क्लोजर’ वाले उस स्पेसिफिक कॉल पर जिसकी ट्रंप को उम्मीद थी।
विदेश मंत्रालय का यह कहना कि “कैरेक्टराइजेशन सही नहीं है” और डील सिर्फ फोन पर नहीं टिकती, तकनीकी रूप से सही हो सकता है, लेकिन हकीकत यह है कि ट्रंप की ‘पर्सनल-ईगो बेस्ड’ डिप्लोमेसी में लीडर-टू-लीडर कॉल अक्सर सबसे निर्णायक साबित होता है।
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विपक्ष का प्रहार: राष्ट्रीय हित या व्यक्तिगत अहंकार?
विपक्ष ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है और सीधे पीएमओ पर जिम्मेदारी डाली है। सवाल उठाया जा रहा है कि जब “हाउडी मोदी” जैसे मेगा इवेंट्स और फोटो-ऑप्स के लिए समय निकलता है, तो राष्ट्रीय हित में एक स्ट्रैटेजिक कॉल करने में क्या हर्ज था?
यह फैसला भारत की विदेश नीति की उस कमजोरी को उजागर करता है जहां हम “स्वतंत्रता” के नाम पर खुद को आर्थिक रूप से आइसोलेट कर रहे हैं। इस भारत-यूएस ट्रेड डील विवाद ने यह बहस छेड़ दी है कि क्या कूटनीति में “असहजता” या “अहंकार” के लिए कोई जगह होनी चाहिए, खासकर जब देश की अर्थव्यवस्था दांव पर हो।
आर्थिक परिणाम और भविष्य की अनिश्चितता
अगर यह वास्तव में भारत का कोई “रणनीतिक रुख” था, तो वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था इसका कड़वा परिणाम भुगत रही है। शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव, निर्यातकों की बढ़ती मुश्किलें और विदेशी निवेशकों के कम होते भरोसे ने सरकार की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ब्रिटेन ने स्टार्मर के एक कॉल से बाजी मार ली, जबकि भारत ने मौका गंवा दिया।
अब 500% तक के ‘सेकेंडरी टैरिफ’ की धमकी (रूस सैंक्शंस बिल के तहत) और अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बीच भारत पर दबाव और बढ़ गया है।
यह पूरी घटना एक कड़वा सबक है कि ट्रंप-युग की कूटनीति में ईगो, टाइमिंग और पर्सनल टच सब कुछ तय करते हैं। मोदी सरकार ने “आंखों में आंखें डालकर” बात करने का दावा तो किया, लेकिन एक छोटे से कॉल की कमी से बड़े आर्थिक फायदे हाथ से फिसल गए।
अब आने वाले महीनों में अगर टैरिफ और बढ़े या नई पाबंदियां लगीं, तो इसे भारतीय इतिहास की सबसे महंगी कूटनीतिक गलती के रूप में याद किया जाएगा, जिसकी सजा आज पूरा देश भुगत रहा है।
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