मध्यप्रदेश बाघ शिकार 2025: टाइगर स्टेट में मौतों का तांडव
मध्यप्रदेश बाघ शिकार जिसे गर्व से भारत का ‘टाइगर स्टेट’ कहा जाता है, आज अपने सबसे काले दौर से गुजर रहा है। साल 2022 की टाइगर सेंसस के अनुसार यहाँ 785 से अधिक बाघों की मौजूदगी दर्ज की गई थी, लेकिन 2025 में यही प्रदेश संरक्षण की सबसे बड़ी विफलता का गवाह बन रहा है। इस साल अब तक रिकॉर्ड 54 बाघों की जान जा चुकी है, जो 1973 में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की शुरुआत के बाद से किसी एक वर्ष का सबसे भयावह आंकड़ा है।
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अप्राकृतिक मौतें और पोचिंग के ठोस सबूत: क्या यह सिर्फ क्षेत्रीय लड़ाई है?
वन विभाग अक्सर इन मौतों को बाघों की आपसी ‘क्षेत्रीय लड़ाई’ (Territorial Fight) करार देता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में हुई 57 प्रतिशत से अधिक मौतें पूरी तरह अप्राकृतिक हैं, जिनमें इलेक्ट्रोक्यूशन (बिजली का करंट), जहर, और अवैध शिकार के लिए बिछाए गए फंदे (स्नेयर्स) मुख्य कारण रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय तस्करी और मध्यप्रदेश बाघ शिकार 2025 का गहराता जाल
बाघों के शिकार का यह खेल अब स्थानीय स्तर से निकलकर अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट तक फैल चुका है। साल 2025 में कई ऐसी गिरफ्तारियां हुईं जिन्होंने वन्यजीव अपराध के गहरे नेटवर्क का पर्दाफाश किया। दिसंबर में सिक्किम में अंतरराष्ट्रीय तस्कर यांगचेन लाखुंगपा की गिरफ्तारी इसका बड़ा प्रमाण है, जिसके संबंध चीन और नेपाल के तस्करी नेटवर्क से जुड़े पाए गए।
अंधविश्वास और कानूनी कार्रवाई: ‘पैसे की बारिश’ के लिए बाघों की बलि
जंगलों में शिकार का एक बड़ा कारण आज भी समाज में व्याप्त अंधविश्वास है। नवंबर में नर्मदापुरम कोर्ट ने नौ शिकारियों को चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई, जो ‘पैसे की बारिश’ कराने के लालच में बाघों की जान ले रहे थे। लेकिन विडंबना यह है कि सजा के ऐसे इक्का-दुक्का मामलों के बावजूद बड़े नेटवर्क तक कानून के हाथ नहीं पहुँच पा रहे हैं।
विभाग का तर्क बनाम जमीनी हकीकत: कागजी चेतावनी और खाली पद
चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन शुब्ह रंजन सेन का कहना है कि हर मौत को पहले पोचिंग मानकर एनटीसीए (NTCA) प्रोटोकॉल के तहत जांच की जाती है। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि विभाग के पास संसाधनों और इच्छाशक्ति की भारी कमी है। वर्तमान में वन विभाग में करीब 30 प्रतिशत स्टाफ की कमी है। मानसून के दौरान गश्त में बरती जाने वाली लापरवाही, खुफिया जानकारी (Intelligence) जुटाने में विफलता और बफर जोन में ढीली सुरक्षा व्यवस्था इन मौतों के लिए जिम्मेदार है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष और कॉरिडोर में असुरक्षित बाघ
टाइगर रिजर्व की सीमाओं के बाहर बाघों का निकलना उनकी जान के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। रिजर्व के बाहर होने वाली मौतें तेजी से बढ़ रही हैं। किसान अपनी फसलों को जंगली सूअरों से बचाने के लिए खेतों के चारों ओर नंगे बिजली के तार (Live Wire) बिछाते हैं, जिसकी चपेट में आकर बाघ दम तोड़ देते हैं। इसके अलावा रेलवे ट्रैक पर होने वाले हादसे, जैसे रतापानी में ट्रेन से कुचलकर बाघ की मौत, विभाग की मॉनिटरिंग पर सवाल उठाती है।
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लचर निगरानी और दयनीय वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन
एनटीसीए की रिपोर्ट भारत में बाघों के संरक्षण पर सवाल उठाती है, लेकिन मध्यप्रदेश की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। आधुनिक तकनीक जैसे ‘M-STrIPES’ ऐप का उपयोग अभी भी अधूरा है और जमीनी मॉनिटरिंग के लिए स्टाफ की भारी कमी है।
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क्या टाइगर स्टेट अब ‘टाइगर कब्रिस्तान’ बनेगा?
अंततः, 54 बाघों की मौत कोई मामूली आंकड़ा नहीं है; यह हमारी पूरी संरक्षण नीति की करारी हार है। मध्यप्रदेश बाघ शिकार 2025 के ये आंकड़े एक चेतावनी हैं कि यदि अब भी सरकार और वन विभाग नहीं चेते, तो वह दिन दूर नहीं जब मध्यप्रदेश के जंगलों से बाघों की दहाड़ हमेशा के लिए खामोश हो जाएगी।



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