विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल: उच्च शिक्षा में बड़े बदलाव
लोकसभा में पेश किए गए विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल, 2025 को अब आगे की गहन जांच और व्यापक चर्चा के लिए संसद की संयुक्त समिति (JPC) को भेज दिया गया है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा सदन के पटल पर रखे गए इस महत्वाकांक्षी विधेयक का मूल उद्देश्य देश के विश्वविद्यालयों और अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों को शिक्षण, अनुसंधान और नवाचार (Innovation) के क्षेत्रों में वैश्विक उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए सशक्त बनाना है।
यह बिल न केवल एक मजबूत और पारदर्शी मान्यता प्रणाली विकसित करने पर जोर देता है, बल्कि स्वायत्तता के माध्यम से संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण सुधार की वकालत भी करता है। जब सदन में इस पर चर्चा शुरू हुई, तो विपक्षी सदस्यों ने इसके कई प्रावधानों पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठक का हवाला देते हुए बताया कि कई सांसदों ने इस पर विस्तृत चर्चा की मांग की थी, जिसके बाद सरकार ने इसे जेपीसी को सौंपने का निर्णय लिया।
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उच्च शिक्षा में आत्मनिर्भरता और टैलेंट पूल बनाने का नया रोडमैप
सरकार का मानना है कि विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान उच्च शिक्षा क्षेत्र में न केवल आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त करेगा, बल्कि भविष्य की जरूरतों के हिसाब से छात्रों का एक बड़ा टैलेंट पूल भी तैयार करेगा। इस विधेयक का मुख्य फोकस युवाओं में रीस्किलिंग और अपस्किलिंग के साथ-साथ महत्वपूर्ण और इनोवेटिव सोच विकसित करने पर है।
यह ढांचा समयोचित और प्रगतिशील माना जा रहा है, जिसमें शैक्षणिक उत्कृष्टता और राष्ट्रीय क्षमता निर्माण को मजबूत करने की अपार संभावनाएं छिपी हैं। यह सुधार यात्रा संघ सूची की प्रविष्टि 66 के तहत संवैधानिक जनादेश और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के दृष्टिकोण के अनुरूप है, जो उच्च शिक्षा के समन्वित और विश्व स्तर पर बेंचमार्क विनियमन के लिए एक ठोस नींव रखता है।
AIDSO का कड़ा विरोध: संस्थागत स्वायत्तता पर हमले का आरोप
एक तरफ जहाँ सरकार इसे क्रांतिकारी बता रही है, वहीं दूसरी तरफ ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (AIDSO) ने इस बिल की तीखी निंदा की है। संगठन का आरोप है कि केंद्रीय कैबिनेट द्वारा मंजूर किया गया यह विधेयक, जिसे पहले हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया (HECI) बिल के रूप में जाना जाता था और अब जिसका नाम विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान कर दिया गया है, सीधे तौर पर उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता पर हमला है।
AIDSO के बल्लारी जिला सचिव कंबली मंजूनाथ ने एक प्रेस बयान जारी कर कहा कि यह प्रस्तावित कानून यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE), और राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) जैसे स्थापित वैधानिक निकायों को भंग कर देगा, जिससे सत्ता का पूरी तरह से केंद्रीकरण हो जाएगा।
विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान
प्रस्तावित विधेयक के तहत UGC, AICTE और NCTE को समाप्त कर उन्हें ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान’ नामक एक ही शीर्ष संस्था में मिला दिया जाएगा। यह नई संस्था तीन प्रमुख वर्टिकल के माध्यम से कार्य करेगी: एक रेगुलेटरी परिषद, एक मान्यता परिषद और एक मानक परिषद।
सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि यह भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IITs), भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIMs) और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NITs) जैसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों को भी एक व्यापक नियामक दायरे में लाने की योजना है।
