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भारत में किसान आत्महत्या का स्याह सच!

किसान आत्महत्या

भारत के किसान आज गहरे संकट में हैं। ₹2.85 लाख करोड़ का कृषि ऋण बोझ उनकी पीठ तोड़ रहा है। इस वित्तीय दबाव ने किसान आत्महत्या की दुखद घटनाओं को बढ़ावा दिया है। विशेष रूप से महाराष्ट्र, पंजाब, और कर्नाटक जैसे राज्य इससे सबसे अधिक प्रभावित हैं। केंद्र सरकार ने एकमुश्त कर्ज माफी से साफ इनकार कर दिया है। यह निर्णय देश के अन्नदाताओं के लिए एक गंभीर झटका साबित हो रहा है।

केंद्र सरकार का रुख स्पष्ट और अटल है। कृषि राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने लोकसभा में इसकी पुष्टि की। उन्होंने कर्ज माफी के बजाय मौजूदा सरकारी योजनाओं पर जोर दिया। संशोधित ब्याज सबवेंशन योजना (एमआईएसएस) जैसे कार्यक्रमों का हवाला दिया गया। हालांकि, ये योजनाएं मौजूदा कर्ज के ज्वार को रोकने में विफल साबित हो रही हैं। ग्रामीण भारत का आर्थिक संकट लगातार गहराता जा रहा है।

कृषि ऋण का राष्ट्रीय परिदृश्य

राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। देश में कृषि ऋण की कुल बकाया राशि ₹2.85 लाख करोड़ है। इसमें से ₹1.59 लाख करोड़ केवल छोटे और सीमांत किसानों पर बकाया है। यह आंकड़ा देश में किसान आत्महत्या के पीछे के वित्तीय दबाव को समझाता है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में यह बोझ असमान रूप से वितरित है।

क्षेत्रीय असमानता

दक्षिणी राज्यों पर कृषि ऋण का सबसे अधिक बोझ है। इस क्षेत्र का कुल बकाया ₹1.25 लाख करोड़ है। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य सबसे आगे हैं। वहीं पूर्वोत्तर क्षेत्र में यह राशि केवल ₹30,446.70 करोड़ है। अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में बकाया राशि नगण्य है। यह असमान वितरण नीतिगत ध्यान की दिशा तय करता है।

संकटग्रस्त राज्य

महाराष्ट्र राज्य किसान आत्महत्या के मामले में सबसे दुखद स्थिति में है। यहां किसानों पर ₹260,799.90 करोड़ का कर्ज बकाया है। छोटे और सीमांत किसानों का हिस्सा इसका लगभग आधा है। पंजाब और कर्नाटक जैसे राज्यों की स्थिति भी चिंताजनक है। इन राज्यों में किसान आत्महत्या की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं।

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सरकार की प्रतिक्रिया और रुख

कर्ज और किसान आत्महत्या के बीच सीधा संबंध स्थापित करना केंद्र सरकार ने टाला है। सांसद महुआ मोइत्रा के सवाल के जवाब में कोई स्पष्ट आकलन पेश नहीं किया गया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट का हवाला दिया गया। सरकार का कहना है कि आत्महत्या के कारण विविध और बहुआयामी हैं। वे विशेष रूप से केवल कर्ज से जुड़े नहीं हैं।

वर्ष 2022 में एनसीआरबी के आंकड़ों ने 10,000 से अधिक किसान आत्महत्या दर्ज कीं। फिर भी सरकार इन आंकड़ों के पीछे के कारणों को पूरी तरह से स्वीकार करने से हिचकिचा रही है। इससे एक प्रश्न उठता है कि क्या यह एक जानबूझकर की गई रणनीति है। क्या सरकार इस गंभीर मुद्दे से ध्यान भटकाना चाहती है।

वैकल्पिक योजनाओं पर जोर

किसानों की कर्ज माफी की मांग को लगातार ठुकराया जा रहा है। इसके बजाय सरकार ने बजट आवंटन में भारी बढ़ोतरी का दावा किया है। कृषि और किसान कल्याण विभाग का बजट 2013-14 के मुकाबले 580% बढ़ा है। सरकार ने 28 विभिन्न योजनाओं का भी जिक्र किया है जो किसानों के लिए चलाई जा रही हैं।

