LGBTQIA अधिकारों पर भारत का निर्णायक मोड़
आज UNHRC में LGBTQIA अधिकारों पर महत्वपूर्ण मतदान
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद का 59वाँ सत्र एक महत्वपूर्ण निर्णय की ओर बढ़ रहा है। 7 जुलाई 2025 को सदस्य देश यौन अभिविन्यास और लैंगिक पहचान पर स्वतंत्र विशेषज्ञ के अधिदेश के नवीनीकरण पर मतदान करेंगे। यह तंत्र LGBTQIA व्यक्तियों के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए महत्वपूर्ण है। भारत के लिए यह नैतिक और राजनयिक परीक्षा का क्षण है।
भारत का ऐतिहासिक रुख: निरंतर चुप्पी
भारत 2016 से लगातार तीसरी बार मानवाधिकार परिषद का सदस्य है। परंतु LGBTQIA अधिकारों से संबंधित प्रत्येक प्रस्ताव पर उसने मतदान से परहेज किया है। 2016 में प्रथम अधिदेश प्रस्ताव के समय भारत अनुपस्थित रहा। 2019 और 2022 के नवीनीकरण वोट में भी उसने कोई स्थान नहीं लिया। विदेश मंत्रालय का तर्क था कि धारा 377 का मामला न्यायालय में लंबित है। अतः कोई सार्वजनिक रुख बनाना उचित नहीं होगा।
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वैश्विक एकजुटता: बढ़ता समर्थन
इस वर्ष का प्रस्ताव लैटिन अमेरिकी देशों के समूह द्वारा पेश किया गया है। ब्राज़ील, मेक्सिको और कोलंबिया प्रमुख प्रायोजक हैं। नवीनतम आँकड़े दर्शाते हैं कि 67 देशों ने प्रस्ताव का सह-प्रायोजन किया है। यूरोपीय संघ के 27 देशों के अतिरिक्त यूनाइटेड किंगडम, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। अफ्रीका से दक्षिण अफ्रीका, केप वर्डे और रवांडा ने समर्थन दिया है। एशियाई देशों में जापान, नेपाल, दक्षिण कोरिया और मंगोलिया ने भी सहयोग किया है। यह वैश्विक एकजुटता का स्पष्ट संकेत है।
न्यायिक क्रांति: भारत का आंतरिक परिवर्तन
2018 में सर्वोच्च न्यायालय का नवतेज सिंह जोहर फैसला ऐतिहासिक मोड़ था। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने घोषित किया कि LGBTQIA व्यक्ति संविधान के समान नागरिक हैं। इसने धारा 377 को समाप्त कर दिया। 2023 के एक अन्य निर्णय में अदालत ने ट्रांसजेंडर अधिकारों को मजबूती दी। समान-लिंग जोड़ों को गोद लेने के अधिकार को मान्यता प्रदान की। परंतु यह कानूनी प्रगति विदेश नीति में परिलक्षित नहीं हुई। 2019 और 2022 में भारत ने फिर मौन रहना चुना।
विशेषज्ञ की भूमिका: वैश्विक प्रभाव
संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र विशेषज्ञ का पद 2016 में स्थापित हुआ। इसका उद्देश्य LGBTQIA व्यक्तियों के खिलाफ भेदभाव की निगरानी करना है। अब तक तीन विशेषज्ञों ने इस भूमिका को संभाला है। उन्होंने 11 देशों का आधिकारिक दौरा किया। इसमें अर्जेंटीना, जॉर्जिया और मोज़ाम्बिक जैसे विविध राष्ट्र शामिल हैं। विशेषज्ञ ने 17 विस्तृत रिपोर्टें प्रकाशित कीं। इनमें सहमति से समलैंगिक संबंधों का अपराधीकरण और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए कानूनी लिंग मान्यता जैसे मुद्दे शामिल हैं। विशेषज्ञ ने 171 देशों को 1,600 से अधिक औपचारिक पत्र भेजे। ये पत्र मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतों पर आधारित थे।
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भारत की राजनयिक चुनौतियाँ
