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मोदीनॉमिक्स असमानता भारत की आधी GDP पर अरबपतियों का कब्ज़ा

मोदीनॉमिक्स असमानता

मोदीनॉमिक्स असमानता भारत की कॉर्पोरेट समृद्धि की चमक अक्सर देश की बढ़ती आर्थिक असमानता के अंधेरे को छिपा देती है, लेकिन हाल ही में जारी M3M हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2025 ने इस विसंगति को नंगा कर दिया है। यह लिस्ट दिखाती है कि 358 अरबपतियों की कुल संपत्ति $167 लाख करोड़ रुपये$ है, जो भारत के कुल $जीडीपी का लगभग आधा$ है।

यह आँकड़ा अपने आप में ‘समृद्धि’ का एक भ्रम मात्र है। अमीरों की संपत्ति का यह अभूतपूर्व केंद्रीकरण ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक जैसे चुनिंदा क्षेत्रों में हो रहा है, जबकि अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से, जैसे कृषि और $MSME$ (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) क्षेत्र, पीछे छूटते जा रहे हैं।

शीर्ष कॉर्पोरेट योद्धाओं के साम्राज्य पर संकट

इस लिस्ट के सबसे बड़े आकर्षण, मुकेश अंबानी और गौतम अडानी, के लिए यह वर्ष उतार-चढ़ाव भरा रहा है। मुकेश अंबानी और उनके परिवार ने $9.55 लाख करोड़ रुपये$ की संपत्ति के साथ एक बार फिर भारत के सबसे अमीर का ताज हासिल किया है, लेकिन यह पिछले साल की तुलना में $6% घटी$ है। रिलायंस की ऊर्जा, रिटेल और टेलीकॉम क्षेत्रों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, कर्ज का बोझ और वैश्विक बाजार की अस्थिरता ने उनकी संपत्ति को चोट पहुंचाई है।

यह गिरावट दर्शाती है कि अंबानी का साम्राज्य, जो कभी अजेय लगता था, अब बाहरी दबावों से जूझ रहा है, और यह भारत की कॉर्पोरेट दुनिया में सत्ता के संतुलन को उजागर करता है जहाँ शीर्ष पर पहुंचना आसान है, लेकिन टिकना कठिन।

वहीं, गौतम अडानी और परिवार के लिए यह वर्ष और भी चुनौतीपूर्ण रहा। उनकी संपत्ति $8.14 लाख करोड़ रुपये$ पर ठहर गई, जो $30% की भारी गिरावट$ दर्शाती है। हुरुन लिस्ट के अनुसार, एनर्जी सेक्टर की मंदी, वैश्विक कमोडिटी की अस्थिरता, ऊंचा कर्ज और शासन संबंधी जांच (गवर्नेंस प्रॉब्स) ने अडानी ग्रुप को पटक दिया।

2024 में अडानी ने अंबानी को पीछे छोड़कर शीर्ष पर कब्जा किया था, लेकिन इस साल की गिरावट साबित करती है कि उनका इंफ्रास्ट्रक्चर-केंद्रित मॉडल जोखिमों से भरा है। $हिंडनबर्ग$ जैसी घटनाओं का साया अभी भी मंडरा रहा है, और यह भारत के सबसे बड़े कॉर्पोरेट योद्धाओं के बीच एक कड़वी सच्चाई उजागर करता है कि तेजी से विस्तार हमेशा स्थिरता नहीं लाता। यह दोतरफा मुकाबला भारत इंक की राजनीति का भी प्रतीक है, जहाँ ये दिग्गज सरकारी अनुबंधों और नीतियों से लाभान्वित होते हैं।

नए चेहरे, पुरानी परंपराएँ और $मोदीनॉमिक्स असमानता$

शीर्ष $10$ में एचसीएल टेक्नोलॉजीज से जुड़ी रोशनी नादार मल्होत्रा का तीसरा स्थान एक दुर्लभ चमक है। $2.84 लाख करोड़$ की संपत्ति के साथ, वह भारत की सबसे अमीर महिला बन गईं। हालांकि, उनकी यह प्रगति $परिवारिक स्टेक ट्रांसफर$ पर टिकी है, न कि शुद्ध नवाचार पर। यह महिलाओं की कॉर्पोरेट सफलता का प्रतीक तो है, पर सवाल उठता है कि क्या यह सिस्टमिक बदलाव है या सिर्फ एक संयोग?

