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महाराष्ट्र मुस्लिम आरक्षण रद्द: ओवैसी ने बताया ‘रमजान का तोहफा’!

महाराष्ट्र मुस्लिम आरक्षण रद्द

महाराष्ट्र मुस्लिम आरक्षण रद्द करने का फैसला आज राज्य की राजनीति में सबसे बड़ी चर्चा का विषय बन गया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली महायुति सरकार ने मंगलवार रात एक नया गवर्नमेंट रेजोल्यूशन (GR) जारी करते हुए 2014 के उस अध्यादेश को पूरी तरह वापस ले लिया, जिसने मुस्लिम समुदाय के लिए नौकरियों और शिक्षा में 5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया था।

हालांकि यह कोटा कानूनी पेचों और अदालती रोक के कारण पहले से ही प्रभावी नहीं था, लेकिन सरकार का इसे आधिकारिक रूप से ‘शून्य’ घोषित करना एक बड़ा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। विपक्ष ने इस कदम को सीधे तौर पर ‘अल्पसंख्यक विरोधी’ मानसिकता करार दिया है, जबकि सरकार का तर्क है कि जो कानून तकनीकी रूप से पहले ही खत्म हो चुका था, उसे फाइलों से हटाना केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया है।

2014 का वो अध्यादेश: चुनाव से ठीक पहले खेला गया ‘मास्टरस्ट्रोक’ जो फेल हो गया

इस पूरे विवाद की जड़ें जुलाई 2014 में छिपी हैं, जब तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मराठों के लिए 16% और मुस्लिमों के लिए 5% आरक्षण की घोषणा की थी। मुस्लिमों को ‘विशेष पिछड़ा वर्ग-ए’ (SBC-A) कैटेगरी के तहत रखा गया था। उस समय बॉम्बे हाई कोर्ट ने मराठा आरक्षण पर रोक लगा दी थी, लेकिन मुस्लिमों के लिए शिक्षा में 5% आरक्षण को हरी झंडी दे दी थी।

हालांकि, नई सरकार आने के बाद उस अध्यादेश को 23 दिसंबर 2014 की समयसीमा तक कानून में नहीं बदला गया, जिसके कारण वह तकनीकी रूप से लैप्स (Lapsed) हो गया। महाराष्ट्र मुस्लिम आरक्षण रद्द होने की आज की खबर उसी अधूरे कानूनी सफर का आधिकारिक समापन है।

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सच्चर और रहमान कमेटी की रिपोर्ट: क्या आंकड़े समुदाय के पिछड़ेपन की गवाही देते हैं?

महाराष्ट्र में मुस्लिम समुदाय की आबादी लगभग 11.5% है और विभिन्न आयोगों ने समय-समय पर उनकी दयनीय सामाजिक-आर्थिक स्थिति को उजागर किया है। 2006 की न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर समिति और 2004 की न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा समिति ने आंकड़ों के साथ दिखाया था कि समुदाय का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा और सरकारी नौकरियों में बहुत पीछे है।

2009 में गठित डॉ. महमूदुर रहमान समिति ने तो मुस्लिमों के लिए 8% आरक्षण की सिफारिश की थी। महाराष्ट्र मुस्लिम आरक्षण रद्द होने के बाद अब सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार इन आंकड़ों को नजरअंदाज कर रही है?

विपक्ष का तर्क है कि यदि सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात करती है, तो उसे कानूनी अड़चनों को दूर कर इस पिछड़ेपन को दूर करने के लिए नया कानून लाना चाहिए था।

विपक्ष का ‘एंटी-माइनॉरिटी’ आरोप: ओवैसी और आजमी ने सरकार को घेरा

जैसे ही महाराष्ट्र मुस्लिम आरक्षण रद्द करने की खबर फैली, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और समाजवादी पार्टी के नेता अबू आसिम आजमी ने सरकार पर तीखा हमला बोला। ओवैसी ने इसे ‘रमजान का तोहफा’ करार देते हुए तंज कसा कि बीजेपी नहीं चाहती कि मुस्लिम युवा मुख्यधारा में आएं।

इम्तियाज जलील ने आरोप लगाया कि सरकार चाहती है कि मुस्लिम युवा केवल ऑटोरिक्शा चलाएं या छोटी नौकरियां करें, वे उन्हें आईएएस-आईपीएस बनते नहीं देखना चाहते। कांग्रेस सांसद वर्षा गायकवाड़ ने इसे लोकतंत्र के लिए ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताते हुए कहा कि सरकार ने जानबूझकर उन दस्तावेजों और प्रक्रियाओं को बंद कर दिया है जो समुदाय के उत्थान के लिए जरूरी थे।

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जाति सत्यापन और वैलिडिटी सर्टिफिकेट पर लगी रोक: अब क्या होगा भविष्य?