संशोधित ब्याज सबवेंशन योजना (एमआईएसएस)

संशोधित ब्याज सबवेंशन योजना (एमआईएसएस) एक प्रमुख पहल है। इसके तहत किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड पर 7% ब्याज दर पर ऋण मिलता है। समय पर भुगतान करने पर यह दर घटकर 3% हो जाती है। फसल ऋण के लिए ₹3 लाख तक की सीमा निर्धारित है। सहायक गतिविधियों के लिए ₹2 लाख तक का ऋण उपलब्ध है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य में भी वृद्धि की गई है। सरकार का दावा है कि एमएसपी उत्पादन लागत से 50% अधिक तय किया जाता है। यह किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए है। हालांकि, जमीन पर इन योजनाओं का वास्तविक लाभ सीमित देखने को मिल रहा है। छोटे किसान अभी भी इनसे पूरी तरह जुड़ नहीं पाए हैं।

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कॉर्पोरेट और कृषि ऋण माफी में विरोधाभास

इसके विपरीत, कॉर्पोरेट कर्ज माफी पर एक अलग ही तस्वीर सामने आती है। सरकार की ‘हेयरकट’ योजना के तहत 43 कंपनियों के कर्ज माफ किए गए। वर्ष 2014 से 2025 के बीच ₹3.53 लाख करोड़ से अधिक की राशि माफ की गई। यह आंकड़ा किसानों के कुल बकाया कर्ज से भी अधिक है।

बड़ी कॉर्पोरेट माफी के उदाहरण

अलोक इंडस्ट्रीज लिमिटेड जैसी कंपनियों के ₹24,472 करोड़ के कर्ज माफ किए गए। एमटेक ऑटो लिमिटेड के ₹10,026 करोड़ के कर्ज भी माफ किए गए। भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड का ₹27,808 करोड़ का कर्ज माफ हुआ। दीवा हाउसिंग फाइनेंस कॉर्पोरेट लिमिटेड का ₹49,922 करोड़ का कर्ज माफ किया गया।

लैंको थर्मल पावर लिमिटेड के ₹33,195 करोड़ के कर्ज माफ किए गए। रिलायंस इंफ्राटेल लिमिटेड के ₹36,819 करोड़ के कर्ज भी माफ हुए। इन कंपनियों का कुल बकाया ₹5,44,434 करोड़ था। इसमें से केवल ₹1,90,779 करोड़ की ही वसूली हो पाई। शेष राशि effectively माफ कर दी गई।

तकनीकी शब्दावली और वास्तविकता

सरकार का तर्क है कि यह technically कर्ज माफी नहीं है। इसे ‘राइट-ऑफ’ या ‘हेयरकट’ का नाम दिया जाता है। यह बैंकों की बैलेंस शीट साफ करने का एक तरीका बताया जाता है। परंतु वास्तविकता यह है कि इससे बैंकों की वसूली क्षमता प्रभावित होती है। अंततः यह जनता के पैसे का नुकसान ही है।

सरकार आधिकारिक तौर पर कॉर्पोरेट कर्ज माफी से इनकार करती है। लेकिन व्यावहारिक रूप से इसका असर साफ देखा जा सकता है। कॉर्पोरेट कर्ज की वसूली में भारी कमी आई है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर इसका सबसे अधिक असर पड़ा है। पारदर्शिता की कमी इस मामले को और संदेहास्पद बनाती है।

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कर्ज के अलावा अन्य प्रमुख चुनौतियाँ

भारत में किसान आत्महत्या के पीछे केवल कर्ज ही एकमात्र कारण नहीं है। यह एक जटिल और बहुआयामी समस्या है। मौसम की अनिश्चितता और जलवायु परिवर्तन का गहरा प्रभाव पड़ता है। फसलों के खराब होने का जोखिम हमेशा बना रहता है। सिंचाई की अनियमित आपूर्ति भी एक बड़ी चुनौती है।

बढ़ती उत्पादन लागत

कृषि लागत में लगातार वृद्धि हो रही है। बीज, उर्वरक और कीटनाशकों की कीमतें आसमान छू रही हैं। डीजल और बिजली के दाम भी लगातार बढ़ रहे हैं। इनपुट लागत बढ़ने से किसानों की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। मजदूरी की ऊंची दरें भी उत्पादन लागत को प्रभावित करती हैं।

