दक्षिणपंथ का अवसान: बेरोजगारी, महंगाई ने ढहाया हिंदुत्व का किला,
दक्षिणपंथ का अवसान भारत की राजनीतिक मिट्टी में दक्षिणपंथी हिंदुत्व का जहर अब अपनी आखिरी सांसें ले रहा है। 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा का बहुमत टूटना कोई संयोग नहीं था; यह जनता का तमाचा था, जो नरेंद्र मोदी के ‘विकास’ के चकाचौंध भरे सपनों के नीचे छिपी बेरोजगारी, महंगाई और अल्पसंख्यक-विरोधी हिंसा से तंग आ चुकी थी।
आँकड़े चीख-चीखकर बता रहे हैं कि भाजपा की सीटें 303 से गिरकर 240 पर सिमट गईं, और एनडीए को भी गठबंधन की भीख माँगनी पड़ी। यह अवसान का अंतिम चरण है, जहाँ ‘राम मंदिर’ जैसे प्रतीकात्मक विजय अब वोटों की भूख मिटाने में नाकाम साबित हो रहे हैं।
दक्षिणपंथ का यह पतन न सिर्फ चुनावी हार है, बल्कि एक विचारधारा का पतन है जो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर पलती थी, लेकिन अब युवाओं की आकांक्षाओं और आर्थिक संकट की लहर में डूब रही है। दक्षिणपंथी शासन के दस वर्षों ने भारत को ‘इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी’ में बदल दिया, जैसा कि वी-डेम इंस्टीट्यूट ने 2021 में चेतावनी दी थी।
संस्थाएँ जिसमें न्यायपालिका से लेकर मीडिया तक, भाजपा के इशारों पर नाचने लगीं, विपक्षी नेताओं को ‘राष्ट्र-विरोधी’ ठहराकर जेलों में ठूँस दिया गया। राहुल गांधी की 2025 में चुनावी धांधली के आरोपों ने इस सड़ाँध को उजागर कर दिया, जहाँ इलेक्शन कमीशन पर सत्ताधारी पार्टी के साथ साँठगाँठ के इल्जाम लगे।
यह अवसान इसलिए तेज है क्योंकि दक्षिणपंथ ने लोकतंत्र को खोखला कर दिया है, सिविल लिबर्टीज का हनन, प्रेस की आजादी का गला घोंटना, और ‘लव जिहाद’ जैसे कानूनों से अल्पसंख्यकों को डराने का खेल अब जनता की आँखों में चुभ रहा है। भाजपा का ‘हिंदू राष्ट्र’ का सपना अब एक बुरे सपने में बदल चुका है, जहाँ सांप्रदायिक हिंसा और आर्थिक असमानता ने हिंदू एकता को ही चूर-चूर कर दिया।
आर्थिक मोर्चे पर ‘अच्छे दिन’ का वादा और कंगाली की हकीकत
आर्थिक मोर्चे पर दक्षिणपंथ का पतन और भी कड़वा है। ‘अच्छे दिन’ का वादा अब कंगाली का पर्याय बन गया है, बेरोजगारी, महंगाई दर 8% से ऊपर है, किसानों की आत्महत्याएँ बढ़ती जा रही हैं, और कॉर्पोरेट दिग्गजों को सरकारी सम्पत्तियों का औने-पौने दामों में अधिग्रहण, टैक्स छूट के नाम पर लूट मचाने की खुली छूट।
2025 में इथेनॉल ब्लेंडिंग और अन्य नीतियों पर विपक्ष का हमला भाजपा की कमजोरियाँ उजागर कर रहा है, जहाँ विकास का ढोंग अब नौजवानों की हताशा में बदल गया। दक्षिणपंथ ने पूंजीवाद को हिंदुत्व के चोले में लपेटकर बेचा, लेकिन असल में अमीरों का जश्न और गरीबों का सैलाब बढ़ाया।
यह अवसान इसलिए अपरिहार्य था क्योंकि जब पेट की भूख मंदिरों की भक्ति से ज्यादा जोरदार हो जाती है, तो कोई भी विचारधारा टिक नहीं पाती।
यही कारण है कि अब लेफ्ट-सेंट्रल का आगाज हो चुका है, जो दक्षिणपंथ के विषैले अवशेषों को साफ करने का संकेत है। इंडिया गठबंधन की 2024 की सफलता, जहाँ कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों ने भाजपा को घेरा यह एक नई शुरुआत है, जहाँ समावेशी विकास और सामाजिक न्याय की बातें हवा में गूँज रही हैं।
