सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: आवास अब मौलिक अधिकार
नई दिल्ली: 12 सितंबर 2025 का दिन भारत के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गया, जब सुप्रीम कोर्ट ने मंसी ब्रार फर्नांडिस बनाम शुभा शर्मा मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इस फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट रूप से आवास का अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार का एक अभिन्न अंग घोषित कर दिया।
कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि आवास मात्र एक अनुबंधीय दायित्व नहीं है, बल्कि यह जीवन की गरिमा, स्वास्थ्य और उत्पादकता से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संवैधानिक दायित्व है। इस फैसले ने उन लाखों घर खरीदारों के सपनों को एक नई उड़ान दी है, जो वर्षों से अपने घर के लिए संघर्ष कर रहे थे।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की बेंच ने नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के फैसले को बरकरार रखते हुए, केंद्र सरकार को एक ‘पुनरुद्धार कोष’ (Revival Fund) स्थापित करने का सुझाव दिया। इस कोष का उद्देश्य संकटग्रस्त रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स को आर्थिक सहायता प्रदान करना है, ताकि सट्टेबाजी से प्रभावित परियोजनाओं का परिसमापन रोका जा सके।
यह फैसला न केवल घर खरीदारों के लिए राहत है, बल्कि यह रियल एस्टेट सेक्टर की महत्वपूर्ण आर्थिक भूमिका को भी रेखांकित करता है, जो सीधे तौर पर बैंकिंग, स्टील, सीमेंट और रोजगार से जुड़ा हुआ है।
कोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि मध्यम वर्ग के टैक्स-पेयर्स का घर का सपना किसी भी हाल में दुःस्वप्न में नहीं बदलना चाहिए, और इसलिए, राज्य को नियामक ढांचे को मजबूत करने का अपना संवैधानिक कर्तव्य निभाना होगा।
संवैधानिक आधार और न्यायिक व्याख्या
यह ऐतिहासिक फैसला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 पर आधारित है, जो पहले से ही ‘जीवन के अधिकार’ की व्यापक व्याख्या प्रदान करता रहा है। कोर्ट ने अपने इस फैसले में पुराने और महत्वपूर्ण मामलों, जैसे चमेली सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1995) और अहमदाबाद म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन बनाम नवाब खान गुलाब खान (1997) का हवाला दिया।
इन फैसलों में भी आश्रय के अधिकार को जीवन के संरक्षण से परे, शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया था। इस नए फैसले की सबसे बड़ी नवीनता यह है कि कोर्ट ने आवास को ‘सुरक्षित, शांतिपूर्ण और समयबद्ध कब्जे’ के रूप में परिभाषित किया, जो सच्चे घर खरीदारों को सट्टेबाज निवेशकों से अलग करता है।
यह फैसला इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) और रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट (RERA) के बीच भी सामंजस्य स्थापित करता है, जहां NCLT/NCLAT को विशेष रूप से रियल एस्टेट मामलों के लिए एक विशेष बेंच गठित करने का निर्देश दिया गया है।
यह न्यायिक व्याख्या न केवल घर खरीदारों को प्राथमिकता देती है, बल्कि राज्य की भूमिका को भी सक्रिय बनाती है, क्योंकि आवासीय क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और लाखों लोगों को रोजगार देता है।
व्यावहारिक प्रभाव और भविष्य की चुनौतियाँ
इस फैसले के व्यावहारिक प्रभाव रियल एस्टेट सेक्टर पर गहरे होंगे, क्योंकि वर्तमान में हजारों प्रोजेक्ट्स संकट में हैं और लाखों घर खरीदार अपनी ईएमआई चुकाने के बावजूद बेघर हैं। कोर्ट ने कुल 12 बाध्यकारी निर्देश जारी किए हैं, जिनमें NCLT/NCLAT में रिक्त पदों को ‘युद्ध स्तर’ पर भरना, RERA प्राधिकरणों को ‘दांतों वाली बिल्ली’ बनाने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराना, और एक उच्च-स्तरीय कमिटी का गठन करना शामिल है, जिसकी अध्यक्षता एक रिटायर्ड हाई कोर्ट जज करेंगे।
पुनरुद्धार कोष का सुझाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो व्यवहार्य प्रोजेक्ट्स को ‘ब्रिज फाइनेंसिंग’ प्रदान करेगा, ताकि परिसमापन से बचा जा सके। इससे मध्यम वर्ग को बड़ी राहत मिलेगी, जो अक्सर सट्टेबाजों के शिकार होते हैं। हालाँकि, इस फैसले के कार्यान्वयन में कुछ चुनौतियाँ भी बनी रहेंगी, जैसे कि कार्यान्वयन में संभावित देरी और राज्य स्तर पर समन्वय की कमी।
फिर भी, यह फैसला रियल एस्टेट बाजार को अधिक पारदर्शी और घर खरीदार-केंद्रित बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
सामाजिक-आर्थिक संदर्भ और वैश्विक प्रेरणा
सामाजिक और आर्थिक संदर्भ में, यह फैसला भारत की बढ़ती शहरीकरण की चुनौतियों को संबोधित करता है, जहां 2030 तक 60 करोड़ से अधिक लोग शहरों में रहने लगेंगे। कोर्ट ने आवास को ‘सट्टेबाजी का साधन’ मानने के बजाय एक मानवीय आवश्यकता बताया, जो सामाजिक न्याय को मजबूत करता है।
यह उन लाखों प्रवासी मजदूरों और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए आशा की एक नई किरण है, जिनका घर का सपना बिल्डर्स की लापरवाही से टूट गया था। वैश्विक स्तर पर, यह फैसला यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स के अनुच्छेद 25 से प्रेरित है, जो पर्याप्त आवास को एक मानवाधिकार के रूप में मान्यता देता है।
इस फैसले से घर खरीदारों में भी उत्साह देखा जा रहा है, जहां उपयोगकर्ता इसे ‘सपनों का घर अब अधिकार’ बता रहे हैं। कुल मिलाकर, यह फैसला राज्य को निष्क्रिय दर्शक से एक सक्रिय संरक्षक की भूमिका में बदलने का आह्वान है।
न्यायिक सक्रियता
अंततः, यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की सक्रिय न्यायिक भूमिका का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो संवैधानिक दायित्वों को नीतिगत सुझावों के साथ जोड़ता है। कोर्ट ने रजिस्ट्री को फैसले की एक प्रति कैबिनेट सेक्रेटरी और सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को भेजने का आदेश दिया है, जिससे तीन माह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट मांगी गई है।
यदि यह फैसला सफलतापूर्वक लागू होता है, तो यह न केवल घर खरीदारों का विश्वास बहाल करेगा, बल्कि आर्थिक स्थिरता को भी बढ़ावा देगा। हालाँकि, इसकी सफलता पूरी तरह से कार्यान्वयन पर निर्भर करेगी, जिसमें केंद्र-राज्य समन्वय और संसाधन आवंटन की आवश्यकता होगी।
यह फैसला हमें यह याद दिलाता है कि संविधान एक जीवंत दस्तावेज है, जो बदलती सामाजिक वास्तविकताओं के अनुरूप विकसित होता है, और आवास का अधिकार जैसी एक बुनियादी आवश्यकता को मौलिक अधिकार का दर्जा देकर न्यायपालिका ने भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को और भी मजबूत किया है।



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