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डेटा हाईजैकिंग पर सवाल: संप्रभुता से समझौता नहीं- सुप्रीम कोर्ट

डेटा हाईजैकिंग पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक ऐतिहासिक सुनवाई के दौरान डेटा हाईजैकिंग पर सवाल उठाते हुए स्पष्ट कर दिया कि विदेशी अदालतों के अनुरोधों (लेटर्स रोगेटरी) का निष्पादन भारत की संप्रभुता की कीमत पर नहीं किया जा सकता।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि न्यायिक मदद के नाम पर देश की गरिमा और कानूनी स्वायत्तता से समझौता कतई स्वीकार्य नहीं है।

कोर्ट ने साफ किया कि यह मामला महज दो कंपनियों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि इसके लिए अब एक पक्के और स्पष्ट कानून की घोषणा करने की आवश्यकता है।

क्या भारतीय कंपनियों को भी विदेशों में मिलता है समान सम्मान?

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ‘पारस्परिकता’ (Reciprocity) के सिद्धांत पर गंभीर सवाल खड़े किए। कोर्ट ने पूछा कि क्या भारतीय कंपनियों के विदेशी अदालतों में जाने पर इसी तरह के सहयोग का पालन किया जा रहा है?

बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि हालांकि ‘कोर्ट्स की कमिटी’ (Comity of Courts) एक स्थापित सिद्धांत है, जिसका भारतीय अदालतें सम्मान करती हैं, लेकिन यह व्यवस्था एकतरफा नहीं हो सकती।

CJI ने तीखे लहजे में कहा कि हमें यह दिखाया जाना चाहिए कि जब कोई भारतीय कंपनी वहां जाकर किसी आदेश की मांग करती है, तो क्या विदेशी अधिकारी उसी तत्परता से सहयोग करते हैं।

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सॉवरेनिटी की पवित्रता और विदेशी अदालतों का बढ़ता दखल

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार को भी इसमें पक्षकार (पार्टी) बनाने का निर्देश दिया। उन्होंने टिप्पणी की कि जब विदेशी संस्थाओं को जानकारी चाहिए होती है, तो वे दुनिया के किसी भी कोने से डेटा जुटाना चाहते हैं, लेकिन भारतीय संप्रभुता के सवाल पर वे अपनी श्रेष्ठता थोपने की कोशिश करते हैं।

कोर्ट ने डेटा हाईजैकिंग पर सवाल उठाते हुए कहा कि “हम इस देश की संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेंगे। हम नोटिस इसलिए जारी कर रहे हैं क्योंकि हम इस कानून को हमेशा के लिए सुलझाना चाहते हैं।” यह सॉवरेनिटी की पवित्रता से जुड़ा एक बड़ा संवैधानिक सवाल बन गया है।

मद्रास हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ फाइज़र की बड़ी चुनौती

यह पूरा विवाद मद्रास हाई कोर्ट के नवंबर 2025 के उस फैसले से उपजा है, जिसमें डिवीजन बेंच ने अमेरिकी दवा कंपनी फाइज़र की याचिका खारिज कर दी थी। दरअसल, डेलावेयर की एक कोर्ट ने ‘लेटर्स रोगेटरी’ जारी कर चेन्नई की सॉफ्टजेल हेल्थकेयर से कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज और गवाही मांगी थी।

फाइज़र ने आरोप लगाया है कि सॉफ्टजेल हेल्थकेयर उनकी दवा ‘वायंडामैक्स’ (टैफैमिडिस) से जुड़े पेटेंट का उल्लंघन करने वाले प्रतिवादियों के लिए दवा बना रही है। हालांकि, मद्रास हाई कोर्ट ने विदेशी प्री-ट्रायल डिस्कवरी के लिए ऐसी मदद देने से इनकार कर दिया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

