Loading Now

बुलडोजर की क्रूर कार्रवाई: दिल्ली में गरीबों के आशियाने ध्वस्त।

बुलडोजर की क्रूर कार्रवाई

राजधानी दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार के सत्ता में आने के बाद से, बुलडोजर की क्रूर कार्रवाई ने हजारों गरीब परिवारों की जिंदगियां तबाह कर दी हैं। यह क्रूर कार्रवाई दक्षिणपंथी मोदी सरकार की गरीब-विरोधी नीतियों का चरम है, जिसने मजदूरों, घरेलू कामगारों और रेहड़ी-पटरी वालों को सड़कों पर फेंक दिया है।

मद्रासी कैंप, भूमिहीन कैंप, जेलरवाला बाग, तैमूर नगर और वजीरपुर जैसी दशकों से बसी बस्तियों को रौंद दिया गया है। आंकड़ों के मुताबिक, केवल 2025 में ही भूमिहीन कैंप में 10,000 से अधिक परिवार बेघर हो गए, जिन्हें एक ही रात में मलबे के ढेर पर छोड़ दिया गया।

यह अमानवीयता पूंजीवादी मोदी सरकार की जमीन की भूख को उजागर करती है, जहां गरीबों को केवल ‘अतिक्रमणकारी’ बताकर उनकी आजीविका छीन ली जाती है। सरकार ने ‘जहां झुग्गी, वहां मकान’ का झूठा वादा किया, लेकिन हकीकत यह है कि केवल 3,000 परिवारों को ही पुनर्वास मिल सका, जबकि 9,000 से अधिक परिवारों को नीतिगत बहानों से वंचित रखा गया।

पूंजीपतियों के लिए जमीन लूट: करोड़ों की संपत्ति पर गरीबों की बेघरी

यह ध्वस्तीकरण की बुलडोजर की क्रूर कार्रवाई दिल्ली हाई कोर्ट के आदेशों का हवाला देकर की जा रही है, लेकिन पूर्व नोटिस की कमी और पुनर्वास की अनदेखी सुप्रीम कोर्ट के ही दिशानिर्देशों का खुला उल्लंघन है। भाजपा की यह बेरहमी उसके दक्षिणपंथी पूंजीवादी एजेंडे को मजबूत करती है, जहां गरीबों को वोट बैंक से दुश्मन में बदल दिया जाता है।

एक विस्तृत अध्ययन के अनुसार, इन बुलडोजर की क्रूर कार्रवाई से 1,831 एकड़ जमीन खाली कराई गई है, जिसकी कीमत ₹60,000 करोड़ से भी अधिक आंकी गई है। इस भूमि अधिग्रहण का विवरण चौंकाने वाला है:

डीडीए (DDA) द्वारा: 2019-2024 में 317 एकड़।यमुना बाढ़ क्षेत्र से: 2024 में 1,459 एकड़।

यमुना वनस्थली से: 2025 में 24 एकड़।

यह ‘क्लीन-अप’ असल में पूंजीपतियों के लिए शहरी विकास का एक बहाना है, जहां उच्च मूल्य वाली साइटें, जैसे खैबर पास (15 एकड़, ₹1,000 करोड़) और ब्रार स्क्वायर (5 एकड़, ₹165 करोड़), गरीबों को बेघर करके हथिया ली गईं। सर्कल रेट से कहीं अधिक कीमत पर यह विशाल भूमि लूट मोदी सरकार के लालची विकास मॉडल को बेनकाब करती है, जिसे अब ‘बुलडोजर जस्टिस’ का प्रतीक माना जा रहा है, जो दक्षिणपंथी विचारधारा की गरीब-विरोधी बेरहमी को दर्शाती है।

कोरोना काल में न्यायपालिका का कठोर रुख: संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन

इस पूंजीवादी खेल में अदालतें भी साझीदार क्यों दिखती हैं, यह एक गंभीर सवाल है। इसका प्रमाण कोरोना महामारी के चरम पर उस समय मिला, जब सरकार लोगों को घरों में रहने की सलाह दे रही थी। उसी दौरान, 31 अगस्त 2020 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अरुण मिश्रा (जिस बैंच में वर्तमान मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई भी शामिल थे) ने आदेश दिया कि रेलवे की ज़मीन पर बनीं 48,000 झुग्गियाँ तीन महीने के भीतर तोड़ी जाएँ। साथ ही, यह भी कहा गया कि किसी भी राजनीतिक या न्यायिक हस्तक्षेप की अनुमति नहीं दी जाएगी।

