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शालीनता पर ऐतिहासिक फैसला: महिला गरिमा की जीत!

शालीनता पर द्वारका कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

शालीनता पर केंद्रित ऐतिहासिक निर्णय

दिल्ली की द्वारका अदालत ने हाल ही में ‘शालीनता’ से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट हरजोत सिंह औजला ने स्पष्ट किया कि किसी महिला को “रं**डी” कहना, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 509 और नए आपराधिक क़ानून (BNS) की धारा 79 के अंतर्गत अपराध है। यह फैसला महिलाओं की गरिमा और शालीनता की रक्षा की दिशा में न्यायपालिका का एक साहसी और निर्णायक कदम है।

शालीनता: कानूनी और नैतिक व्याख्या

भारतीय संदर्भ में “शालीनता” केवल व्यवहारिक या सामाजिक गुण नहीं है। IPC की धारा 509 इसे महिला की यौन गरिमा और उसकी निजी पहचान से जोड़ती है। यह कानून महिलाओं की आत्मसम्मान की रक्षा करता है, विशेष रूप से तब जब उन्हें लैंगिक आधार पर अपमानित किया जाए। इस धारा का उद्देश्य महिलाओं की निजता, गरिमा और यौन स्वायत्तता को संरक्षित करना है।

कोर्ट की टिप्पणी: अपशब्दों में छिपा स्त्रीविरोध

अदालत ने माना कि “रं**डी” जैसे शब्द सिर्फ अपमान के लिए नहीं होते, बल्कि ये महिला की यौन पवित्रता और चरित्र पर सीधा हमला करते हैं। यह टिप्पणी भारतीय समाज में गहराई से फैली स्त्रीविरोधी सोच को उजागर करती है, जहाँ महिला के चरित्र को नियंत्रण में रखने के लिए गालियों का इस्तेमाल सामान्य बात माना जाता रहा है।

IPC की धारा 509 और शालीनता की रक्षा

भारतीय दंड संहिता की धारा 509 उस किसी भी शब्द, इशारे या कृत्य को अपराध मानती है, जो महिला की शालीनता को जानबूझकर भंग करने के इरादे से किया गया हो। इस धारा में तीन साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है। इसका उद्देश्य महिलाओं को मानसिक और भावनात्मक शोषण से सुरक्षा देना है, जो सामाजिक रूप से सामान्य मान लिए गए अपमानजनक शब्दों से होता है।

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संवैधानिक संरक्षण: गरिमा के साथ जीने का अधिकार

संविधान का अनुच्छेद 21, प्रत्येक नागरिक को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। जब किसी महिला के लिए अश्लील या अपमानजनक शब्दों का प्रयोग होता है, तो यह केवल एक सामाजिक अपराध नहीं रह जाता, बल्कि यह उसकी संवैधानिक पहचान पर भी आघात करता है। अनुच्छेद 14 और 15(3) राज्य को महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष कानून बनाने का अधिकार भी देता है।

सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या: शालीनता का लिंग आधारित स्वरूप

राजू पांडुरंग महाले बनाम महाराष्ट्र राज्य (2004) और पंजाब राज्य बनाम मेजर सिंह (1966) जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने यह स्थापित किया है कि शालीनता महिला की जन्मजात और लिंग आधारित विशेषता है। इसका उल्लंघन सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी हो सकता है।

डिजिटल युग में शालीनता की नई चुनौतियाँ

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर महिलाओं को अकसर अभद्र टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। डिजिटल स्पेस में “शालीनता” की अवधारणा को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। अब यह समय है कि धारा 509 को ऑनलाइन दुर्व्यवहार के मामलों में भी समान रूप से लागू किया जाए।

शालीनता और मानसिक हिंसा का संबंध

अदालत ने माना कि स्त्रीविरोधी गालियाँ मानसिक और भावनात्मक हिंसा का एक रूप हैं। यह वैश्विक दृष्टिकोण से भी मेल खाता है, जहाँ यौन भाषा को हिंसा माना जाता है। शालीनता पर आघात करना सिर्फ एक गाली देना नहीं, बल्कि महिला के आत्मसम्मान और आत्मबल को तोड़ने का प्रयास होता है।

महिलाओं को नियंत्रित करने का औजार: गालियाँ

भारत में स्त्रीविरोधी गालियाँ सामाजिक संरचना में इतनी गहराई तक समाई हैं कि वे सामान्य व्यवहार लगने लगी हैं। इनका उद्देश्य केवल अपमान नहीं, बल्कि महिला की स्वतंत्रता और यौनिकता पर नियंत्रण भी है। ये शब्द पुरुष सत्ता को बनाए रखने के लिए एक मनोवैज्ञानिक हथियार की तरह काम करते हैं।

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स्त्रीविरोधी गालियों के सामान्यीकरण की प्रवृत्ति

आज का समाज बार-बार महिलाओं के खिलाफ बोले जाने वाले अशिष्ट शब्दों को मजाक, गुस्से या “स्लैंग” के रूप में सामान्य मान लेता है। इस प्रवृत्ति को बदलने के लिए जरूरी है कि ऐसे शब्दों के प्रभाव को समझा जाए। ‘शालीनता’ पर हमला सिर्फ महिला को चोट पहुँचाना नहीं है, यह पूरे लैंगिक न्याय के सिद्धांत पर हमला है।

इससे निपटने की दिशा में समाधान

  1. सख्त कानूनी कार्रवाई – ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों प्रकार के स्त्रीविरोधी भाषा के मामलों में IPC और IT अधिनियम की धाराओं का सख्ती से प्रयोग किया जाए।
  2. सामाजिक शिक्षा – स्कूल पाठ्यक्रम और विज्ञापनों में लैंगिक समानता और शालीनता की समझ को बढ़ावा दिया जाए।
  3. प्रभावी रिपोर्टिंग प्रणाली – महिलाओं को ऐसे उत्पीड़न की रिपोर्ट करने के लिए सुरक्षित और गोपनीय प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराए जाएं।
  4. संवेदनशीलता प्रशिक्षण – पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को ‘शालीनता’ जैसे मामलों में संवेदनशील व्यवहार और कानूनी समझ का प्रशिक्षण दिया जाए।

निष्कर्ष: ‘शालीनता’ की पुनर्परिभाषा की आवश्यकता

दिल्ली अदालत का यह निर्णय केवल एक आरोपी को सज़ा देने तक सीमित नहीं है। यह भारतीय न्यायशास्त्र में ‘शालीनता’ की एक नई परिभाषा और गंभीरता को स्थापित करता है। यह फैसला दर्शाता है कि महिलाओं के खिलाफ बोलचाल में प्रयुक्त अपमानजनक शब्द अब हल्के में नहीं लिए जाएंगे।

समाज, न्यायपालिका और नीतिनिर्माताओं को यह समझना होगा कि जब तक महिलाओं के खिलाफ बोले जाने वाले हर अपमानजनक शब्द को भी हिंसा की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा, तब तक ‘शालीनता’ की रक्षा अधूरी रहेगी। यह केवल कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि महिलाओं की गरिमा और स्वतंत्र अस्तित्व का सवाल है।

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