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“जहरीली हवा सांसों का सौदा “क्या मोदी सरकार के विकास का यही सच है?

जहरीली हवा सांसों सौदा

जहरीली हवा सांसों का सौदा भारत में पिछले दस वर्षों का शासन काल, जिसे ‘अमृत काल’ कहा गया, आज इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी विफलता के कारण सवालों के घेरे में है। देश के विभिन्न हिस्सों से आती पुल गिरने और सड़कें बहने की खबरें अब केवल दुर्घटनाएं नहीं, बल्कि सिस्टेमिक लापरवाही का प्रमाण बन चुकी हैं।

निर्माण गुणवत्ता में इस कदर गिरावट आई है कि 2021 से 2025 के बीच ही 170 से अधिक ब्रिजेस के ढहने की घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 200 से ज्यादा मासूम जानें गईं। अकेले NHAI के प्रोजेक्ट्स में पिछले पांच वर्षों में 55 स्ट्रक्चरल फेलियर रिपोर्ट हुए हैं, जो आधुनिक भारत के निर्माण पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

गुजरात मॉडल और गभीरा ब्रिज का सच

विकास के जिस “गुजरात मॉडल” का सबसे ज्यादा प्रचार किया जाता है, वहां की जमीनी हकीकत डरावनी है। पिछले कुछ वर्षों में गुजरात में 25 से अधिक प्रमुख ब्रिज कोलैप्स हुए। जुलाई 2025 में वडोदरा के पास गंभीरा ब्रिज गिरने से हुई 18 मौतों ने पूरे देश को झकझोर दिया।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लोग इसे सीधे तौर पर “क्रॉनी कैपिटलिज्म” का नतीजा बता रहे हैं। जनता का आरोप है कि ठेकेदारों को बार-बार काम मिलता है, भले ही उनके पुराने प्रोजेक्ट्स फेल रहे हों। सिल्क्यारा टनल कोलैप्स के बावजूद नवयुग इंजीनियरिंग को करोड़ों का फायदा पहुँचाना इसी सांठगांठ की ओर इशारा करता है।

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जहरीली हवा: सांसों का सौदा और पलूशन का घातक तांडव

प्रदूषण का संकट आज मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलताओं में गिना जा रहा है। दिल्ली-NCR में AQI का 500 पार करना अब एक सामान्य वार्षिक घटना बन गई है। 2025-26 की सर्दियों के दौरान ही 10 दिन “Severe” (AQI >401) श्रेणी में रहे।

स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल 20 लाख से अधिक मौतें प्रदूषण के कारण हो रही हैं। इंडो-गंगा प्लेन में 10 लाख प्री-मैच्योर डेथ्स का अनुमान है, लेकिन सरकार संसद में संवेदनहीनता दिखाते हुए कहती है कि मौतों को प्रदूषण से जोड़ने का कोई “conclusive data” नहीं है।

यह जहरीली हवा: सांसों का सौदा नहीं तो और क्या है, जहां दिल्ली में रेस्पिरेटरी डेथ्स 2024 में 9,211 तक पहुंच गई हैं।

गवर्नेंस की विफलता और खोखले सरकारी उपाय

प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर लागू किया जाने वाला ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) केवल कागजी शेर साबित हो रहा है। स्टबल बर्निंग, वाहन उत्सर्जन और धूल पर कोई ठोस इंटर-स्टेट प्लान नहीं है। एंटी-स्मॉग गन्स और वाटर स्प्रिंकल्स सिर्फ दिखावा बनकर रह गए हैं।

बजट में क्लीन एयर प्रोग्राम के लिए आवंटित फंड का बड़ा हिस्सा खर्च ही नहीं होता। सोशल मीडिया पर लोग इसे “मोदी का गिफ्ट” कह रहे हैं, जहां आम जनता को “सांस लेना पैट्रियॉटिज्म” जैसे जुमलों से बहलाया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मौत का व्यापार है, जहां कॉर्पोरेट हितों को जन स्वास्थ्य से ऊपर रखा गया है।

