सांसदों का निलंबन : लोकतंत्र पर कलंक, बिहार चुनाव पर गहरा साया।
सांसदों का निलंबन भारत के संसदीय इतिहास में दिसंबर 2023 की वह काली घटना है जो आज भी भारतीय लोकतंत्र के माथे पर एक कलंक की तरह चिपकी हुई है। जब 141 विपक्षी सांसदों को निलंबित कर संसद को विपक्ष-मुक्त बना दिया गया, तब इसकी कल्पना किसी ने नहीं की होगी कि इस सुनियोजित साज़िश का परिणाम आगामी बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में खुलकर सामने आएगा।
यह कार्रवाई कोई सामान्य अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी साज़िश थी ताकि संसद में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का विवादास्पद बिल बिना किसी गहन बहस के पारित हो जाए। इतिहास गवाह है कि 141 सांसदों का निलंबन संसद में सुरक्षा चूक पर बयान की मांग को दबाने का महज़ एक बहाना था।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की साजिश
मोदी-शाह ने एक ऐसे विवादास्पद बिल के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के उस महत्वपूर्ण फैसले को पलट दिया, जिसमें CJI (भारत के मुख्य न्यायाधीश) को चयन समिति से बाहर कर दिया गया। इस नए कानून ने प्रधानमंत्री और उनके चुने हुए मंत्री को समिति में बहुमत देकर चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर पूर्ण नियंत्रण दे दिया।
उस समय की गई यह कार्रवाई दरअसल लोकतंत्र के खुलेआम अपहरण की शुरुआत थी। विपक्ष-मुक्त सदन में बिल पारित कराने के लिए किया गया सांसदों का निलंबन लोकतंत्र के संस्थागत ढांचे को कमज़ोर करने की दिशा में पहला बड़ा कदम था।
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मुख्य लक्ष्य: चुनाव आयोग को “पिट्ठू” बनाना
असल मकसद केवल संसद की सुरक्षा चूक पर चर्चा टालना नहीं था, बल्कि चुनाव आयोग को सरकार का पिट्ठू बनाना था। 141 विपक्षी सांसदों को संसद से बाहर करके विपक्ष रहित सदन में यह बिल पास हुआ, और जल्द ही मार्च 2024 में ज्ञानेश कुमार व सुखबीर सिंह संधु जैसे IAS अधिकारियों को चुनाव आयोग का आयुक्त नियुक्त कर दिया गया।
ये वे लोग हैं जो मोदी सरकार के करीबी माने जाते हैं। क्या यह केवल एक संयोग है कि राम जन्मभूमि ट्रस्ट और कश्मीर पुनर्गठन जैसे विवादास्पद कामों में ज्ञानेश कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है?
इस प्रकार, सांसदों का निलंबन केवल एक विधायी घटना नहीं थी, बल्कि चुनावी प्रक्रिया को नियंत्रित करने की एक राजनीतिक चाल थी।
बिहार चुनाव 2025 और ज्ञानेश कुमार की भूमिका
अब इस पूरी साज़िश का परिणाम बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के समय खुलकर दिखने लगा है। वही ज्ञानेश कुमार अब चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) हैं। बिहार वासियों को इस तथ्य पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए: जिस व्यक्ति को लाने के लिए संसद में लोकतंत्र की हत्या की गई, वही अब आपके वोट की रक्षा करेगा? क्या य़ह सम्भव है?
हाल ही में, ‘SIR’ के नाम पर 65 लाख लोगों के नाम वोटर लिस्ट से गायब कर दिए गए। जब विपक्ष ने इस पर आरोप लगाए, तो CEC ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा, “सब पारदर्शी है।
” यह शर्मनाक मज़ाक नहीं तो और क्या है? राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने साफ तौर पर कहा है कि ज्ञानेश कुमार, सुखबीर संधु और विवेक जोशी “वोट चोर” हैं!
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उच्च मतदान: लोकतंत्र की जीत या एंटी-इंकंबेंसी की लहर?
बिहार में रिकॉर्ड 64% मतदान को CEC ज्ञानेश कुमार “लोकतंत्र की जीत” बता रहे हैं, लेकिन विपक्ष इसे सरकार विरोधी लहर (एंटी-इंकंबेंसी) मानता है। क्या यह उच्च मतदान इसलिए नहीं हुआ कि लोग जानते हैं कि वोट चोरी हो रही है?
लोगों को पता है कि उनका वोट सुरक्षित नहीं है, इसलिए वे बड़ी संख्या में वोट डालने निकले। सांसदों का निलंबन और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल अब ज़मीन पर उतर आए हैं।
लोकतंत्र की लूट का प्रयोगशाला बना बिहार
EVM पर सवाल, फेक वोटिंग के आरोप, VVPD (वीवीपैट) की पर्चियों का जगह जगह मिलना, स्ट्रांग रूम में घूमते संदिग्ध लोग, स्ट्रांग रूम की CCTV कैमरों का बंद हो जाना और स्ट्रांग रूम से पिकअप वैन का निकलना – ये सभी घटनाएं गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।
अमित शाह का पटना के मौर्या होटल में CCTV को बंद करवाकर बैठना और चुनाव आयोग का खुले तौर पर भाजपा से “गठबंधन” यह सब मिलकर बिहार को लोकतंत्र की लूट का प्रयोगशाला बना रहा है।
अगर निष्पक्षता होती तो ‘SIR’ पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी इतनी गोपनीयता क्यों बरती गई?
संस्थागत कब्जे की अंतिम कड़ी
अगर कोई सोचता है कि यह बिहार विधानसभा का सामान्य चुनाव है तो यह उसकी भयंकर भूल है। दरअसल, यह कोई सामान्य चुनाव नहीं है, बल्कि यह संस्थाओं पर कब्ज़े की अंतिम कड़ी है। 141 सांसदों के निलंबन से शुरू हुई यह साजिश अब बिहार के मतदाताओं को सीधे निशाना बना रही है।
अगर ज्ञानेश कुमार जैसे लोग सत्ता के इशारे पर चलेंगे, तो बिहार का चुनाव निष्पक्ष कैसे रहेगा? यह लोकतंत्र का अंतिम संस्कार है, जहां मतदाता को बताया और महसूस कराया जा रहा है कि उसका वोट बेमानी है।
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बिहार वालों, जागो! तानाशाही का नया अध्याय
बिहार वालों, जागो! जिस आदमी को लाने के लिए संसद को खाली किया गया, वही अब तुम्हारे वोट पर डाका डालने वाला है। बल्कि यूं कहें कि डाका डालने की शुरुआत कर दी है। बावजूद इसके अगर आप अभी भी निष्पक्ष चुनाव की उम्मीद रखते हो, तो यह आपकी भयंकर भूल है, यह कतई संभव ही नहीं है, बल्कि असंभव है।
संस्थाएं मर चुकी हैं, जी हां न्यायपालिका भी अब केवल जनता की लड़ाई बाकी है। मोदी राज में लोकतंत्र नहीं, तानाशाही का नया अध्याय लिखा जा रहा है। 141 सांसदों की कुर्बानी व्यर्थ नहीं जानी चाहिए।



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