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बिहार में मतदाता सूची संशोधन: क्या ECI ने भुला दिया अपना कर्तव्य?

बिहार में मतदाता सूची संशोधन

अंतिम समय का संशोधन और उसके प्रभाव

ECI ने बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से ठीक पहले मतदाता सूची संशोधन शुरू किया। यह कदम नवंबर के चुनावों को देखते हुए अत्यंत विवादास्पद है। ग्रामीण क्षेत्रों में 68% लोगों को इसकी जानकारी नहीं थी। शहरी क्षेत्रों में भी भ्रम की स्थिति है। मुजफ्फरपुर जिले में तो केवल 40% नागरिक ही नई प्रक्रिया समझ पाए। ECI को इस मुद्दे पर तत्काल स्पष्टीकरण देना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और ECI की प्रतिक्रिया

10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने ECI को स्पष्ट निर्देश दिए थे। आधार, EPIC और राशन कार्ड को वैध दस्तावेज मानने को कहा गया था। लेकिन बिहार में ECI ने इन्हें अपर्याप्त बताया। इससे दलित और अल्पसंख्यक समुदाय सबसे अधिक प्रभावित हुए। पूर्णिया जिले में 1.2 लाख आवेदन खारिज हो गए। इनमें से 85% आवेदन गरीब परिवारों के थे। ECI की यह कार्रवाई न्यायिक आदेशों की अवहेलना जैसी है।

बिहार में ECI का मतदाता सूची संशोधन विवादों में घिरा है। ECI को चाहिए था कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करे। इस मामले में ECI की भूमिका संदेहास्पद लगती है।

ECI के इस निर्णय के गंभीर राजनीतिक निहितार्थ हैं। विपक्ष का आरोप है कि ECI सत्तारूढ़ दल के दबाव में काम कर रहा है। ऐसे में ECI की तटस्थता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

न्यायिक प्रक्रिया की अनदेखी: एक विश्लेषण

उचित प्रक्रिया का उल्लंघन सबसे गंभीर मुद्दा है। ECI ने किसी कानूनी प्रावधान के बिना नए नियम लागू किए। मतदाताओं पर अनावश्यक बोझ डाला गया। सहरसा जिले में 48% आवेदन दस्तावेजों की कमी के कारण लंबित हैं। आरा में 22% आवेदन अस्वीकार हुए। इनमें अधिकांश महिला और वरिष्ठ नागरिक थे। इससे स्पष्ट है कि ECI ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी की।

ECI को अपनी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता लानी चाहिए। वर्तमान में ECI की कार्यशैली जनविरोधी लगती है। इससे ECI की साख को गहरा आघात पहुँचा है।

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संरचनात्मक समस्याएँ: नियुक्ति से लेकर संचालन तक

ECI की स्वतंत्रता पर संवैधानिक प्रश्न उठ रहे हैं। वर्तमान नियुक्ति प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ हैं। अनुच्छेद 324 के तहत राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर नियुक्ति करते हैं। इससे सत्तारूढ़ दल को नियंत्रण मिल जाता है। 1993 में ECI को बहुसदस्यीय बनाया गया था। तब से आयुक्तों की संख्या में वृद्धि हुई है। परंतु नियुक्तियाँ अब भी राजनीतिक आधार पर होती हैं। यह चिंता का प्रमुख कारण है।

ECI की जवाबदेही सुनिश्चित करना समय की माँग है। वर्तमान में ECI पर नियंत्रण का कोई प्रभावी तंत्र नहीं है। इसलिए ECI सुधार अब अनिवार्य हो गया है।

बिहार विशेष चुनौतियाँ: आँकड़ों की कहानी

बिहार में मतदाता पंजीकरण की अनूठी बाधाएँ हैं। राज्य की 33.74% आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करती है। 2024 के सामाजिक-आर्थिक सर्वे के अनुसार 22 लाख मतदाताओं के पास कोई वैध पहचान पत्र नहीं है। किशनगंज जिले में यह आँकड़ा 37% तक पहुँच जाता है। प्रवासी मजदूरों की समस्या और भी जटिल है। उनमें से केवल 18% के पास स्थायी पता प्रमाण है।