प्री-ट्रायल डिस्कवरी और हेग एविडेंस कन्वेंशन के कानूनी पेंच

मद्रास हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि भारतीय अदालतें विदेशी प्री-ट्रायल डिस्कवरी के लिए ऐसी न्यायिक मदद नहीं दे सकतीं जो अस्पष्ट, बहुत बड़ी या ‘हेग एविडेंस कन्वेंशन’ के सुरक्षा उपायों के खिलाफ हो।

कोर्ट ने पाया कि भारत ने इस कन्वेंशन के आर्टिकल 23 का औपचारिक इस्तेमाल किया है, जो किसी भी देश को प्री-ट्रायल डिस्कवरी के मकसद से जारी लेटर्स रोगेटरी को लागू करने से मना करने की छूट देता है।

हाई कोर्ट ने यह भी माना कि अमेरिकी सिविल प्रोसीजर के तहत जिस व्यापक डिस्कवरी की मांग की जा रही है, वह भारतीय घरेलू कानूनों और संप्रभुता के दायरे से बाहर है।

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सॉफ्टजेल हेल्थकेयर का तर्क और बिज़नेस कॉन्फिडेंशियलिटी

चेन्नई स्थित सॉफ्टजेल हेल्थकेयर ने फाइज़र की मांगों का पुरजोर विरोध किया है। कंपनी ने अदालत को बताया कि वह अमेरिका में चल रहे मुकदमे में कोई पक्षकार नहीं है। कंपनी का तर्क है कि फाइज़र द्वारा मांगी गई जानकारी में उनके गोपनीय मैन्युफैक्चरिंग डेटा और व्यापारिक हित शामिल हैं, जिनके सार्वजनिक होने से उन्हें अपूरणीय क्षति हो सकती है।

डेटा हाईजैकिंग पर सवाल तब और गहरा गया जब यह तथ्य सामने आया कि फाइज़र की संबंधित इंडियन पेटेंट एप्लीकेशन पहले ही भारतीय पेटेंट कार्यालय द्वारा रिजेक्ट की जा चुकी है और उसकी अपील अभी लंबित है। ऐसे में किसी गैर-पक्षकार कंपनी से डेटा मांगना अनुचित है।

डेलावेयर कोर्ट का ट्रायल और फाइज़र की दलीलें

फाइज़र की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अमित सिब्बल ने मामले की तात्कालिकता पर जोर दिया। उन्होंने पीठ को बताया कि डेलावेयर डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में ट्रायल 27 अप्रैल से शुरू होने वाला है। फाइज़र का कहना है कि अगर भारतीय अदालतें मदद से इनकार करती हैं, तो अमेरिका में लंबित कार्यवाही पर इसका बेहद बुरा असर पड़ेगा।

सिब्बल ने दलील दी कि लेटर्स रोगेटरी पूरी तरह से पारस्परिकता के सिद्धांत पर काम करता है और विदेशी अदालतें भी भारतीय अनुरोधों का पालन करती हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर काउंटर एफिडेविट फाइल करने का निर्देश देते हुए मामले को विस्तृत कानूनी व्याख्या के लिए रख लिया है।

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विदेशी प्रभुत्व बनाम भारतीय कानून का नया अध्याय

अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह इस मामले के माध्यम से एक ऐसा कानूनी नजीर पेश करना चाहता है जो भविष्य में विदेशी अदालतों के हस्तक्षेप को भारतीय हितों के साथ संतुलित कर सके। डेटा हाईजैकिंग पर सवाल उठाते हुए बेंच ने फाइज़र की अपील पर सॉफ्टजेल को नोटिस जारी किया और केंद्र सरकार की राय मांगी है।

यह मामला अब केवल एक दवा के पेटेंट तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय न्यायिक सहयोग में भारत की बराबरी और गरिमा को स्थापित करने की एक बड़ी लड़ाई बन गया है। अब देखना यह होगा कि केंद्र सरकार और प्रतिवादी पक्ष इस पर क्या कानूनी रुख अपनाते हैं।

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