टॉप $10$ में साइरस पूनावाला, कुमार मंगलम बिड़ला जैसे नामों की मौजूदगी पुरानी धन-परंपराओं को दर्शाती है, जहाँ फार्मा और ग्रुप्स की गिरावट ($15% तक$) बाजार की कमजोरी को उजागर करती है। यह सूची स्पष्ट रूप से दिखाती है कि देश में $मोदीनॉमिक्स असमानता$ गहरी हो रही है: जहाँ शीर्ष $10$ की संपत्ति कुल $358$ अरबपतियों की संपत्ति का $28%$ है, वहीं करोड़ों भारतीय गरीबी रेखा के नीचे संघर्ष कर रहे हैं।

बॉलीवुड के ‘किंग खान’ शाहरुख खान का अरबपति क्लब में प्रवेश भी उल्लेखनीय है। $12,490 करोड़$ की संपत्ति के साथ उनकी मौजूदगी बॉलीवुड की चमक को रेखांकित करती है, लेकिन उनकी संपत्ति भी $ब्रांडिंग और एंडोर्समेंट्स$ पर टिकी है, न कि उत्पादक निवेश पर।

युवा शक्ति और टिकाऊपन का संकट

युवा अरबपतियों जैसे अरविंद श्रीनिवास ($31 वर्ष, 21,190 करोड़$) का उदय $AI$ और $स्टार्टअप्स$ से प्रेरित है, जो निश्चित रूप से सकारात्मक है। लेकिन पुरानी पीढ़ी का वर्चस्व दर्शाता है कि भारत की वेल्थ क्रिएशन अभी भी $विरासत-आधारित$ है। नई पीढ़ी को इस चक्र को तोड़ना होगा, वरना यह $मोदीनॉमिक्स असमानता$ का चक्र चलता रहेगा।

अंबानी-अडानी जैसे दिग्गजों की गिरावटें, जैसे वैश्विक टैरिफ और मंदी के डर से उपजी, यह साबित करती हैं कि उनका कॉर्पोरेट एकाधिकार मॉडल टिकाऊ नहीं है। यह एकाधिकार भारत में गरीबी को बढ़ावा देते हैं, और $’ट्रिकल डाउन’$ का मिथक टूट चुका है। सरकारी नीतियाँ अभी भी इन ‘वेल्थ क्रिएटर्स’ को सब्सिडी देती रहती हैं।

भविष्य की राह

हुरुन लिस्ट 2025 भारत की आर्थिक विसंगति को नंगा करती है: अमीर और अमीर होते जा रहे हैं, लेकिन असमानता गहराती जा रही है। युवा उद्यमियों का उदय उम्मीद जगाता है, लेकिन सिस्टमिक सुधारों के बिना, जैसे टैक्स रिफॉर्म्स और एंटी-मोनोपॉली कानून, यह ‘रिच लिस्ट’ सिर्फ अमीरों का क्लब बनी रहेगी। असली सवाल यह है कि क्या ये अरबपति समाज में योगदान देंगे या सिर्फ अपनी संपत्ति जमा करेंगे?

भारत को अगर सच्ची समृद्धि चाहिए, तो नीतियाँ जन-केंद्रित बनानी होंगी, जिससे देश के आम नागरिकों को उसका फायदा मिल सके, न कि नरेंद्र मोदी के पसन्दीदा इन उद्योगपति की खाल ओढ़े दुर्दांत धनपिपासूओ की।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि मोदीनॉमिक्स असमानता को दूर करने के लिए सरकार को सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक निवेश बढ़ाना चाहिए।

भारत में आर्थिक असमानता नई नहीं है, पर मोदीनॉमिक्स असमानता ने इसे फिर केंद्र में ला दिया है।

भारत में पिछले एक दशक में तेज आर्थिक वृद्धि हुई है, परंतु मोदीनॉमिक्स असमानता ने समाज के भीतर गहरी खाई उजागर की है।

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