वर्तमान में भारत में एक हजार से अधिक विश्वविद्यालय और चार करोड़ से अधिक छात्र हैं, और सरकार का तर्क है कि कई अलग-अलग निकायों के होने से नियामक विखंडन और ओवरलैपिंग की समस्या पैदा होती है, जिसे यह बिल दूर करेगा।
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केंद्र सरकार का सीधा नियंत्रण और वित्तीय शक्तियों का बंटवारा
विपक्ष और छात्र संगठनों की सबसे बड़ी चिंता इस नए निकाय की संरचना को लेकर है। बिल के अनुसार, प्रस्तावित संस्था के अधिकांश सदस्यों की नियुक्ति सीधे केंद्र सरकार द्वारा की जाएगी। इससे सरकार को शैक्षणिक विनियमन, मान्यता और पेशेवर मानकों पर व्यापक शक्तियां प्राप्त होंगी।
साथ ही, वित्तीय मामलों को प्रशासनिक मंत्रालय द्वारा अलग से संभाला जाएगा। AIDSO ने आरोप लगाया है कि इस संरचना से संस्थानों का लोकतांत्रिक कामकाज खतरे में पड़ जाएगा और सरकार शिक्षा प्रणाली में धर्मनिरपेक्ष, वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला कर रही है। संगठन का दावा है कि सरकार सस्ती और सुलभ शिक्षा की अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट रही है और प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ा रही है।
विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान
यह बिल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 द्वारा परिकल्पित “हल्के लेकिन सख्त” (Light but Tight) नियामक ढांचे पर जोर देता है। इसका लक्ष्य निर्देशात्मक नियंत्रण को हटाकर सार्वजनिक स्व-प्रकटीकरण और परिणाम-आधारित निरीक्षण की ओर ले जाना है।
फेसलेस और प्रौद्योगिकी-सक्षम सिंगल-विंडो सिस्टम के माध्यम से प्रशासनिक बोझ कम करने का वादा किया गया है। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल का रणनीतिक नजरिया इंटरडिसिप्लिनरी शिक्षा, रिसर्च-आधारित शिक्षण और इंडस्ट्री से जुड़े स्किल डेवलपमेंट को बढ़ावा देना है।
यह ग्लोबल बेस्ट प्रैक्टिसेज और लचीले एकेडमिक स्ट्रक्चर के माध्यम से भविष्य के लिए तैयार ग्रेजुएट तैयार करने का लक्ष्य रखता है जो जटिल तकनीकी और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर सकें।
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ऐतिहासिक विरोध और छात्र आंदोलनों की नई लहर
उल्लेखनीय है कि HECI बिल जब 2018 में पहली बार पेश किया गया था, तब भी इसे छात्रों और शिक्षकों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। AIDSO का कहना है कि बिल का नाम बदलकर उसे दोबारा पेश करने से देश भर के शिक्षाविदों और छात्र संगठनों में एक बार फिर आक्रोश पैदा हो गया है।
संगठन इसे शिक्षा के सांप्रदायिकीकरण, व्यावसायीकरण और निजीकरण को बढ़ावा देने वाला कदम मानता है। उन्होंने छात्रों और शिक्षकों से अपील की है कि वे शिक्षा प्रशासन में इस “सत्तावादी” प्रवृत्ति के खिलाफ एकजुट हों और एक धर्मनिरपेक्ष व वैज्ञानिक शिक्षा प्रणाली की रक्षा के लिए संघर्ष करें।
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उत्कृष्टता और जवाबदेही के बीच संतुलन का प्रयास
निष्कर्ष के तौर पर, यह विधेयक स्वायत्तता और जवाबदेही के बीच एक नाजुक संतुलन बनाने की कोशिश करता है। जहाँ एक ओर सरकार इसे पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार को कम करने वाला “परिवर्तनकारी कदम” बता रही है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा का एक बड़ा तबका इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ देख रहा है।
प्रस्तावित स्टैंडर्ड्स काउंसिल, रेगुलेटरी काउंसिल और एक्रेडिटेशन काउंसिल को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे एक चेक-एंड-बैलेंस सिस्टम के रूप में काम करें।
अंततः, इस बिल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह संस्थानों की वास्तविक शैक्षणिक आजादी को बरकरार रखते हुए उन्हें वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए कितना तैयार कर पाता है। फिलहाल, जेपीसी की जांच ही यह तय करेगी कि इसमें क्या सुधार किए जाने की आवश्यकता है।



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