नए आदेश (GR) के बाद सबसे बड़ा झटका उन छात्रों को लगा है जो अब तक ‘SBC-A’ कैटेगरी के तहत जाति प्रमाण पत्र (Caste Certificate) या नॉन-क्रीमी लेयर सर्टिफिकेट के लिए आवेदन कर रहे थे। सरकार ने अब स्पष्ट रूप से निर्देश दिया है कि मुस्लिम समुदाय के लिए इस विशेष कैटेगरी के तहत कोई भी नया सर्टिफिकेट जारी नहीं किया जाएगा।

महाराष्ट्र मुस्लिम आरक्षण रद्द होने का मतलब है कि अब शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश या सरकारी भर्तियों में मुस्लिम समुदाय के लोग इस 5% कोटे का दावा नहीं कर पाएंगे। अधिकारियों का कहना है कि चूँकि यह कोटा वर्षों से लागू नहीं था, इसलिए मौजूदा प्रवेश प्रक्रिया पर तत्काल कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन भविष्य के आवेदनों के लिए यह दरवाजा पूरी तरह बंद हो चुका है।

सुप्रीम कोर्ट का रुख और 50% की सीमा: क्या यह फैसला कानूनी मजबूरी था?

सरकार के समर्थकों और कानूनी जानकारों का तर्क है कि आरक्षण की सीमा 50% से अधिक नहीं हो सकती, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में स्पष्ट किया है। महाराष्ट्र मुस्लिम आरक्षण रद्द करने के पीछे एक बड़ा तर्क यह भी है कि संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता।

हालांकि, 2014 के अध्यादेश में मुस्लिमों को धर्म के बजाय ‘सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन’ (SEBC) के आधार पर कोटा दिया गया था। बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी इसी तर्क को मानते हुए शिक्षा में आरक्षण की अनुमति दी थी। सरकार का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी बाद में इस कोटे को अमान्य माना था, इसलिए पुराने और निष्प्रभावी आदेशों को जारी रखने का कोई संवैधानिक आधार नहीं बचा था।

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सियासी समीकरण: क्या मराठा आरक्षण के दबाव में लिया गया यह फैसला?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महाराष्ट्र मुस्लिम आरक्षण रद्द करने का समय काफी महत्वपूर्ण है। राज्य में इस समय मराठा आरक्षण को लेकर भारी दबाव है और ओबीसी (OBC) समुदाय भी अपने कोटे को सुरक्षित रखने के लिए मुखर है।

ऐसे में किसी एक विशेष समुदाय के कोटे को आधिकारिक रूप से खत्म करना बहुसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण की एक रणनीति हो सकती है।

महायुति सरकार यह संदेश देना चाहती है कि वह तुष्टिकरण की राजनीति के खिलाफ है और केवल उन्हीं आरक्षणों को मान्यता देगी जो कानूनी और संवैधानिक रूप से वैध हैं। एनसीपी (शरद पवार) के प्रवक्ता क्लाइड क्रास्टो का कहना है कि यह फैसला साबित करता है कि बीजेपी को अपने सहयोगियों के मुस्लिम नेताओं की कोई परवाह नहीं है।

विकास की दौड़ में कहाँ खड़ा होगा महाराष्ट्र का मुस्लिम युवा?

अंततः, महाराष्ट्र मुस्लिम आरक्षण रद्द होना एक ऐसी बहस को जन्म दे रहा है जो केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहेगी। भले ही सरकार इसे एक तकनीकी प्रक्रिया बताए, लेकिन इसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव गहरे होंगे। एक तरफ शिक्षा और रोजगार में पिछड़ता समुदाय है, तो दूसरी तरफ संवैधानिक मर्यादाओं की दुहाई देती सरकार।

अब असली चुनौती यह है कि बिना आरक्षण के भी मुस्लिम समुदाय के युवाओं को समान अवसर कैसे दिए जाएं? यदि ‘जकात’ और निजी प्रयासों को शिक्षा की ओर मोड़ने की अपील (जैसा कि इम्तियाज जलील ने की) रंग लाती है, तभी समुदाय आत्मनिर्भर बन पाएगा। लेकिन राज्य की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना आने वाले चुनावों में एक बड़ा चुनावी मुद्दा जरूर बनेगा।

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