एनसीईआरटी का आरएसएस मॉड्यूल: इतिहास में विकृतियों का नया अध्याय!
एनसीईआरटी के मॉड्यूल में समस्याएं
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा तैयार किए जा रहे नए मॉड्यूल शैक्षिक पाठ्यक्रम में गहरा हस्तक्षेप कर रहे हैं। ये एनसीईआरटी का आरएसएस मॉड्यूल विभाजन जैसे ऐतिहासिक घटनाक्रमों के प्रस्तुतीकरण में गंभीर विकृतियां पैदा कर रहे हैं। इन मॉड्यूलों का उद्देश्य छात्रों के मन में एक विशेष विचारधारा को स्थापित करना प्रतीत होता है।
पारदर्शिता का अभाव
एनसीईआरटी का आरएसएस मॉड्यूल के निर्माण की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव देखा जा सकता है। शिक्षाविदों का मानना है कि यह मॉड्यूल ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करता है। विशेषज्ञों ने इन शैक्षिक सामग्रियों में सांप्रदायिक पूर्वाग्रह की ओर संकेत किया है।
भारत के विभाजन पर तैयार किए गए इन मॉड्यूलों में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की भूमिका को सुनियोजित ढंग से कम करके आंका गया है। इसके विपरीत मुस्लिम सांप्रदायिकता को विभाजन का एकमात्र कारण बताने का प्रयास किया गया है। हिंदू सांप्रदायिकता की भूमिका को इन मॉड्यूलों में पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया है।
ये एनसीईआरटी का आरएसएस मॉड्यूल शिक्षा के क्षेत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप का खतरनाक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। शैक्षिक सामग्री तैयार करते समय ऐतिहासिक संदर्भों और तथ्यों की उपेक्षा की जा रही है। शिक्षा नीति में इस प्रकार के बदलाव देश की बहुलवादी संस्कृति के लिए चिंताजनक हैं।
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शब्दावली में असंगतताएं
विभाजन पर बनाए गए इन मॉड्यूलों में ‘राजनीतिक इस्लाम‘ जैसे आधुनिक शब्दों का प्रयोग किया गया है। ऐतिहासिक रूप से यह शब्द उस समय प्रचलन में नहीं था। इस प्रकार की भाषा का प्रयोग साम्प्रदायिक विभाजन को गहरा करने का कार्य कर सकता है।
एनसीईआरटी के इन मॉड्यूलों ने शैक्षिक जगत में गहन बहस छेड़ दी है। इतिहासकारों का मत है कि विभाजन एक जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया थी। इसे केवल सांप्रदायिक दृष्टिकोण से देखना ऐतिहासिक अन्याय होगा।
सामाजिक आंदोलनों की उपेक्षा
इन मॉड्यूलों में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के समानांतर चलने वाले सामाजिक आंदोलनों को उचित स्थान नहीं दिया गया है। ज्योतिबा फुले, डॉ. अंबेडकर और पेरियार जैसे समाज सुधारकों के योगदान को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया है।
श्रमिक आंदोलनों और किसान संघर्षों के इतिहास को इन मॉड्यूलों में उपेक्षित रखा गया है। नारायण मेघाजी लोखंडे जैसे प्रारंभिक ट्रेड यूनियन नेताओं के योगदान को महत्व नहीं दिया गया है। भगत सिंह और उनके साथियों के विचारों को संपूर्ण रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।
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ब्रिटिश नीतियों का छिपाया जाना
एनसीईआरटी के इन मॉड्यूलों में ब्रिटिश शासन की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति की भूमिका को स्पष्ट रूप से नहीं दर्शाया गया है। ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि अंग्रेजों ने सांप्रदायिक तनावों को कृत्रिम रूप से बढ़ावा दिया था। इस महत्वपूर्ण पहलू को इन मॉड्यूलों में अनदेखा किया गया है।
विभाजन के समय हुई हिंसा और विस्थापन के लिए जिम्मेदार कारकों का विश्लेषण इन मॉड्यूलों में असंतुलित है। हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग दोनों की सांप्रदायिक राजनीति ने विभाजन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। परंतु इन मॉड्यूलों में केवल एक पक्ष को ही दोषी ठहराया गया है।
शैक्षिक चिंताएं
शिक्षा के क्षेत्र में इस प्रकार के पक्षपातपूर्ण मॉड्यूल तैयार करना चिंताजनक है। यह देश की शैक्षिक व्यवस्था की स्वायत्तता के लिए खतरा उत्पन्न करता है। छात्रों को संतुलित और तथ्यात्मक ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है।
एनसीईआरटी को अपने इन मॉड्यूलों पर पुनर्विचार करना चाहिए। ऐतिहासिक घटनाओं के प्रस्तुतीकरण में संतुलन और वस्तुनिष्ठता बनाए रखना आवश्यक है। शिक्षा का उद्देश्य सच्चाई को छुपाना नहीं बल्कि उसे समग्र रूप में प्रस्तुत करना होना चाहिए।
राष्ट्र निर्माण में शिक्षा की भूमिका
देश के भविष्य निर्माण में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए शैक्षिक सामग्री तैयार करते समय अत्यंत सावधानी और जिम्मेदारी की आवश्यकता होती है। एनसीईआरटी जैसे संस्थानों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे शिक्षा को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखेंगे।
छात्रों को विविध दृष्टिकोणों से अवगत कराना शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य होना चाहिए। एकपक्षीय और विकृत इतिहास का अध्ययन छात्रों की बौद्धिक क्षमता के विकास में बाधक सिद्ध हो सकता है। इसलिए एनसीईआरटी को इन मॉड्यूलों में आवश्यक संशोधन करने चाहिए।
सुझाव और समाधान
शिक्षा मंत्रालय को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। देश के प्रतिष्ठित इतिहासकारों और शिक्षाविदों की एक समिति गठित की जानी चाहिए। यह समिति इन मॉड्यूलों का विस्तृत परीक्षण करके अपने सुझाव प्रस्तुत कर सकती है।
भारत का संविधान हमें धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों की शिक्षा देने का आदेश देता है। शैक्षिक संस्थानों का दायित्व है कि वे इन मूल्यों का संरक्षण और संवर्धन करें। एनसीईआरटी को इस दायित्व का निर्वाह करना चाहिए।
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शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य
छात्रों के मन में साम्प्रदायिक घृणा और विभाजन के बीज बोना शिक्षा का उद्देश्य कदापि नहीं हो सकता। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य सहिष्णुता, बंधुत्व और मानवीय मूल्यों का विकास करना है। एनसीईआरटी के मॉड्यूल इस उद्देश्य की पूर्ति करने में सफल होने चाहिए।
देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए शैक्षिक सामग्री तैयार करते समय राष्ट्रीय एकता के हितों का पूर्ण रूप से ध्यान रखा जाना चाहिए। एनसीईआरटी को इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा।
निष्कर्ष और सिफारिशें
अंत में, यह कहा जा सकता है कि एनसीईआरटी के इन मॉड्यूलों पर व्यापक चर्चा की आवश्यकता है। शिक्षा जगत के विशेषज्ञों, अभिभावकों और छात्रों की राय इन मॉड्यूलों के संबंध में ली जानी चाहिए। इससे पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सकेगी।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शिक्षा राष्ट्र निर्माण का शक्तिशाली माध्यम है। इसका उपयोग सकारात्मक और रचनात्मक दिशा में ही किया जाना चाहिए। एनसीईआरटी को इस महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वहन करते हुए उच्चतम मानकों का पालन करना चाहिए।



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