भ्रष्टाचार का संस्थागत जाल और इलेक्टोरल बॉन्ड्स

करप्शन का जाल इतना गहरा हो चुका है कि ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के 2025 करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में भारत 182 देशों में 91वें स्थान पर खड़ा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक घोषित इलेक्टोरल बॉन्ड्स स्कीम ने भ्रष्टाचार को कानूनी जामा पहना दिया था, जिसके जरिए BJP को 50% से अधिक डोनेशन मिले।

फ्यूचर गेमिंग और मेघा इंजीनियरिंग जैसी कंपनियों ने करोड़ों दिए और बदले में बड़े इंफ्रा कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल किए। विपक्ष इसे “चंदा दो, धंधा लो” का फॉर्मूला कह रहा है, जहां ED/CBI की रेड्स के बाद कंपनियों के डोनेशन अचानक बढ़ जाते हैं। PM CARES फंड की अपारदर्शिता ने भ्रष्टाचार की जड़ों को और मजबूत किया है।

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मेरिट की मौत और नेपोटिज्म का हावी होना

सत्ता के गलियारों में नेपोटिज्म ने मेरिटोक्रेसी को पूरी तरह खत्म कर दिया है। शशि थरूर जैसे नेता इसे लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बता रहे हैं। उच्च शिक्षा और नौकरियों में परिवारवाद और जाति-आधारित पक्षपात के कारण सिस्टम चरमरा रहा है। बजट 2025-26 में सोशल सेक्टर पर खर्च घटकर 19% रह गया है।

HDI 2025 की रिपोर्ट में भारत 130वें स्थान पर है, जो असमानता को स्पष्ट करता है। जहरीली हवा: सांसों का सौदा झेल रही जनता अब शिक्षा और स्वास्थ्य में आती गिरावट से असंतुष्ट है, क्योंकि “विकसित भारत” का दावा हिंदुत्व के शोर में असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश मात्र लग रहा है।

बढ़ता जन असंतोष और विफलताओं का ट्रेंड

आज भारत की जमीन पर असंतोष उबल रहा है। 8% से अधिक बेरोजगारी दर और 45% युवा बेरोजगारी ने भविष्य को अंधकारमय बना दिया है। सोशल मीडिया पर “Modi failed India” ट्रेंड कर रहा है, क्योंकि जनता टूटे इंफ्रास्ट्रक्चर, हाई टैक्स और स्थिर मजदूरी से त्रस्त है।

फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट में भारत का “partly free” होना और प्रेस फ्रीडम में 161वां स्थान इस बात का सबूत है कि लोकतांत्रिक आवाजें दबाई जा रही हैं। लोग अब कहने लगे हैं कि “TINA – There Is No Accountability”, जहां अधिकारी और मंत्री करोड़ों कमा रहे हैं और आम आदमी अपनी जान गंवा रहा है।

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राजनीतिक तूफान और भविष्य की चुनौतियां

अगर इन बुनियादी मुद्दों को तुरंत हल नहीं किया गया, तो 2026-27 का चुनावी एजेंडा सरकार के लिए आत्मघाती साबित होगा। “अच्छे दिन” का सपना अब टूट चुका है और जनता हिंदुत्व के नैरेटिव से ऊबकर अब जवाब मांग रही है। आलोचकों का कहना है कि सरकार के लिए प्रोग्रेस केवल प्रोपेगेंडा है, जबकि असलियत में देश संकट में डूब रहा है।

जहरीली हवा: सांसों का सौदा, मरती हुई मेरिट और भ्रष्टाचार का यह कॉकटेल एक बड़े राजनीतिक तूफान की आहट है। अब समय बहानेबाजी का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है, वरना इतिहास मोदी राज को एक “Betrayed Nation” की कहानी के रूप में दर्ज करेगा।

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