दिल्ली में कुल 60 झुग्गी बस्तियाँ रेलवे की ज़मीन पर हैं। डीयूएसआईबी (DUSIB) के अनुसार, इनमें 43,634 झुग्गियाँ हैं, और 7 बस्तियाँ रेलवे व डीडीए की संयुक्त ज़मीन पर हैं, जिनमें 4,794 झुग्गियाँ हैं, यानी कुल 48,428 झुग्गियाँ। इसका सीधा मतलब है कि लगभग 4-5 लाख लोग वैश्विक महामारी के समय बेघर होने की कगार पर थे।

इसके अलावा, दिसंबर 2021 में, सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर, न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति सी.टी. रविकुमार ने सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण को लेकर चिंता जताते हुए टिप्पणी की थी कि “यह एक दु:खद कहानी है जो पिछले 75 वर्षों से जारी है, प्रमुख शहर झुग्गी-बस्तियों में तब्दील हो गए हैं।”

यह दुखद है कि इन्हें शहरों के ‘झुग्गी-बस्ती में तब्दील होने’ का तो दुःख है, लेकिन देश की गरीब जनता को आवासीय अधिकार देने की रंचमात्र भी इच्छा नहीं है। जबकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन के अधिकार में सम्मान और आश्रय को शामिल किया गया है, जिससे आवास का अधिकार एक मौलिक अधिकार बन जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय भी जब इनके अधिकारों की बात करने की बजाय उन्हें ‘अतिक्रमणकारी’ शब्द से परिभाषित करने लगे, तो यह जनतंत्र के मूल आदर्शों से गहरा विचलन है।

गरीबों को शहर से बाहर धकेलने का षड्यंत्र

यमुना फ्लडप्लेन्स पर अतिक्रमण हटाने के नाम पर हजारों परिवारों को सड़कों पर धकेल दिया गया, बिना पर्याप्त नोटिस या वैकल्पिक आवास के। यह मोदी सरकार की अमानवीयता है, जहां पर्यावरण का बहाना लेकर गरीबों को लक्षित किया जाता है, जबकि असली मकसद कॉर्पोरेट हितों को जमीन सौंपना है। मजदूरों और प्रवासियों पर यह हमला सामाजिक न्याय की हत्या है, क्योंकि दशकों से दिल्ली की अर्थव्यवस्था चलाने वाले लोग बेघर हो रहे हैं।

मद्रासी कैंप जैसे इलाकों से तमिल प्रवासियों को दूरस्थ स्थानों जैसे नरेला भेजकर उनकी आजीविका छीन ली गई, क्योंकि वहां से काम पर आना-जाना असंभव हो गया। यह पूंजीवादी मॉडल गरीबों को शहर से बाहर धकेलने का एक षड्यंत्र है, जो मोदी सरकार की दक्षिणपंथी नीतियों का अभिन्न अंग है।

दिल्ली से लेकर हरियाणा, गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश तक के शहरों में बुलडोजर की क्रूर कार्रवाई कर झुग्गी-बस्तियों को तोड़ा जा रहा है। सरकार का दावा है कि वह अदालती आदेशों का पालन कर रही है, लेकिन विपक्ष और नागरिक संगठनों का कहना है कि यह ‘बुलडोजर राज’ है, जहां पुनर्वास का वादा झूठा साबित हो रहा है।

दिल्ली में अकेले सैकड़ों बस्तियां तोड़ी गईं, लेकिन योग्यता के बहाने अधिकांश परिवारों को पुनर्वास से बाहर रखा गया। यह गरीबों के अधिकारों का घोर हनन है, जो संविधान की भावना के विरुद्ध है। इस व्यापक भूमि लूट से सरकार को खरबों की संपत्ति मिली, लेकिन कीमत गरीब परिवारों ने बेघरगी, भुखमरी और अपमान के रूप में चुकाई। भाजपा की जमीन-भूखी नीतियां यह दर्शाती हैं कि विकास के नाम पर असमानता को बढ़ाया जा रहा है। मोदी सरकार का यह अमानवीय कृत्य इतिहास में एक काले धब्बे के रूप में दर्ज होगा।

Spread the love

Post Comment

You May Have Missed