SC का बड़ा फैसला: मानवीय आधार पर प्रेग्नेंट महिला की बांग्लादेश से वापसी
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक ऐतिहासिक और संवेदनशील मामले में सुनाली खातून नामक एक गर्भवती महिला और उनके आठ साल के बेटे को ‘मानवीय आधार’ पर भारत लौटने की इजाजत दे दी है। यह मामला तब सुर्खियों में आया जब केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत को सूचित किया कि वह इस साल की शुरुआत में बांग्लादेश भेजी गई इस महिला को वापस लाने के लिए तैयार है। अदालत में हुई सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार केवल ‘ह्यूमैनिटेरियन ग्राउंड्स’ पर और बिना किसी कानूनी अधिकार को स्वीकार किए, सुनाली खातून की बांग्लादेश से वापसी के लिए सहमत है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस सूर्यकांत कर रहे थे और जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल थे, ने पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया कि वह नाबालिग बच्चे की देखभाल सुनिश्चित करे। साथ ही, कोर्ट ने बीरभूम जिले के चीफ मेडिकल ऑफिसर को आदेश दिया कि वह गर्भवती महिला को डिलीवरी के फ्री खर्च सहित सभी जरूरी मेडिकल सहायता प्रदान करें। यह फैसला उन हजारों लोगों के लिए उम्मीद की किरण है जो अनजाने में सीमाओं के आर-पार फंस जाते हैं, लेकिन कोर्ट ने साफ किया है कि यह राहत सिर्फ इस विशिष्ट मामले तक ही सीमित है।
दिल्ली से गिरफ्तारी और रातों-रात डिपोर्ट करने की कहानी
सुनाली खातून और उनके परिवार की मुश्किलें जून में शुरू हुई थीं। उनके पिता बोदू शेख, जो पिछले 30 सालों से दिल्ली में रिक्शा चला रहे हैं, ने कलकत्ता हाई कोर्ट में बताया कि उनकी बेटी और दामाद पिछले दो दशकों से नई दिल्ली के रोहिणी सेक्टर 26 में रहकर कचरा बीनने का काम कर रहे थे। सुनाली, जो बर्तन बेचने का काम करती थी, ने दिल्ली के रहने वाले दानिश से शादी की थी।
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जून महीने में दिल्ली पुलिस द्वारा चलाई गई एक ‘आइडेंटिटी वेरिफिकेशन ड्राइव’ के दौरान, पुलिस ने सुनाली, उनके पति दानिश और उनके बेटे को केएन काटजू मार्ग स्टेशन से हिरासत में लिया। अधिकारियों ने दावा किया कि खातून और उनका परिवार बांग्लादेश से आए गैर-कानूनी इमिग्रेंट्स थे। हालांकि, परिवार का कहना है कि उन्होंने अपने आधार कार्ड और वोटर आईडी जैसे दस्तावेज दिखाए थे, लेकिन पुलिस ने उनकी एक न सुनी। पुलिस ने उन्हें ‘बांग्लादेशी’ होने के शक में बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF) को सौंप दिया, जिसके बाद उनकी बांग्लादेश से वापसी का रास्ता बंद कर दिया गया था और उन्हें जबरन सीमा पार भेज दिया गया।
आंखों पर पट्टी और गोली मारने की धमकी का आरोप
बोदू शेख ने अपनी याचिका में एक दिल दहला देने वाली घटना का जिक्र किया है। उन्होंने दावा किया कि 26 जून को सुनाली खातून की आंखों पर पट्टी बांध दी गई थी और उनके परिवार को ‘आधी रात में’ भारत के मेहदी बॉर्डर के रास्ते बांग्लादेश में धकेल दिया गया था। इतना ही नहीं, उन्हें अपने साथ कोई भी सामान ले जाने की इजाजत नहीं दी गई और कथित तौर पर चेतावनी दी गई थी कि अगर उन्होंने वापस लौटने की कोशिश की तो उन्हें गोली मार दी जाएगी।
सुनाली उन आधा दर्जन लोगों में शामिल थीं जिन्हें उस रात डिपोर्ट किया गया था। उनके साथ तीन नाबालिग भी थे। इस समूह में उनकी दोस्त स्वीटी बीबी भी शामिल थीं, जो बंगाल के उसी जिले की रहने वाली हैं, और उनके दो बच्चे कुर्बान (16) और इमान (5) भी साथ थे। सीमा पार करने के बाद उनकी मुसीबतें कम नहीं हुईं। अगस्त में, सुनाली और उनके परिवार को बांग्लादेश पुलिस ने चपैनवाबगंज में पासपोर्ट एक्ट और फॉरेनर्स एक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया, जिससे उनकी स्थिति और भी भयावह हो गई।
हाई कोर्ट का हस्तक्षेप और केंद्र की चुनौती
मामले ने तब कानूनी मोड़ लिया जब बोदू शेख और स्वीटी बीबी के परिवारों ने वेस्ट बंगाल माइग्रेंट लेबर वेलफेयर बोर्ड की मदद से कलकत्ता हाई कोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की। सितंबर में, जस्टिस तपब्रत चक्रवर्ती और जस्टिस रीताब्रत कुमार मित्रा की डिवीजन बेंच ने केंद्र सरकार के डिपोर्टेशन ऑर्डर को रद्द कर दिया। हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्हें डिपोर्ट करने में जिस तरह की जल्दबाजी दिखाई गई, वह कानून के हिसाब से गलत है। कोर्ट ने केंद्र की स्टे रिक्वेस्ट को खारिज करते हुए सरकार को एक महीने के अंदर परिवारों को पश्चिम बंगाल वापस लाने का आदेश दिया था।
