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संविधान संशोधन 2025 विवाद: लोकतंत्र पर हमला या भ्रष्टाचार विरोधी कदम?

संविधान संशोधन 2025 विवाद

संसद के मानसून सत्र में पेश किया गया संविधान (एक सौ तीसवाँ संशोधन) विधेयक, 2025, भारतीय राजनीति में हलचल मचा चुका है। यह संविधान संशोधन 2025 विवाद प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को गंभीर आपराधिक आरोपों में लगातार 30 दिन हिरासत में रहने पर स्वतः पद से हटाने का प्रावधान करता है।

विपक्ष ने इसे लोकतंत्र पर हमला बताया, जबकि सरकार इसे भ्रष्टाचार विरोधी ऐतिहासिक कदम करार दे रही है।

विपक्ष का आरोप: लोकतंत्र पर हमला

शिवसेना (यूबीटी) सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि यह भाजपा का “एक राष्ट्र, एक पार्टी” एजेंडा लागू करने का प्रयास है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा 2014 के “भ्रष्टाचार मुक्त भारत” वादे में असफल रही है।

तृणमूल कांग्रेस ने संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को “तमाशा” करार देते हुए इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया। पार्टी का कहना है कि इस कानून का उपयोग विपक्षी नेताओं को झूठे मामलों में फँसाकर पद से हटाने के लिए किया जा सकता है।

सरकार का तर्क: भ्रष्टाचार विरोधी प्रगतिशील कानून

केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने इस विधेयक को “प्रगतिशील कानून” बताया। उन्होंने विपक्ष पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि वे इसका विरोध कर रहे हैं तो क्या वे भ्रष्टाचार का समर्थन कर रहे हैं।

उन्होंने अरविंद केजरीवाल का उदाहरण दिया, जिन्होंने जेल में रहते हुए भी मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया था।

पीएम मोदी ने खुद को भी छूट नहीं दी

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने खुलासा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस विधेयक से खुद को बाहर रखने का प्रस्ताव ठुकरा दिया। रिजिजू के अनुसार, मोदी ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री भी इस प्रावधान के दायरे में आएँगे।

इसे नैतिकता और कानून के शासन के प्रति मोदी की प्रतिबद्धता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

राजनीतिक हमले और आरोप-प्रत्यारोप

रिजिजू ने विपक्ष पर “भारत विरोधी ताकतों” से गठजोड़ करने का आरोप लगाया। उन्होंने खासतौर पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी को निशाने पर लिया और कहा कि कांग्रेस चुनाव न जीत पाने पर लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमला करती है।

संवैधानिक और ऐतिहासिक संदर्भ

यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 75, 164 और 239AA में संशोधन का प्रस्ताव रखता है। इससे पहले भी 1975 में आपातकाल और 1985 के 52वें संविधान संशोधन जैसे कदमों ने राजनीतिक परिदृश्य बदल दिया था।

विधेयक पर उठे सवालों से यह स्पष्ट है कि भारत के लोकतंत्र में यह संशोधन आने वाले समय में गहरी बहस का कारण बनेगा

  • सरकार इसे भ्रष्टाचार पर कड़ा वार बता रही है।
  • विपक्ष इसे लोकतंत्र और संघीय ढांचे पर हमला मान रहा है।
  • जनता और विशेषज्ञों की निगाहें सुप्रीम कोर्ट और संसदीय बहस पर टिकी हैं।

संविधान संशोधन 2025 विवाद आने वाले महीनों में भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन सकता है।

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