वैज्ञानिक दृष्टिकोण का हनन: मोदी के बयानों से राष्ट्रीय बौद्धिक हत्या
वैज्ञानिक दृष्टिकोण का हनन भारत का संविधान, अपने अनुच्छेद 51A(h) के माध्यम से देश के प्रत्येक नागरिक को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और ज्ञानार्जन की भावना अपनाने का मौलिक कर्तव्य सौंपता है।
लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस संवैधानिक निर्देश को धत्ता बताते हुए कई ऐसे बयान दिए हैं, जो न केवल संवैधानिक अवहेलना का घोर उदाहरण हैं, बल्कि राष्ट्रीय बौद्धिक हत्या का सुनियोजित अपराध बन जाते हैं। यह स्थिति उस देश के लिए चिंताजनक है जो विश्व मंच पर अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा के लिए जाना जाता है।
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गणेश की कथा को ‘प्राचीन सर्जरी’ का प्रमाण बताना
25 अक्टूबर 2014 को मुंबई के सर एच.एन. रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल के उद्घाटन समारोह में डॉक्टरों की सभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने एक ऐसा दावा किया जिसने पूरे वैज्ञानिक जगत को सकते में डाल दिया। उन्होंने गणेश जी के सिर को प्राचीन प्लास्टिक सर्जरी का ‘प्रमाण’ बताते हुए कहा था, “हम गणेश जी की पूजा करते हैं।
उस समय कोई प्लास्टिक सर्जन तो होगा ही जो मानव शरीर पर हाथी का सिर लगा दिया होगा।” यह दावा महाभारत की कथाओं, जिनमें गणेश का जन्म पार्वती द्वारा मिट्टी से और शिव द्वारा हाथी के सिर से जोड़ने की कथा है, को वैज्ञानिक इतिहास के रूप में प्रस्तुत करने का बचकाना प्रयास था।
द गार्जियन (26 अक्टूबर 2014) ने इसे “मिथोलॉजिकल साइंस” की राजनीतिक साजिश कहा, जबकि द प्रिंट (2021) ने इसे “हिंदुत्व की विज्ञान-विरोधी लहर” का हिस्सा बताया।
भारत की असली वैज्ञानिक विरासत को धूमिल करना
वास्तव में, भारतीय ग्रंथ सुश्रुत संहिता (600 ईसा पूर्व) में राइनोप्लास्टी और त्वचा ग्राफ्टिंग का वर्णन है, जो विश्व की पहली सर्जिकल प्रक्रियाओं में से एक है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने इसे मिथक से जोड़कर असली वैज्ञानिक विरासत को धूमिल किया। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने 2014 में ही इस वक्तव्य को “अवैज्ञानिक और भ्रामक” कहा।
वहीं, नेचर जर्नल (2015) में प्रकाशित एक लेख ने चेतावनी दी कि ऐसे दावे युवा चिकित्सा छात्रों में तर्कशीलता को कमजोर करते हैं। एक सर्वे (प्रभात खबर, 2023) से प्राप्त डेटा के अनुसार, 2023 तक, NEET की तैयारी करने वाले 18 लाख छात्रों में से 40% से अधिक अब भी “प्राचीन भारतीय सर्जरी” के नाम पर गणेश कथा को उदाहरण मानते हैं।
ऐसे बयानों से न केवल वैज्ञानिक शिक्षा का अपमान होता है, बल्कि भारत को वैश्विक मंच पर “मिथक-आधारित विज्ञान” का देश बना दिया जाता है।
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नाली के गैस से चाय: वैज्ञानिक तमाशे की पराकाष्ठा
मोदी की ‘नाली के गैस से चाय बनाने’ वाली कल्पना तो वैज्ञानिक तमाशे की पराकाष्ठा है, जो पर्यावरणीय संकट को हल्के में लेने और ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य को जोखिम में डालने का प्रतीक बनी। 5 जून 2018 को वर्ल्ड एनवायरनमेंट डे पर नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी नें दावा किया कि “नालियों के गैस से चाय बनाई जा सकती है”।
यह बायोगैस प्रोजेक्ट्स का एक विकृत और खतरनाक रूप था। वास्तव में, नाली का गैस हाइड्रोजन सल्फाइड, अमोनिया और मीथेन का विषैला मिश्रण होता है, जो सांस की बीमारियों, आंखों में जलन और कैंसर का कारण बन सकता है।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एनवायरनमेंटल हेल्थ साइंसेज (NIEHS, USA) की 2020 की रिपोर्ट बताती है कि सीवेज गैस से बायोगैस बनाना तकनीकी रूप से संभव है, लेकिन इसके लिए अत्याधुनिक स्क्रबिंग और प्यूरिफिकेशन प्लांट्स चाहिए, जो भारत के 2.4 लाख ग्राम पंचायतों में से सिर्फ 1,800 में हैं (MoPNG डेटा, 2024)।