बाजार की कमियाँ

बाजार तक पहुंच की कमी एक और बड़ी बाधा है। किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। बिचौलिए अक्सर उनका शोषण करते हैं। मंडी व्यवस्था में सुधार की गहरी आवश्यकता है। ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म अभी भी पूरी तरह से विकसित नहीं हैं।

सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दबाव

सामाजिक और पारिवारिक दबाव भी एक प्रमुख कारक हैं। कर्ज चुकाने की मजबूरी किसानों को तनाव में डालती है। पारिवारिक जिम्मेदारियां भारी पड़ने लगती हैं। समाज में सम्मान खोने का डर भी मनोवैज्ञानिक दबाव बनाता है। इन सबके चलते किसान निराशा के गहरे गड्ढे में चले जाते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव

मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता की कमी भी एक कारण है। ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं लगभग अनुपस्थित हैं। किसान तनाव और अवसाद से निपटने के लिए अकेले होते हैं। पेशेवर परामर्श की सुविधा उन तक नहीं पहुंच पाती। इसकी वजह से नकारात्मक विचारों को बल मिलता है।

योजनाओं तक सीमित पहुंच

सरकारी योजनाओं का लाभ भी हाशिए के किसानों तक नहीं पहुंच पाता। जागरूकता की कमी एक बड़ी बाधा है। जटिल प्रक्रियाएं छोटे किसानों को पीछे छोड़ देती हैं। भ्रष्टाचार और लालफीताशाही भी लाभार्थियों तक पहुंच में रुकावट बनती हैं। परिणामस्वरूप, योजनाओं का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता।

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संकट से निपटने के लिए समाधान के रास्ते

इस संकट से निपटने के लिए एक बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। केवल कर्ज माफी एकमात्र समाधान नहीं हो सकती। दीर्घकालिक और टिकाऊ समाधानों पर ध्यान देना होगा। सिंचाई सुविधाओं का विस्तार और सुधार आवश्यक है। जल संरक्षण तकनीकों को बढ़ावा देना होगा।

बेहतर बीमा और बाजार पहुंच

फसल बीमा योजनाओं को और अधिक प्रभावी बनाना होगा। किसानों को प्राकृतिक आपदाओं के खिलाफ बेहतर सुरक्षा चाहिए। दावा निपटान प्रक्रिया को सरल और तेज करना होगा। तभी किसानों का विश्वास इन योजनाओं में बढ़ेगा।

किसानों को बाजार से सीधे जोड़ने की आवश्यकता है। ई-नाम जैसी पहलों को और मजबूत करना होगा। कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट्स का विस्तार करना होगा। मूल्य संवर्धन से किसानों की आय में वृद्धि हो सकती है। इससे वे कर्ज के चक्र से बाहर निकल सकेंगे।

मानसिक स्वास्थ्य और शिक्षा

मानसिक स्वास्थ्य सहायता सेवाओं को ग्रामीण स्तर तक ले जाना होगा। किसानों के लिए परामर्श केंद्र स्थापित करने होंगे। समुदाय आधारित सहायता समूह बनाने होंगे। तनाव प्रबंधन के बारे में जागरूकता फैलानी होगी। इससे किसान आत्महत्या की घटनाओं पर अंकुश लग सकेगा।

शिक्षा और प्रशिक्षण पर भी ध्यान देना होगा। किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों से अवगत कराना होगा। जैविक खेती और जल संरक्षण के तरीके सिखाने होंगे। नवीनतम बाजार रुझानों की जानकारी देनी होगी। इससे वे अधिक लाभदायक फसल चुन सकेंगे।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः, भारत के किसान एक गहन संकट का सामना कर रहे हैं। वित्तीय दबाव, जलवायु अनिश्चितता और बाजार की चुनौतियां उनके सामने हैं। केंद्र सरकार की नीतियां अभी तक इस संकट का समाधान नहीं बन पाई हैं। कॉर्पोरेट क्षेत्र को दी गई रियायतें इस विषय पर और सवाल खड़े करती हैं। एक संवेदनशील और व्यापक दृष्टिकोण की तत्काल आवश्यकता है। तभी भारत का अन्नदाता सच्चे अर्थों में समृद्ध और सुरक्षित हो सकेगा।

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