डिजिटल असमानता एक बड़ी बाधा है। बिहार के ग्रामीण इलाकों में केवल 38% घरों में स्मार्टफोन उपलब्ध है। इससे ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया असंभव हो जाती है। पिछले महीने कटिहार में केवल 28% आवेदन ही डिजिटल माध्यम से जमा हो पाए। भाषा की बाधा भी गंभीर है। ECI के 75% दस्तावेज केवल हिंदी या अंग्रेजी में उपलब्ध हैं। भोजपुरी, मैथिली या अंगिका भाषी क्षेत्रों में यह बड़ी समस्या है।

साथ ही परिवहन सुविधाओं का अभाव है। मधुबनी जिले के 60% गाँवों से ब्लॉक मुख्यालय की दूरी 15 किमी से अधिक है। ऐसे में मतदाता पंजीकरण केंद्र तक पहुँचना मुश्किल है। महिलाओं के लिए तो स्थिति और भी कठिन है। केवल 29% महिला मतदाता ही दस्तावेज जमा कर पाईं।

ECI को बिहार की इन विशिष्ट चुनौतियों को समझना चाहिए। ठोस योजना बनाकर ECI स्थिति सुधार सकता है। वास्तव में ECI की सफलता पूरे लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण है।

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जवाबदेही का संकट: कोई निगरानी नहीं

ECI के कार्यों पर नियंत्रण का कोई प्रभावी तंत्र नहीं है। यह संस्था पूर्णतः अपारदर्शी ढंग से काम करती है। प्रशासनिक विवेक का दुरुपयोग स्पष्ट दिखता है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2022 के एक फैसले में चिंता जताई थी। उसने कहा था कि ECI की शक्तियाँ अनियंत्रित हैं। नागरिक समाज संगठनों की भूमिका बहुत सीमित है। संसदीय समितियाँ भी ECI पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रख पातीं। इसलिए संरचनात्मक सुधार अत्यावश्यक है।

ECI की शक्तियों पर पुनर्विचार होना चाहिए। जनहित में ECI को अधिक उत्तरदायी बनाना जरूरी है। वास्तव में ECI के लिए नए मानदंड बनाए जाने चाहिए।

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ऐतिहासिक संदर्भ: बिहार के चुनावी इतिहास से सबक

बिहार के चुनावी इतिहास में यह पहला विवाद नहीं है। 1995 में भी मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर अनियमितताएँ पाई गई थीं। उस समय 12 लाख काल्पनिक मतदाता पाए गए थे। 2005 के चुनावों में मतदान केंद्रों पर हिंसा की घटनाएँ हुई थीं। 2015 में फोटो पहचान पत्र अनिवार्य किया गया था। तब भी 8 लाख लोग सूची से बाहर हो गए थे। इन ऐतिहासिक घटनाओं से स्पष्ट है कि ECI को स्थायी समाधान खोजने चाहिए।

समाधान के व्यावहारिक सुझाव

इस संकट के कई व्यावहारिक समाधान संभव हैं:

  • अपील तंत्र: जिला स्तर पर त्वरित न्यायाधिकरणों का गठन किया जाए। ये 72 घंटे के भीतर फैसला दें।
  • दस्तावेज़ सूची: राशन कार्ड और आधार को अनिवार्य दस्तावेज बनाया जाए।
  • विशेष शिविर: हर पंचायत में पंजीकरण शिविर लगाए जाएँ। मोबाइल वैन की सुविधा दी जाए।
  • भाषाई सहायता: स्थानीय भाषाओं में दस्तावेज और सहायता उपलब्ध कराई जाए।
  • नियुक्ति सुधार: ECI सदस्यों की नियुक्ति में विपक्षी नेता की सहमति अनिवार्य की जाए।

ECI के पास इन सुझावों को लागू करने का ऐतिहासिक अवसर है। सुधार करके ECI जनविश्वास पुनर्जीवित कर सकता है। भविष्य में ECI को सावधानीपूर्वक काम करना चाहिए।

निष्कर्ष: लोकतंत्र की परीक्षा

भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा इसी में है। ECI इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। बिहार में वर्तमान संशोधन प्रक्रिया चिंताजनक है। इसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है। मतदाताओं का विश्वास बहाल करना सर्वोपरि है। देश भर की निगाहें ECI के अगले कदम पर टिकी हैं।

ECI को अब तत्काल सक्रिय कदम उठाने चाहिए। बिहार के मतदाताओं के प्रति ECI की ऐतिहासिक जिम्मेदारी है। अंततः ECI ही भारतीय लोकतंत्र की रक्षक संस्था है।

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