बीबीसी (2019) और क्वार्ट्ज (2021) की संयुक्त रिपोर्ट्स में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि नाली गैस का दावा “अवैज्ञानिक और खतरनाक” है, जो महिलाओं को फिर से प्रदूषित ईंधन की ओर धकेलता है। WHO के अनुसार, भारत में हर साल 12 लाख मौतें घरेलू वायु प्रदूषण से होती हैं, जिनमें 60% महिलाएं हैं।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का हनन ऐसे बयानों से होता है जो नागरिकों, विशेषकर महिलाओं के स्वास्थ्य को खतरे में डालते हैं।
बादलों से रडार बचाना: राष्ट्रीय सुरक्षा का तिहरा अपमान
बालाकोट एयरस्ट्राइक पर मोदी का ‘बादलों से रडार छिपाने’ वाला बयान तो सैन्य रणनीति, विज्ञान और राष्ट्रीय सुरक्षा का तिहरा अपमान है। 14 मई 2019 को न्यूज नेशन को दिए इंटरव्यू में नरेंद्र मोदी नें बताया, “मौसम खराब था, बादल थे। मैंने कहा, बादल हैं तो रडार से बचने में मदद मिलेगी।” यह दावा भौतिकी के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करता है: रडार रेडियो वेव्स (माइक्रोवेव बैंड) पर काम करता है, जो बादलों को आसानी से भेदते हैं।
रक्षा विशेषज्ञ एयर मार्शल (रिटायर्ड) भूषण गोखले ने स्पष्ट किया, “मिराज-2000 की स्टेल्थ कोटिंग और ECM ही रडार से बचाते हैं, न कि बादल।” एक आंतरिक IAF दस्तावेज (द वायर द्वारा प्रकाशित, 2021) में भी स्वीकार किया गया कि “ऑपरेशनल प्लानिंग में मौसम का कोई रडार-एवेजन फैक्टर नहीं था।”
यह बयान न केवल सैनिकों की बहादुरी को कमतर आंकता है, बल्कि RAND कॉर्पोरेशन रिपोर्ट (2024) के अनुसार, “राजनीतिक नेतृत्व के अवैज्ञानिक बयान सैन्य मनोबल को प्रभावित करते हैं।”
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‘बुजुर्गों को सर्दी लगती है’ वाला तर्क और जलवायु परिवर्तन
ग्लोबल वॉर्मिंग पर मोदी का ‘बुजुर्गों को सर्दी लगती है’ वाला तर्क तो जलवायु विज्ञान का सीधा अपमान है। 3 सितंबर 2014 को टीचर्स डे के दौरान ऑल इंडिया रेडियो पर उन्होंने कहा, “जलवायु परिवर्तन नहीं हुआ है। पहले लोग 100 साल जीते थे, अब 60 में ही ठंड लगने लगती है।”
यह दावा IPCC की छठी मूल्यांकन रिपोर्ट (2021) को पूरी तरह झुठलाता है, जिसमें कहा गया है कि भारत में 1990-2019 के बीच हीटवेव्स से 1.41 लाख अतिरिक्त मौतें हुईं। लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ (2023) की स्टडी ने पाया कि 2022 की गर्मी में भारत में 1.8 लाख मौतें तापमान वृद्धि से जुड़ी थीं।
कृषि पर इसके गंभीर परिणाम हैं; पंजाब और हरियाणा में गेहूं की पैदावार 2022 में 19% गिरी (ICAR डेटा)। इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना बयानों से स्पष्ट होता है कि देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का हनन गंभीर रूप से हो रहा है।
(A+B)² की गलती और वैश्विक बौद्धिक छवि पर दाग
15 अप्रैल 2015 को कनाडा के टोरंटो के रिको कोलिजियम में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी नें कहा, “A+B को स्क्वायर करने पर A² + B² + 2AB मिलता है, और ये एक्स्ट्रा 2AB भारत-कनाडा के रिश्ते की तरह है।” यह बेसिक बीजगणित की गलती थी, क्योंकि सही सूत्र $(A+B)² = A² + 2AB + B² $ होता है।
इंडिया टुडे (2015) और इकोनॉमिक टाइम्स ने इसे ‘मोदी का एक्स्ट्रा 2AB’ कहकर कटाक्ष किया, और कनाडाई अखबार द ग्लोब एंड मेल ने लिखा, “भारत का PM गणित भूल गया।” आर्यभट्ट से लेकर रामानुजन तक, भारत के गौरवशाली गणितीय इतिहास को ऐसे सतही उपमा से अपमानित करना एक अपराध है।
OECD की PISA रैंकिंग में भारत गणित में 72वें स्थान पर है, ऐसे में PM का गलत फॉर्मूला न केवल शर्मनाक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का हनन किस स्तर पर हो रहा है, जिसने वैश्विक मंच पर भारत की बौद्धिक छवि को धूमिल कर दिया।
यह सुनियोजित साजिश का हिस्सा है जहां मोदी सरकार वैज्ञानिक अंधकार को बढ़ावा देकर हिंदुत्व वोटबैंक को साध रही है, जिसका सबूत यह है कि BJP शासित राज्यों में 180+ स्कूल पाठ्यपुस्तकों में (2014-2023) “प्राचीन भारतीय विज्ञान” के नाम पर मिथक शामिल किए गए हैं और NCERT की नई पाठ्यपुस्तकों से डार्विन के विकासवाद को भी हटाया जा रहा है।



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