ट्रंप ग्लोबल टैरिफ फैसला: सुप्रीम कोर्ट के झटके के बाद 10%नया टैक्स लागू
ट्रंप ग्लोबल टैरिफ फैसला आज अंतरराष्ट्रीय व्यापार के इतिहास में एक नया मोड़ ले चुका है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के प्रतिकूल आदेश के बावजूद 10 प्रतिशत का नया वैश्विक टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी।
शनिवार, 21 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के पिछले व्यापक टैरिफ प्लान को असंवैधानिक करार देते हुए खारिज कर दिया था। कोर्ट का मानना था कि राष्ट्रपति के पास बिना कांग्रेस की सहमति के इस तरह के व्यापक वैश्विक कर लगाने की असीमित शक्तियाँ नहीं हैं।
हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप ने इस ‘कानूनी हार’ को अपनी जीत में बदलते हुए तुरंत एक नया कार्यकारी आदेश जारी कर दिया, जिसमें उन्होंने दावा किया कि वे सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के नाम पर इससे भी कहीं अधिक टैक्स वसूल सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट बनाम व्हाइट हाउस: जब संविधान और सत्ता के बीच छिड़ गई कानूनी जंग
इस ट्रंप ग्लोबल टैरिफ फैसला की शुरुआत अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले से हुई जिसने ट्रंप के ‘टैरिफ राज’ पर लगाम लगाने की कोशिश की। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि वैश्विक व्यापार नीतियां केवल एक व्यक्ति की पसंद पर आधारित नहीं हो सकतीं।
इस फैसले को ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ी संवैधानिक हार के रूप में देखा जा रहा था। कोर्ट के आदेश के बाद दुनिया भर के शेयर बाजारों में राहत की लहर दौड़ गई थी और डॉलर की कीमतों में स्थिरता आने लगी थी।
लेकिन ट्रंप ने ‘सोशल मीडिया’ पर लाइव आकर इस फैसले को ‘अमेरिकी हितों के खिलाफ’ बताया और संकेत दिया कि न्यायपालिका उन्हें अमेरिका को फिर से महान बनाने से नहीं रोक सकती।
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“मैं और भी ज्यादा वसूल सकता हूँ”: ट्रंप की नई चेतावनी से डरा वैश्विक बाजार
सुप्रीम कोर्ट के झटके के तुरंत बाद ट्रंप ग्लोबल टैरिफ फैसला को नए स्वरूप में पेश करते हुए ट्रंप ने कहा कि 10 प्रतिशत तो सिर्फ शुरुआत है। उन्होंने एक संवाददाता सम्मेलन में तीखे अंदाज में कहा कि उनके पास अधिकार है कि वे विदेशी उत्पादों पर इससे कहीं अधिक शुल्क लगा सकें।
ट्रंप का तर्क है कि दूसरे देश अमेरिका का फायदा उठा रहे हैं और वे अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति से पीछे नहीं हटेंगे। उनके इस नए ऐलान ने वैश्विक बाजारों में फिर से अनिश्चितता पैदा कर दी है।
न्यूयॉर्क से लेकर टोक्यो और मुंबई तक के निवेशक इस बात से चिंतित हैं कि यह नया ‘टैरिफ वॉर’ वैश्विक सप्लाई चेन को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर सकता है, जिससे महंगाई दर में भारी उछाल आने की संभावना है।
भारत पर क्या होगा असर? आईटी से लेकर मैन्युफैक्चरिंग तक संकट के बादल
भारतीय बाजार के लिए ट्रंप ग्लोबल टैरिफ फैसला किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। भारत अमेरिका का एक बड़ा व्यापारिक भागीदार है और भारतीय आईटी सेवाएं, कपड़ा, रत्न और आभूषण जैसे क्षेत्र अमेरिकी बाजार पर काफी हद तक निर्भर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि 10% का नया टैरिफ भारतीय निर्यात को महंगा कर देगा, जिससे प्रतिस्पर्धा में कमी आएगी।
इसके अलावा, अमेरिका में भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियरों और एच-1बी वीजा धारकों के लिए भी परिस्थितियां कठिन हो सकती हैं। अगर ट्रंप अपने वादे के अनुसार अन्य देशों पर दबाव बनाने के लिए शुल्क बढ़ाते हैं, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को रुपये की गिरती कीमत और बढ़ते व्यापार घाटे को संभालने के लिए कड़े कदम उठाने पड़ेंगे।
वॉल स्ट्रीट में हलचल: स्टॉक मार्केट टुडे लाइव अपडेट्स और निवेशकों की बढ़ती चिंता
अमेरिकी शेयर बाजार (वॉल स्ट्रीट) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, ट्रंप ग्लोबल टैरिफ फैसला के बाद टेक और रिटेल सेक्टर के शेयरों में भारी गिरावट देखी गई है। निवेशक इस बात से डरे हुए हैं कि अगर प्रमुख निर्यातक देशों ने जवाबी कार्रवाई (Retaliation) की, तो अमेरिकी कंपनियों के लिए कच्चा माल महंगा हो जाएगा।
सीएनबीसी (CNBC) की रिपोर्ट के अनुसार, एपल और टेस्ला जैसी बड़ी कंपनियों के शेयरों पर इसका सीधा असर पड़ा है क्योंकि उनकी सप्लाई चेन का बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैला हुआ है।
गोल्डमैन सैक्स के विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि इस तरह के अस्थिर फैसले वैश्विक विकास दर को 0.5% तक कम कर सकते हैं, जो कि पहले से ही सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था के लिए घातक होगा।
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चीन और यूरोपीय संघ का रुख: क्या शुरू होगा ‘ग्लोबल ट्रेड वॉर 2.0’?