सूत्रों के अनुसार भारत सरकार अभी तक अपना रुख स्पष्ट नहीं कर पाई है। कई कारक दबाव बना रहे हैं। सामरिक संबंधों के मद्देनजर अमेरिका और यूरोपीय संघ ने LGBTQIA अधिकारों को अपनी विदेश नीति का केंद्र बनाया है। आर्थिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। 2023 के एक अध्ययन के अनुसार भेदभावपूर्ण नीतियाँ देश की जीडीपी को 1% तक नुकसान पहुँचाती हैं। संयुक्त राष्ट्र की सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा में भारत से इस मुद्दे पर 12 सिफारिशें प्राप्त हुई हैं।
नवीनीकरण का व्यावहारिक महत्व
यदि अधिदेश नवीनीकृत होता है तो अगले तीन वर्षों में महत्वपूर्ण लक्ष्य रखे जाएँगे। आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली हिंसा की शिकार LGBTQIA व्यक्तियों को त्वरित सहायता प्रदान करेगी। स्वास्थ्य अधिकारों के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएँ सुनिश्चित की जाएँगी। डेटा संग्रह पहल 50 से अधिक देशों में भेदभाव के पैटर्न का दस्तावेजीकरण करेगी। विशेषज्ञ की रिपोर्टें अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों में सबूत के रूप में प्रयोग होती हैं। 2024 में फिजी के एक मामले में इन रिपोर्टों ने निर्णायक भूमिका निभाई।
एशिया में बदलती राजनीतिक धाराएँ
भारत के पड़ोसी देशों ने उल्लेखनीय प्रगति की है। नेपाल ने 2007 में समलैंगिक अधिकारों को संवैधानिक मान्यता दी। थाईलैंड ने 2024 में समान-विवाह विधेयक पारित किया। भूटान ने 2021 में समलैंगिक संबंधों को वैध बनाया। चीन और सऊदी अरब जैसे देश अब भी विरोध करते हैं। परंतु एशिया में 60% देशों ने पिछले मतदान में समर्थन दिया था। यह प्रवृत्ति भारतhttps://www.xn--i1bj3fqcyde.xn--11b7cb3a6a.xn--h2brj9c/ के लिए प्रेरणादायक हो सकती है।
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भारत के समक्ष रणनीतिक अवसर
भारत के पास नैतिक नेतृत्व प्रदर्शित करने का स्वर्णिम अवसर है। G20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने “वसुधैव कुटुम्बकम” का नारा दिया। इस मतदान में उसे इस दर्शन को सिद्ध करना चाहिए। जनसांख्यिकीय लाभ भी महत्वपूर्ण है। 65% भारतीय जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। युवा वर्ग LGBTQIA अधिकारों के प्रति अधिक खुला है। आर्थिक पहलू भी ध्यान देने योग्य है। विश्व बैंक के अनुसार समावेशी नीतियाँ नवाचार को 30% तक बढ़ाती हैं। भारत अपने स्टार्ट-अप इकोसिस्टम को इससे लाभान्वित कर सकता है।
निष्कर्ष: इतिहास का आह्वान
आज 7 जुलाई का मतदान भारत की वैश्विक नैतिक स्थिति को परिभाषित करेगा। पिछले अनुभव निराशाजनक रहे हैं। परंतु न्यायिक प्रगति और वैश्विक रुझान परिवर्तन की संभावना दर्शाते हैं। भारत को चुप्पी की परंपरा तोड़नी चाहिए। बहुमत के साथ खड़े होकर वह मानवाधिकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता सिद्ध कर सकता है। यह निर्णय न केवल भारत बल्कि वैश्विक LGBTQIA समुदाय के भविष्य को प्रभावित करेगा। इतिहास उन्हें याद रखता है जो सही के पक्ष में खड़े होते हैं।



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