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अंधभक्ति और वैचारिक गुलामी: कॉर्पोरेट लूट का कड़वा सच

अंधभक्ति और वैचारिक गुलामी

अंधभक्ति और वैचारिक गुलामी के साये में पनपता क्रोनी कैपिटलिज्म का यह दौर अब ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच चुका है, जहां चुनिंदा कॉर्पोरेट घराने सरकारी नीतियों की ढाल बनाकर लगातार फल-फूल रहे हैं। भारत के वर्तमान आर्थिक परिदृश्य में अडानी और अंबानी जैसे घराने केवल व्यवसायी नहीं रह गए हैं, बल्कि वे सरकारी नीतियों, भूमि आवंटन, बंदरगाहों, एयरपोर्ट्स, कोयला खदानों और बिजली परियोजनाओं के भाग्य विधाता बन चुके हैं।

यह महज व्यापारिक विस्तार नहीं है, बल्कि सत्ता और पूंजी की एक ऐसी गहरी सांठगांठ है, जहां सार्वजनिक संपदा को व्यवस्थित तरीके से निजी हाथों में सौंपा जा रहा है।

2025 में ही बिहार के पिरपैंती (भागलपुर) में अडानी पावर को 2,400 MW की अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट के लिए लगभग 1,050 एकड़ भूमि मात्र ₹1 प्रति वर्ष की दर पर 33 साल के लिए लीज पर दी गई। विपक्ष ने इसे “उपहार” कहा, तो सरकार ने इसे निवेश प्रोत्साहन पैकेज बताया, लेकिन हकीकत यह है कि जनता के संसाधनों पर कॉरपोरेट्स का कब्जा अब एक सामान्य नियम बन चुका है।

सत्ता और पूंजी की गहरी सांठगांठ और रियायतों का खेल

यह कोई संयोग नहीं है कि देश के महत्वपूर्ण संसाधन कुछ ही अरबपतियों की झोली में जा रहे हैं। आंध्र प्रदेश में 480 एकड़ जमीन अडानी इंफ्रा को Google AI डेटा सेंटर के लिए हस्तांतरित की गई। वहीं, असम और महाराष्ट्र के धारावी स्लम प्रोजेक्ट में नमक पैन (Salt Pan) भूमि सहित कई राज्यों में अडानी को बड़े पैमाने पर प्रोजेक्ट्स मिले हैं।

यह सिलसिला केवल भूमि तक सीमित नहीं है, बल्कि एयरपोर्ट्स, रेलवे, कोयला ब्लॉक और गैस सेक्टर पर भी इनका कब्जा लगातार बढ़ता जा रहा है। जब देश की आधारभूत संरचना को कुछ चुनिंदा घरानों के हवाले कर दिया जाता है, तो वह लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी होती है। यह सत्ता का वह स्वरूप है जहाँ नीतियां जनता की भलाई के लिए नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट मुनाफे को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं।

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राष्ट्रवाद और धर्म का चश्मा: लूट को ढंकने का हथियार

अंधभक्ति और वैचारिक गुलामी का सबसे खतरनाक हथियार धर्म और राष्ट्रवाद का इस्तेमाल है। जब जनता मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुस्लिम विभाजन और राष्ट्रभक्ति बनाम देशद्रोह की भावनात्मक बहसों में उलझी रहती है, तब पीछे के दरवाजे से सार्वजनिक संपदा की लूट को अंजाम दिया जाता है।

सरकार इस भावनात्मक “नशे” को लगातार बढ़ावा देती है। राम मंदिर उत्सवों पर अरबों का खर्च और धार्मिक आयोजनों को राष्ट्रीय महत्व देना इसी रणनीति का हिस्सा है। जब विपक्ष सवाल उठाता है, तो उसे तुरंत राष्ट्र-विरोधी करार दे दिया जाता है। नतीजा यह है कि आम जनता महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रही है, लेकिन भावनात्मक उन्माद के कारण वे अपनी ही संपदा की इस लूट को “विकास” मान बैठते हैं।

धार्मिक संस्थाएं और बाबावाद: धर्म-व्यापार का घिनौना मेल

इस व्यवस्था को मजबूत बनाने में धार्मिक संस्थाओं और बाबाओं की भूमिका भी संदिग्ध रही है। भारतीय धार्मिक ट्रस्टों और मंदिरों के पास अनुमानित 20 लाख एकड़ भूमि है, जो उन्हें देश के सबसे बड़े भूमि मालिकों में से एक बनाती है। इन संपत्तियों को अक्सर कर छूट और सरकारी संरक्षण प्राप्त होता है, जो अंततः व्यावसायिक हितों में बदल जाता है।

