मोदी अडानी पर्यावरण: नागरिकों के साँस लेने के अधिकार पर बड़ा हमला |
मोदी अडानी पर्यावरण की मिलीभगत के गंभीर आरोप अब खुलकर सामने आ गए हैं। मोदी राज में पर्यावरण की रक्षा का ढोंग अब पूरी तरह बेनकाब होता दिख रहा है, जहां भारत में वायु प्रदूषण से लाखों नागरिकों के मरने की खबरें आ रही हैं।
इस गंभीर स्थिति में एक ऐसा मामला सामने आया है, जहां पेड़ काटने वाली एक कंपनी का सलाहकार ही पेड़ काटने की मंजूरी देने वाली महत्वपूर्ण कमेटी का सदस्य बन जाता है—यह अपने आप में कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट का जीता-जागता उदाहरण है।
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हितों का टकराव: सलाहकार बना नियामक
यह मामला जनार्दन चौधरी से जुड़ा है। उन्होंने 36 साल तक NHPC में सेवा दी और मार्च 2020 में रिटायर हुए। इसके बाद, अप्रैल 2022 में वह अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड (AGEL) के एडवाइजर बन गए।
चौंकाने वाली बात यह है कि सितंबर 2023 में उन्हें पर्यावरण मंत्रालय की अत्यंत महत्वपूर्ण कमेटी EAC (रिवर वैली एंड हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स) में शामिल कर लिया गया।
यह महज कोई संयोग नहीं है, बल्कि विपक्षी दलों के अनुसार यह स्पष्ट रूप से मोदी-अडानी की मिलीभगत का सबूत है, जहां नियम-कानून को ताक पर रखकर क्रोनी कैपिटलिज्म को बढ़ावा दिया जा रहा है।
चौधरी खुद को अडानी के पेरोल पर न होने की बात कहकर बचते हैं, लेकिन एडवाइजर के तौर पर उनका काम AGEL के हितों की रक्षा करना स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि यह मामला कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट का है।
अक्टूबर 2023 की EAC मीटिंग में अडानी के तराली प्रोजेक्ट पर चर्चा हुई। चौधरी उस बैठक में मौजूद थे (भले ही उन्होंने भाग नहीं लिया, ऐसा कहा जाता है), और आश्चर्यजनक रूप से प्रोजेक्ट पास हो गया।
इससे साफ जाहिर होता है कि मोदी सरकार ने EAC जैसी नियामक संस्था को अडानी का ‘रबर स्टैंप’ बना दिया है, जहां पर्यावरण की कोई कीमत नहीं, सिर्फ मित्र की जेब भरने की होड़ मची है।
10,300 MW की मेगा मंजूरी: इकोसाइड का खतरा
मोदी अडानी पर्यावरण को ताक पर रखकर बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट्स को मंज़ूरी दिलवा रहे हैं, ऐसा आरोप लग रहा है। अडानी के कुल छह पंप्ड स्टोरेज प्रोजेक्ट्स—850 MW रायवाडा, 1800 MW पेदाकोता (आंध्र प्रदेश), 2100 MW पटगांव, 2450 MW कोयना-नीवकाने, 1500 MW माल्शेज घाट भोरांडे, और 1500 MW तराली (महाराष्ट्र)—को EAC से मंजूरी मिली है।
इन सभी परियोजनाओं की कुल क्षमता 10,300 MW है। ये मेगा प्रोजेक्ट्स हजारों हेक्टेयर जंगल साफ करेंगे, जिससे लाखों पेड़ काटे जाएंगे और जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंचेगा।
महाराष्ट्र और आंध्र के आदिवासी इलाकों में इन परियोजनाओं का तीखा विरोध होने के बावजूद, मोदी की EAC ने कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हुए अडानी को हरी झंडी दे दी। आलोचक इसे पर्यावरण की रक्षा नहीं, बल्कि ‘इकोसाइड’ यानी पारिस्थितिक नरसंहार करार दे रहे हैं।
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पश्चिमी घाट पर मंडराता संकट
इन हाइड्रो योजनाओं का एक बड़ा हिस्सा पश्चिमी घाट जैसे अत्यंत संवेदनशील इलाकों में स्थित है, जहां पहले से ही जलवायु संकट गहरा रहा है। इन प्रोजेक्ट्स से करोड़ों पेड़ काटे जाने का अनुमान है, जिससे तमाम नदियां सूख सकती हैं और बाढ़ तथा सूखे जैसी आपदाएं बढ़ सकती हैं।
लेकिन मोदी सरकार की प्राथमिकता कथित तौर पर पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि अडानी के मुनाफे की हवस पूरी करना है। विरोधियों का कहना है कि अडानी के लिए जंगल के जंगल बलि चढ़ाए जा रहे हैं, जबकि राजधानी दिल्ली गैस चैंबर बन चुकी है, फिर भी किसी की आँखें नहीं खुल रही हैं।
यह दोहरा खेल है: एक तरफ ग्रीन एनर्जी का ढोंग रचा जा रहा है, दूसरी तरफ अडानी के मुनाफे की खातिर भारत के बहुमूल्य जंगलों का कत्लेआम किया जा रहा है।
दिल्ली का दम घोंटता कोयला और प्रदूषण