डोनल्ड ट्रंप के इस नए ट्रंप ग्लोबल टैरिफ फैसला पर चीन और यूरोपीय संघ ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने संकेत दिया है कि वे अपनी अर्थव्यवस्था की रक्षा के लिए ‘जरूरी कदम’ उठाएंगे, जिसका सीधा मतलब है कि वे अमेरिकी कृषि उत्पादों और विमानन क्षेत्र पर जवाबी टैरिफ लगा सकते हैं।
यूरोपीय संघ ने भी इसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों (WTO) का उल्लंघन बताया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति 1930 की ‘ग्रेट डिप्रेशन’ जैसी हो सकती है जहाँ देशों के बीच सुरक्षात्मक व्यापार नीतियों ने दुनिया को आर्थिक मंदी में धकेल दिया था। ट्रंप की जिद ने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जहाँ कोई भी पक्ष झुकने को तैयार नहीं है।
मिलेनियल्स और जेन-जी के लिए क्या बदलेगा? महंगी शॉपिंग और गैजेट्स का दौर
आज की युवा पीढ़ी, जो आईफोन और वैश्विक ब्रांड्स की शौकीन है, उनके लिए ट्रंप ग्लोबल टैरिफ फैसला का मतलब है—जेब पर भारी बोझ। अगर ट्रंप का 10% टैक्स प्रभावी रहता है, तो लैपटॉप, स्मार्टफोन और यहाँ तक कि जॉर्डन जैसे स्नीकर्स की कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी होगी।
सोशल मीडिया पर जेन-जी इस फैसले को ‘इकोनॉमिक क्यॉस’ (Economic Chaos) कह रहे हैं। डिजिटल दौर में जहाँ ई-कॉमर्स ने सीमाओं को खत्म कर दिया था, ट्रंप की ये नीतियां फिर से डिजिटल दीवारों को खड़ा कर रही हैं।
युवाओं के बीच चर्चा है कि क्या ‘वैश्वीकरण’ का अंत हो रहा है? टेक-सेवी युवाओं के लिए यह खबर न केवल राजनीति है, बल्कि उनके लाइफस्टाइल पर होने वाला सीधा हमला है।
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कूटनीतिक जीत या आर्थिक आत्महत्या? भविष्य के गर्भ में छिपा सच
अंततः, ट्रंप ग्लोबल टैरिफ फैसला यह साबित करता है कि डोनल्ड ट्रंप की नीतियां किसी भी कानूनी या संवैधानिक बाधा को मानने के लिए तैयार नहीं हैं। जहाँ उनके समर्थक इसे ‘अमेरिका को आत्मनिर्भर’ बनाने वाला कदम मान रहे हैं, वहीं अर्थशास्त्री इसे ‘आर्थिक आत्महत्या’ की संज्ञा दे रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद भी ट्रंप का नया टैक्स लागू करना यह दिखाता है कि 2026 का यह साल वैश्विक कूटनीति के लिए सबसे कठिन होने वाला है।
भारत जैसे देशों के लिए अब यह जरूरी है कि वे अपनी व्यापारिक रणनीतियों में विविधता लाएं और केवल एक बाजार पर निर्भर न रहें। आने वाले कुछ हफ्ते यह तय करेंगे कि दुनिया एक नए ‘महामंदी’ की ओर बढ़ रही है या ट्रंप का यह जुआ सफल होगा।
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