बाबा रामदेव जैसे व्यक्तियों के पास आज अरबों की संपदा और हजारों एकड़ जमीन है, जहां धर्म की आड़ में पतंजलि जैसे विशाल कारोबारी साम्राज्य खड़े किए गए हैं।

सरकार इन संस्थाओं को इसलिए संरक्षण देती है क्योंकि ये वोट बैंक बनाने और जनता को भावनात्मक रूप से नियंत्रित करने का साधन हैं। एक तरफ किसानों की जमीनें छिन रही हैं, वहीं दूसरी ओर बाबाओं के आश्रमों और व्यापारिक अड्डों पर कोई सवाल नहीं उठता।

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आर्थिक असमानता के डरावने आंकड़े और ब्रिटिश राज की याद

भारत में आर्थिक असमानता अब चीख-चीखकर सच बयां कर रही है। World Inequality Lab की 2026 की रिपोर्ट और 2024-25 के अपडेटेड डेटा के अनुसार, भारत के शीर्ष 1% अमीर देश की 40% से अधिक संपदा पर कब्जा जमाए हुए हैं। यह स्तर ब्रिटिश राज के दौर से भी बदतर स्थिति की ओर इशारा करता है।

देश के शीर्ष 10% लोगों के पास 65% संपदा और 58% राष्ट्रीय आय है, जबकि निचले 50% तबके के पास मात्र 15% आय बची है। 2000-2023 के बीच शीर्ष 1% की संपदा में 62% की विस्फोटक वृद्धि हुई है।

मोदी काल में अरबपतियों की संख्या तो बढ़ी, लेकिन मध्यम और निम्न वर्ग की आय स्थिर रही। कर कटौती और सब्सिडी जैसी नीतियां उन्हीं के लिए हैं जो सत्ता के करीब हैं, बाकी जनता को व्यवस्थित रूप से हाशिए पर धकेला जा रहा है।

संस्थागत पतन और मीडिया की भूमिका

इस पूरे खेल में नौकरशाह, राजनेता और देश की संवैधानिक संस्थाएं सक्रिय सहभागी बनकर उभरी हैं। जांच एजेंसियों का उपयोग आज केवल विपक्ष और आलोचकों का मुंह बंद करने के लिए किया जाता है। नियमों को इस तरह तोड़ा-मरोड़ा जाता है कि चुनिंदा कंपनियों को अधिकतम लाभ मिल सके।

चुनावी फंडिंग के जरिए सत्ता और पूंजी का यह चक्र निर्बाध रूप से चलता रहता है। इस व्यवस्था में अंधभक्ति और वैचारिक गुलामी को बढ़ावा देने में मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भी शामिल है, जो दिन-रात इस कॉर्पोरेट लूट को ‘राष्ट्रवाद’ का कवर पहनाकर पेश करता है। जब सवाल उठाने वालों पर ‘देशद्रोही’ का ठप्पा लग जाए, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था अब आम आदमी के हक में नहीं रही।

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ऑलिगार्की की ओर बढ़ता भारत: एक भविष्य की चेतावनी

यदि इसी तरह का भावनात्मक नशा और अंधभक्ति और वैचारिक गुलामी का दौर जारी रहा, तो भारत जल्द ही एक ‘ऑलिगार्की’ में तब्दील हो जाएगा। यहाँ जल, जंगल, जमीन, खनिज और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर मुट्ठी भर कॉर्पोरेट्स, धार्मिक गुरुओं और उनके राजनीतिक संरक्षकों का पूर्ण एकाधिकार होगा।

आने वाले समय में जनता के पास मेहनत-मजदूरी करने और भारी कर चुकाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। यह अंधभक्ति का वह रूप है जो राष्ट्र को गुलामी की ओर धकेल रहा है। होश तब आएगा जब नागरिक स्वतंत्रता और देश का स्वाभिमान पूरी तरह से गिरवी रखा जा चुका होगा।

समय का तकाजा और जनता की जिम्मेदारी

अतः, यह समय केवल मूकदर्शक बने रहने का नहीं है। राष्ट्रभक्ति और धार्मिकता के नाम पर जो “उपहार” जनता को दिया जा रहा है, वह असल में देश की आजादी और समानता की बलि है। इतिहास गवाह है कि जब-जब जनता ने सवाल पूछना बंद किया है, तब-तब सत्ताएं निरंकुश हुई हैं।

इस नशे को उतारने और व्यवस्था को चुनौती देने की जिम्मेदारी अब सीधे तौर पर भारत की जनता पर है। अगर आज हम इस क्रोनी कैपिटलिज्म और सत्ता के गठजोड़ के खिलाफ नहीं बोले, तो आने वाली पीढ़ियां और इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। समय बहुत कम बचा है, फैसला आपको करना है।

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