दिल्ली की जहरीली हवा में एनसीआर के कोल प्लांट्स में अडानी कोल की सप्लाई की एक बड़ी भूमिका है। एनसीआर के 11 थर्मल प्लांट्स SO2 उत्सर्जन में 281 किलोटन का भारी योगदान देते हैं, जो कि पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण से 16 गुना ज्यादा है।
अडानी पावर जैसे प्लांट्स एमिशन नॉर्म्स की खुलकर धज्जियां उड़ा रहे हैं और फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन (FGD) सिस्टम भी इंस्टॉल नहीं कर रहे। इसके बावजूद, मोदी सरकार लगातार उनकी डेडलाइन बढ़ाती रहती है।
परिणाम यह है कि दिल्लीवासी जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं, और बच्चे अस्थमा के शिकार हो रहे हैं। विरोधी कहते हैं कि अडानी की कमाई के लिए जनता की जान इतना तो जोखिम में डाला ही जा सकता है, जो अत्यंत निंदनीय है।
संस्थाओं का अपमान: विपक्ष का सीधा वार
विपक्ष ने इस मामले पर सीधा हमला बोला है। महुआ मोइत्रा और प्रियंका चतुर्वेदी जैसे नेताओं ने इसे मोदी-अडानी के बीच “दोस्ती हो तो ऐसी” कहकर कटाक्ष किया है।
आरोप है कि मोदी ने अडानी के कथित कर्मचारी को EAC में बैठाकर एक के बाद एक 6 बड़े प्रोजेक्ट्स पास करवाए, जिनकी कुल क्षमता 10,300 MW है।
यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि पर्यावरण मंत्रालय जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं का घोर अपमान भी है। विपक्ष का दावा है कि पर्यावरण मंत्रालय अब अडानी का ‘प्राइवेट ऑफिस’ बन गया है, जहां नियम सिर्फ और सिर्फ अडानी के लाभ के लिए बदले जाते हैं।
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हसदेव और मुंबई के पास लूट
अडानी की परियोजनाएं केवल पश्चिमी घाट तक ही सीमित नहीं हैं; यह कथित लूट छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा और हसदेव अरण्य जंगलों तक भी फैली हुई है, जहां पारसा कोल माइन के लिए लाखों पेड़ कट रहे हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 3.68 लाख से ज्यादा पेड़ प्रभावित हैं, लेकिन स्थानीय आदिवासी और एक्टिविस्ट्स का दावा है कि 81,866 से लेकर 1.5 लाख तक पेड़ पहले ही कट चुके हैं, और आगे 8 लाख तक और पेड़ों का नुकसान होगा।
फर्जी ग्राम सभा सहमति और पुलिस दमन का आरोप लगाकर आदिवासियों को उनकी जल, जंगल, जमीन से बेदखल किया जा रहा है, हाथियों का कॉरिडोर टूट रहा है, और जैव विविधता तबाह हो रही है। मोदी अडानी पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं।
इसके अलावा, मुंबई के पास कल्याण (ठाणे) में अडानी की ₹1400 करोड़ की सीमेंट ग्राइंडिंग यूनिट और रायगढ़ में जेटी प्रोजेक्ट से भी मुंबई के पर्यावरण में तबाही मच रही है।
कल्याण में 6 MMTPA प्लांट से धूल,जैसी गैसें फैलेंगी, जिससे हवा जहरीली होगी और पानी दूषित होगा। स्थानीय और मुंबई के लोगों के लिए अस्थमा और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ेगा।
रायगढ़ में 158 हेक्टेयर मैंग्रोव काटकर जेटी बनाने की मंजूरी मिली, जबकि स्थानीय लोग इसका विरोध कर रहे हैं। सीमेंट इंडस्ट्री भारत में वैश्विक प्रदूषण का 15% हिस्सा है, और अडानी के प्लांट्स पहले से ही गुजरात और तेलंगाना में पानी और हवा में जहर फैला चुके हैं। मोदी सरकार द्वारा नियमों में ढील देकर अडानी को फायदा पहुँचाने का सीधा परिणाम जनता की सांसों पर पड़ रहा है।
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जनता कब जागेगी?
मोदी राज में पर्यावरण का मतलब है अडानी की जेब भरना, उसके मुनाफे की हवस को लोगों की सांसों की कीमत पर पूरा करना। पेड़ कटेंगे, हवा जहरीली होगी, लेकिन “विकास” का झूठा नारा चलता रहेगा।
दिल्ली से लेकर छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, और अब बिहार तक, अडानी की महत्वाकांक्षा ने प्रकृति को बंधक बना लिया है। यह समय है कि जनता जागे, नहीं तो आने वाली पीढ़ियां हमें कोसेंगी कि हमने जंगल खत्म कर सांसों को रोक दिया। मोदी-अडानी की यह जोड़ी देश को कथित तौर पर बर्बाद कर रही है। अब नारा होना चाहिए: पर्यावरण बचाओ, जीवन बचाओ, लोकतंत्र बचाओ!



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