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हालांकि, केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। होम मिनिस्ट्री ने तर्क दिया कि कलकत्ता हाई कोर्ट के पास इस केस को चलाने का अधिकार नहीं है क्योंकि गिरफ्तारी और डिपोर्टेशन दिल्ली में हुआ था। इसी चुनौती पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अब यह मानवीय दृष्टिकोण अपनाया है।
बांग्लादेशी कोर्ट ने भी माना भारतीय नागरिक
इस पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब अक्टूबर में बांग्लादेश की चपैनवाबगंज कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। वहां की कोर्ट ने पाया कि सुनाली और उनका परिवार वास्तव में भारतीय नागरिक हैं। कोर्ट ने यह फैसला उनके पास मौजूद भारतीय आधार कार्ड और पश्चिम बंगाल में उनके घर के पते के आधार पर सुनाया।
बांग्लादेशी कोर्ट के आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया, “यह पाया गया है कि सभी आरोपी भारतीय आधार कार्ड होल्डर नागरिक हैं… इस स्थिति में, भारत वापस कानूनी कार्रवाई और दूसरी ऑफिशियल फॉर्मैलिटीज़ के लिए, ढाका में इंडियन हाई कमीशन को बताना ज़रूरी है।” इस फैसले ने भारतीय अधिकारियों के दावों पर सवालिया निशान लगा दिए थे और परिवार के इस दावे को मजबूत किया कि वे भारतीय हैं, न कि बांग्लादेशी घुसपैठिए।
सुप्रीम कोर्ट में नागरिकता और मानवीयता की बहस
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार सुनाली खातून की बांग्लादेश से वापसी के लिए सहमत है, लेकिन यह सहमति केवल मानवीय आधार पर दी गई है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह कदम सरकार की दलीलों और उन्हें ‘सर्विलांस’ में रखने के अधिकार पर कोई असर नहीं डालेगा। मेहता ने कहा कि केंद्र उनके भारतीय नागरिक होने के दावे का विरोध करेगा और उन्हें अभी भी बांग्लादेशी नागरिक मानता है।
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दूसरी ओर, जस्टिस जॉयमाला बागची ने टिप्पणी की कि अगर सुनाली अपने पिता बोदू शेख के साथ बायोलॉजिकल कनेक्शन साबित कर देती हैं, तो वह भारतीय नागरिक होने का दावा कर सकती हैं और उनके जरिए उनका बेटा भी भारतीय नागरिक माना जाएगा। सुनाली के वकील ने बताया कि बोदू और उनकी मां ज्योत्सना दोनों के नाम 2002 की बंगाल वोटर लिस्ट में हैं और परिवार के पास 1952 तक के जमीन के कागज हैं, जो उनकी नागरिकता के पक्ष को मजबूत करते हैं।
परिवार का दर्द और बिखरे हुए रिश्ते
सुनाली के परिवार का दर्द उनकी बातों में साफ झलकता है। सुनाली की मां ज्योत्सना बीबी ने बताया कि कैसे उनका नाती अपनी मां के लिए दिन भर रोता है। उन्होंने कहा, “सुनाली ने क्या गुनाह किया है? अगर कोई कहेगा कि हम बांग्लादेशी हैं, तो हम आज ही गांव छोड़ देंगे।” शेख परिवार का कहना है कि खातून को बांग्लादेश के राजशाही में पनाह मिली थी, जहां स्थानीय लोग उन्हें दिन में दो बार खाना दे रहे हैं, लेकिन उनकी गर्भावस्था और तनाव के कारण वे कुपोषण को लेकर चिंतित हैं।
सुनाली के पति दानिश और अन्य लोग अभी भी बांग्लादेश में फंसे हुए हैं। सीनियर वकील कपिल सिब्बल और संजय हेगड़े ने कोर्ट से आग्रह किया कि पति और अन्य लोगों को भी वापस लाया जाए, लेकिन कोर्ट ने मौजूदा आदेश को सिर्फ सुनाली और उनके बच्चे तक सीमित रखा। साथ आए परिवार के अन्य सदस्यों की स्थिति पर आगे की सुनवाई 10 और 12 दिसंबर को तय की गई है।
वापसी की शर्तें और भविष्य की राह
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी साफ किया है कि चूंकि सुनाली को दिल्ली से हिरासत में लिया गया था, इसलिए उन्हें दिल्ली वापस लाया जाएगा। हालांकि, उनके वकीलों ने सुझाव दिया कि उनकी स्थिति को देखते हुए उन्हें बीरभूम जिले में शिफ्ट करना सही रहेगा जहां उनके पिता रहते हैं। कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया है कि सुनाली की बांग्लादेश से वापसी के लिए सभी जरूरी इंतजाम किए जाएं और उन्हें पश्चिम बंगाल के मालदा बॉर्डर के जरिए प्रवेश की सुविधा दी जा सकती है।
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चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि राज्य को कभी-कभी “मानवीय हित में झुकना” चाहिए। यह बांग्लादेश से वापसी फैसला न केवल एक गर्भवती महिला की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि सीमाओं और नागरिकता के विवादों के बीच इंसानियत सबसे ऊपर होनी चाहिए। अब देखना यह होगा कि 10 दिसंबर को होने वाली अगली सुनवाई में कोर्ट सुनाली के पति और अन्य लोगों के बारे में क्या फैसला लेता है।



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