वाशिंगटन पोस्ट का बड़ा खुलासा: मोदी-अडानी गठजोड़ ने LIC को लूटा।
मोदी-अडानी गठजोड़ भारत में सत्ता और पूँजी का जहरीला मेल हमेशा से रहा है, लेकिन नरेंद्र मोदी के दौर में यह गठजोड़ क्रोनी कैपिटलिज्म का नंगा नाच बन चुका है। वाशिंगटन पोस्ट की 24 अक्टूबर 2025 की सनसनीखेज रिपोर्ट ने इसकी परतें उधेड़ दी हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि सरकारी संरक्षण कैसे निजी हितों को साध रहा है।
रिपोर्ट और सरकारी दस्तावेजों से साफ है कि मई 2025 में वित्त मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने LIC जैसे सार्वजनिक संस्थानों के 3.9 अरब डॉलर (लगभग 32,370 करोड़ रुपये) झोंकने का प्लान बनाया।
यह कोई सामान्य निवेश नहीं था, बल्कि ‘बाजार में भरोसा दिखाने’ का बहाना था, वह भी तब जब अडानी पर अमेरिकी SEC और DOJ के फ्रॉड व ब्राइबरी चार्जेस की तलवार लटक रही थी। इस पूरे प्रकरण को विपक्षी नेता राहुल गांधी ने ‘लूट इन्वेस्टमेंट फॉर क्रोनीज’ कहा, वहीं CPI(M) ने इसे ‘स्टेट-स्पॉन्सर्ड क्रोनी कैपिटलिज्म’ का ठप्पा लगाया है।
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वित्तीय सेवा विभाग और NITI आयोग की ‘साजिश’
रिपोर्ट के अनुसार, डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज (DFS) ने NITI आयोग के साथ मिलकर यह साजिश रची। इस योजना के तहत, LIC को अडानी पोर्ट्स के 5,000 करोड़ के बॉन्ड इश्यू में पूरी रकम अकेले खरीदनी पड़ी। यह खरीद ऐसे समय में हुई जब कोई भी प्राइवेट निवेशक अडानी समूह पर भरोसा करने को तैयार नहीं था।
जनता के पैसे को मोदी के ‘मित्र’ उद्योगपति की ढाल बनाना, क्रोनी कैपिटलिज्म का सबसे काला अध्याय है। हेमिंद्रा हजारी जैसे विशेषज्ञों ने इसे ‘सरकारी संरक्षण का सिग्नल’ बताया, जो यह दिखाता है कि अडानी का डेफिसिट $20\%$ बढ़ चुका था, फिर भी LIC जैसे टैक्सपेयर्स के पैसे से ‘कॉन expertise’ का नाटक रचा गया।
LIC को बनाया गया ‘कॉन्फिडेंस सिग्नलिंग’ का शिकार
LIC, जो करोड़ों गरीब और ग्रामीण परिवारों की जिंदगी का सहारा है, उसे इस व्यवस्थित घोटाले का शिकार बनाया गया। वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, DFS ने अपने ‘स्ट्रेटेजिक ऑब्जेक्टिव्स’ में स्पष्ट रूप से ‘अडानी ग्रुप में कॉन्फिडेंस सिग्नलिंग’ और ‘अन्य निवेशकों को प्रोत्साहित करना’ शामिल किया।
यह मई 2025 का वही महीना था जब अडानी पोर्ट्स को 585 मिलियन डॉलर के बॉन्ड रिफाइनेंसिंग की सख्त जरूरत थी, और LIC ने अकेले यह सब कुछ खरीद लिया। आलोचकों ने इसे ‘जनता के फंड्स का दुरुपयोग’ कहा। यह खरीद तब हुई जब अडानी ग्रुप का डेट 20% बढ़ चुका था, और Hindenburg की 2023 रिपोर्ट के बाद शेयरों में 135 अरब डॉलर की चपत लग चुकी थी। LIC के पोर्टफोलियो का मात्र 0.31% ही अडानी में होने के बावजूद, सत्ता के आदेश पर यह जोखिम लिया गया, जो आर्थिक विवेक नहीं, बल्कि राजनीतिक वफादारी का प्रमाण है। PSU बैंक पहले ही 94,000 करोड़ अडानी की कम्पनियों में डाल चुके हैं।
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अमेरिका में लगे गंभीर आरोप: $265 मिलियन की ब्राइबरी स्कीम
अडानी पर अमेरिका में लगे आरोप कोई छोटी-मोटी बात नहीं हैं। अमेरिकी SEC ने नवंबर 2024 में गौतम अडानी, उनके भतीजे सागर अडानी और सात अन्य पर 265 मिलियन डॉलर की ब्राइबरी स्कीम का गंभीर आरोप लगाया। यह केस सोलर एनर्जी कॉन्ट्रैक्ट्स हथियाने के लिए भारतीय अधिकारियों को रिश्वत देने का है, जिसका अनुमानित लाभ 20 साल में 2 अरब डॉलर था।
Hindenburg ने भी 2023 में स्टॉक मैनिपुलेशन, अकाउंटिंग फ्रॉड और टैक्स हेवन्स के जरिए मनी लॉन्ड्रिंग का पर्दाफाश किया था, जिसके बाद अडानी का मार्केट कैप 12 लाख करोड़ गिर गया। फिर भी, मोदी-अडानी गठजोड़ की वजह से मोदी सरकार ने LIC को उसी दलदल में धकेला।