लेफ्ट-सेंट्रल का आगाज: समावेशी राजनीति का पुनरुत्थान
राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस और अखिलेश यादव के काउंटर-अटैक ने विपक्ष को नई ऊर्जा दी, जबकि भाजपा की नीतियाँ जैसे वक्फ अमेंडमेंट एक्ट 2025 ने धार्मिक विभाजन को और गहरा करने की कोशिश की, लेकिन जनता ने ठुकरा दिया। यह आगाज इसलिए ताकतवर बनकर उभर रहा है क्योंकि यह दक्षिणपंथ की ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ जैसी तानाशाही को चुनौती दे रहा है, और बहुलतावाद को पुनर्जीवित कर रहा है।
लेफ्ट-सेंट्रल की लहर में कांग्रेस का पुनरुत्थान सबसे बड़ा संकेत है। 2025 में मल्लिकार्जुन खड़गे और जयराम रमेश जैसे नेताओं की रणनीति ने भाजपा को बैकफुट पर धकेल दिया, जहाँ जगदीप धनखड़ के इस्तीफे और संसद में मोदी पर राहुल का भारी पड़ना विपक्ष की ताकत दिखा रहा है।
‘लेफ्ट-सेंट्रल’ यह विचारधारा न सिर्फ आर्थिक समानता पर जोर दे रही है, जैसे किसान अधिकार यात्रा की सफलता, बल्कि सांस्कृतिक स्तर पर भी दक्षिणपंथ के ‘हिंदू प्राइड’ के ढोंग को चीर रही है। जहाँ भाजपा मुसलमानों को PMAY घरों का 30% हिस्सा देने का दावा करती है लेकिन असल में विभाजन फैलाती है, वहीं लेफ्ट-सेंट्रल वास्तविक कल्याण पर फोकस कर रहा है। यह आगाज भारत को एक प्रगतिशील, समावेशी दिशा में मोड़ रहा है।
क्षेत्रीय स्तर पर यह परिवर्तन और भी स्पष्ट है। दक्षिण भारत में दक्षिणपंथ की घुसपैठ नाकाम रही, जहाँ तमिलनाडु और केरल जैसे राज्य लेफ्ट-सेंट्रल की जड़ें मजबूत कर रहे हैं। कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक की असंतोष की लहरें, जो दक्षिणपंथ की नीतियों से उपजीं, अब विपक्ष को मजबूत बना रही हैं।
2025 में सेंट्रिज्म जैसी नई विचारधाराओं का उदय, जैसे कमल हासन की मक्कल निधि मय्यम का संसद में प्रवेश, पुरानी बाइनरी को तोड़ रहा है। यह आगाज इसलिए क्रांतिकारी है क्योंकि यह जाति, धर्म के जाल से ऊपर उठकर साफ राजनीति की माँग कर रहा है, जो दक्षिणपंथ के पतन का सबसे बड़ा सबक है।
वैश्विक संदर्भ और लोकतंत्र की बहाली का संदेश
अंत में, यह परिवर्तन वैश्विक संदर्भ में भी तीखा चुभता है। जहाँ अमेरिका में ट्रंप की जीत के बाद दक्षिणपंथी आतंकवाद कम हुआ लेकिन लेफ्ट-विंग हिंसा बढ़ी, वहीं भारत में लेफ्ट-सेंट्रल का उदय लोकतंत्र की बहाली का संदेश है। कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में दक्षिणपंथी दलों की हार ने वैश्विक बैकलैश को तेज किया, जो भारत को भी प्रभावित कर रहा है।
दक्षिणपंथ का अवसान अब अपरिहार्य है, यह न सिर्फ भाजपा का अंत है, बल्कि एक ऐसे भारत का जन्म है जहाँ समानता, न्याय और प्रगति शब्दों से आगे आकर हकीकत बनें। जब जनता को बेरोजगारी, महंगाई जैसे मुद्दों पर जवाब नहीं मिला, तो उन्होंने सत्ता को नकार दिया। अगर दक्षिणपंथ ने हमें तानाशाही सिखाई, तो लेफ्ट-सेंट्रल हमें आजादी का इस बार सच्चे अर्थों में असली मतलब सिखाएगा।



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