2024 के DOJ इंडिक्टमेंट में साफ है कि अडानी ने 2020-2024 के बीच 250 मिलियन डॉलर से ज्यादा रिश्वत दी, जो अमेरिकी इनवेस्टर्स को धोखा देने के लिए थी। यह ‘राष्ट्र निर्माण’ नहीं, बल्कि ‘राष्ट्र लूट’ है।
LIC को हुए भारी नुकसान का सरकारी अनदेखी
LIC को पहले ही अडानी पर निवेश से भारी नुकसान झेलना पड़ा है। 2023 में Hindenburg के बाद मात्र दो दिनों में 18,000 करोड़ का नोटिशनल लॉस हुआ, और फरवरी 2023 तक कुल 49,728 करोड़ की चपत लगी। इतना ही नहीं, 2024-25 में भी, सितंबर तक 63,482 करोड़ के निवेश पर नवंबर 2024 के US चार्जेस के बाद एक ही दिन में 12,000 करोड़ का घाटा हुआ।
इसके बावजूद, सरकार ने दोबारा LIC को जोखिम में धकेला। वाशिंगटन पोस्ट के दस्तावेजों से पता चलता है कि सरकारी फाइलों में ‘अडानी में भरोसा बनाए रखना’ खुद एक नीति बन गया था। LIC के Q2FY24 डेटा से पता चला कि अडानी एंटरप्राइजेज में ही 384 करोड़ का घाटा हुआ, और कुल पोर्टफोलियो 63,482 करोड़ से घटकर 47,847 करोड़ रह गया।
सिम्बायोटिक रिलेशनशिप: मोदी का विजन और अडानी का विस्तार
क्या यह संयोग है कि मोदी और अडानी का गुजरात कनेक्शन 1990 के दशक से चला आ रहा है? वाशिंगटन पोस्ट ने इसे ‘सिम्बायोटिक रिलेशनशिप’ कहा, जहाँ मोदी का इंफ्रास्ट्रक्चर विजन अडानी के एक्सपैंशन से जुड़ा है, पोर्ट्स से लेकर एयरपोर्ट्स तक।
2024 के DOJ केस में साफ है कि अडानी ने 1.35 बिलियन डॉलर लोन और 750 मिलियन बॉन्ड्स इश्यू किए, जो US इनवेस्टर्स को झूठे स्टेटमेंट्स पर आधारित थे। अगर अडानी ग्रुप का डेफिसिट माउंटेन ढहता है, तो इसकी जिम्मेदारी करोड़ों पॉलिसीहोल्डर्स के बोनस को खतरे में डालते हुए कौन लेगा?
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सिस्टमैटिक लूट और ‘गोदी मीडिया’ की चुप्पी
यह क्रोनी कैपिटलिज्म का ऐसा रूप है जहाँ सत्ता पूँजी को लूट का लाइसेंस देती है। यह सिस्टमैटिक लूट है, और विडंबना यह है कि “गोदी मीडिया” इस पर चुप है, क्योंकि जनता की संपत्तियों को लूटकर पूँजीपतियों को बचाना उनके लिए ‘राष्ट्रभक्ति’ हो गया है। लेकिन सवाल पूछना चाहिए कि आखिर य़ह ‘राष्ट्रविरोध’ क्यों नहीं है?
यह लोकतंत्र का गला घोंटना है, जहाँ RTI दबाई जाती है और जांचें दबंगों के इशारे पर रुक जाती हैं। 2023 के कोल स्कैम में मोदी सरकार ने अडानी को ‘इनअप्रोप्रिएट’ डील्स की छूट दी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अवैध ठहराया था।
यह न सिर्फ फाइनेंशियल रिस्क है, बल्कि SEBI की जांचों को भी प्रभावित करता है, जहाँ 2023 के बाद भी कोई ठोस एक्शन नहीं हुआ। मोदी-अडानी गठजोड़ का यह नजदीकी रिश्ता भारतीय अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र दोनों को खोखला कर रहा है।
जनता जागिए: चुप्पी अब अपराध है
भारतीय अर्थव्यवस्था पर यह घाव बहुत गहरा है। LIC जैसे संस्थानों का दुरुपयोग न सिर्फ निवेशकों का भरोसा तोड़ता है, बल्कि वैश्विक निवेशकों को डराता भी है। 2023 के बाद अडानी का मार्केट कैप 12 लाख करोड़ गिर चुका है। विशेषज्ञ हेमिंद्रा हजारी ने कहा है, “यह सरकार अडानी का समर्थन करेगी, कोई नुकसान नहीं होने देगी।”
लेकिन जनता का नुकसान कौन सहेगा? 2024 के SEC चार्जेस से साफ है कि अडानी ग्रीन एनर्जी ने 175 मिलियन US इनवेस्टर्स को धोखा दिया, और Azure पावर के साथ मिलकर सोलर प्रोजेक्ट्स में रिश्वत बांटी। IIFL सिक्योरिटीज ने नवंबर 2024 में वार्न किया कि यह सब 80,000 करोड़ के PSU लोन को खतरे में डालता है।
वैश्विक स्तर पर, यह FCPA वॉयलेशन्स का केस है, जहाँ DOJ ने अडानी को ‘मल्टी-बिलियन स्कीम’ का मास्टरमाइंड ठहराया। जनता को अब सवाल पूछना होगा, क्योंकि चुप रहना अपराध है। राहुल गांधी की तरह कहो: यह ‘मोदी-अडानी मित्रता’ नहीं, बल्कि ‘मोदी-अडानी गठजोड़’ और ‘मोदी-अडानी लूट’ है।



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